किसान आंदोलनों का प्रकाश पुंज है मुजारा आंदोलन

पुरुषोत्तम शर्मा 

पंजाब के मुजारा आंदोलन के बारे में बाक़ी देश या तो जानता ही नहीं है या बहुत ही कम जानता है। मैं इस लोकसभा चुनाव में कामरेड रुल्दूसिंह के साथ किसानों के बीच चुनाव प्रचार के लिए मानसा जिले के किशनगढ़ गांव भी गया था। वहाँ मैंने इस आन्दोलन की यादों को जिंदा रखे स्मारक को देखा तो मेरे अंदर इस आंदोलन को जानने की जिज्ञासा जागी। मुझे लगा अभी भी अपने पुरखों के क्रांतिकारी इतिहास के कई पन्नों से हममें से ज्यादातर लोग अनभिज्ञ हैं। तेलंगाना आन्दोलन के समय उसी तरह का आंदोलन पंजाब की धरती पर मुजारों (गरीब भूमिहीन किसान) की संगठित ताकत के बल पर चल रहा था। पंजाब का मुजारा आन्दोलन पटियाला राज के अंदर अंग्रेजों से देश की आजादी और बड़े जागीरदारों के खिलाफ उन गरीब भूमिहीन किसानों का संगठित आंदोलन था जो उनकी जमीनों पर कास्त करते थे। मानसा जिले के किशनगढ़ में आज भी मुजारा आंदोलन और उसके शहीदों की याद में एक भव्य स्मारक है। उस स्मारक की ऊंची लाल लाट के ऊपर मुजारों के प्रिय लाल झंडे को बनाया गया है, जिस पर कम्युनिस्टों का निशान हसिया हथोड़ा बना है। किशनगढ़ मुजारा आन्दोलन का सबसे बड़ा गढ था। इस पर पटियाला राज की सेना ने चारों और से घेर कर तोपों से हमला किया था। राजा की सेना का मुकाबला करने को किसानों के सशस्त्र जत्थे डेट थे। इस लड़ाई में इस गाँव के किसान योद्धा कुंडा सिंह और राम सिंह बाग़ी शहीद हुए थे। पूरे मालवा क्षेत्र में मुजारा आन्दोलन में संघर्षरत किसानों की हिफाजत के लिए लगभग 1100 किसान गुरिल्ले विभिन्न जत्थों में संगठित किए गए थे।

पंजाब के मुजारा आन्दोलन को देश के क्रांतिकारी किसान आंदोलनों की सूची में वह स्थान अब भी नहीं मिला है जिसका वह हकदार था। मुजारा आंदोलन की पृष्ठभूमि जानने के लिए हमें इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा। 1885 के आसपास पंजाब से लोग रोजगार के लिए बाहर के देशों में जाने लगे थे। पर इन मेहनती और स्वाभिमानी लोगों को वहां गुलाम देश के नागरिक के तौर पर लगातार अपमान का घूँट पीना पड़ता था। इस कारण उनके अंदर देश की आजादी की भावना ज्यादा हिलोरें मारने लगी। 1913 में अमेरिका और कनाडा में रहने वाले भारतीयों जिनमें ज्यादातर सिख थे नेहिन्दी एसोसिएशन पेसिफिक पोस्टनाम का संगठन बनाया। इस संगठन ने 1857 के गदर से प्रेरणा लेकर देश में आजादी के लिए काम करने की योजना बनाई। क्रांतिकारी सोहन सिंह भागना इसके संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए। क्रांतिकारी लाला हरदयाल को इस संगठन की ओर से ग़दर नाम का एक अखबार निकालने का जिम्मा दिया गया। इसी अखबार के नाम से बाद में इस संगठन को ग़दर पार्टी के नाम से जाना जाने लगा। देश में क्रांति संगठित करने लिए इस संगठन ने 1914 में 800 गदरी भारत भेजे। इनमें से ज्यादातर को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में कई को फांसी की सजा दी गयी। इन क्रांतिकारियों जिन्हें अब हम गदरी बाबा के नाम से संबोधित करते हैं की बीर गाथाएं सभी क्रांतिकारियों के लिए आज भी प्रेरणा की श्रोत हैं।

1942 में ग़दर पार्टी का कम्युनिस्ट पार्टी में विलय हो गया। पर फिर 1946 में दो राष्ट्र के सवाल पर मतभेद के कारण इसका बड़ा हिस्सा अलग हो गया और लाल पार्टी का गठन किया। कामरेड तेजा सिंह स्वतंत्र इसके नेता थे। उन्होंने पंजाब के मालवा क्षेत्र को अपने कार्यक्षेत्र के रूप में चुना, जहां बड़े जागीरदारों के खिलाफ मुजारों का आंदोलन संगठित हो रहा था। मशहूर क्रांतिकारी बूझा सिंह भी उनकी टीम में थे। लाल पार्टी के नेतृत्व में किशनगढ़ में जमीन पर कब्जे के संघर्ष में एक थानेदार की मौत हो जाने के बाद पटियाला राज की सेना ने किशनगढ़ को घेरा था और तोपों से उस पर हमला किया था। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मुजारों (गरीब भूमिहीन किसानों) की बढ़ती ताकत से घबराए पटियाला के राजा को तत्कालीन भारत सरकार ने राज्य प्रमुख का स्थाई पद का लालच देकर भारत की संघीय यूनियन में शामिल कर लिया। तब इसका नामपटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन” 

(पेप्सू) था। राज्यपाल की जगह राजा पटियाला राज्य प्रमुख था। पर बाद में भारत सरकार ने 1956 में पेप्सू का पंजाब में विलय कर दिया और पटियाला के राजा को 

दिया राज्य प्रमुख का पद ख़त्म कर दिया।  आज जब पूरे इतिहास को ही बदल देने के दक्षिणपंथी प्रयासों को परवान चढ़ाया जा रहा है। ऐसे समय में पंजाब के मुजारा आन्दोलन के बारे में भी बाक़ी देश के लोगों को और खुद पंजाब की नई पीढी को जानने की जरूरत है।

मुजारा आंदोलन के एक कार्यकर्ता कामरेड कृपाल सिंह बीर अब भी जीवित और सक्रिय हैं। पंजाब के मानसा जिले के बीर खुर्द (छोटी बीर) गाँव के निवासी हैं जिनकी उम्र 91 वर्ष है। वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के वरिष्ठ नेता हैं। कभी पार्टी के जिला सचिव की भी भूमिका भी निभाई है और आज भी पूरी तरह से किसान आन्दोलन में सक्रिय हैं। चुनाव के दौरान 15 मई को पार्टी कार्यालय में इनसे मुलाक़ात हुई। 16 मई को अपने गाँव में चुनावी सभा करने के लिए नेताओं से समय लेने पहुंचे थे। उनका गांव भीखी कसबे से 7 किमी दूर और मानसा जिला मुख्यालय से 23 किमी दूर है। पार्टी जिला कार्यालय मानसा में अक्सर आते हैं। अभी भी गांव से 7 किलोमीटर साइकिल चलाकर भीखी पहुँचते हैं। वहां से बस से मानसा वापसी में फिर भीखी से 7 किलोमीटर साइकिल चला कर अपने घर पहुंचते हैं। यानी एक दिन में 14 किलोमीटर साइकिल अब भी चलाते हैं। अभी कुछ साल पहले तक वे मानसा भी साइकिल से ही आते थे। यानी एक दिन में 46 किलोमीटर साईकिल चालाते थे।

इनका जन्म नवम्बर 1928 में बर्मा में हुआ था पिता वहीँ नौकरी करते थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 1942 में इन्हें पिता के साथ वर्मा से पैदल भाग कर भारत आना पड़ा। स्कूली पढ़ाई कक्षा 3 तक रही। जब पंजाब पहुंचे तो उन दिनों यहाँ बड़े जागीरदारों के खिलाफ लाल पार्टी के नेतृत्व में मुजारों का आंदोलन चल रहा था। इस आन्दोलन का नेतृत्व ग़दर आन्दोलन से जुड़े कम्युनिस्ट कर रहे थे। उन्होंने ही लाल पार्टी का गठन किया था जिसका झंडा लाल और उसपर निशान हसिया हथोड़ा था। युवा होता हुआ कृपाल सिंह बीर भी 1944 में इस आंदोलन में सक्रिय हो गए। 1949 में उन्होंने लाल पार्टी की सदस्यता ली। यह वह दौर था जब पंजाब का मुजारा आन्दोलन और उसका दमन अपने चरम पर था। मुजारों ने पूरे पंजाब में जागीरदारों की लाखों एकड़ जमीनों पर कब्जा कर लिया था। पटियाला राज की सेना के साथ मुजारों की झड़पें हो रही थी। 1948 तक मुजारों को जमींदारों के अत्याचारों से बचाने के लिए 30– 40 की संख्या वाले सशस्त्र किसानों के कई जत्थे गठित किए गऐ। इन जत्थों में लगभग 1100 सशस्त्र किसानों की गोलबंदी हो चुकी थी।

51-52 में यहाँ राष्ट्रपति शासन के दौरान भारी सरकारी दमन के आगे 48 से 51 के बीच जमीनों पर काबिज गैर मौरूसी काश्तकार अपना कब्जा बरकरार नहीं रख सके। जबकि दखली काश्तकार अपना कब्जा बरकरार रखने में कामयाब रहे। पहले विधानसभा चुनाव में मुजारा आंदोलन की लाल पार्टी के चार विधायक चुनाव जीत गए। विधानसभा त्रिशंकु आयी। उसके बाद मुजारों को जमीन का मालिकाना हक देने की शर्त पर लाल पार्टी ने ज्ञान सिंह राड़ेवाल की सरकार को समर्थन दिया। इसी के दबाव में 1953 में किसानों की बेदखली रोकने सुरक्षा प्रदान करने के लिए पेप्सू कृषक अधिनियम पारित किया गया। इसी वर्ष पेप्सू भूमि अधिग्रहण कानून बनाया गया और किसानों को जमीन का मालिकाना दे दिया गया। 1948 से 52 तक चले जबरदस्त मुजारा आन्दोलन में 884 गावों की 18 लाख एकड़ जमीन को बाँट कर मुजारों (गैर मौरूसी दाखली काश्तकारों) को उस दखल जमीन का मालिकाना हक दिया गया।

मुजारा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण कामरेड कृपाल सिंह बीर 52 में हुए पहले पंचायती चुनाव में बीर बेहपई गाँव के पहले सरपंच (ग्राम प्रधान /मुखिया) चुने गए। अब इस गाँव की दो पंचायतें हो चुकी हैं।  बाद में लाल पार्टी ने सीपीआई में विलय कर दिया।  84 में पार्टी लाइन से मतभेदों के कारण वे सीपीएम और फिर 94 में भाकपा (माले) में शामिल हो गए। अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कामरेड रुलदू सिंह के साथ कामरेड कृपाल सिंह बीर सन् 2016 में लगातार 11 महीने और अभी सन् 2019 में लगातार तीन महीने किसानों की कर्ज माफी की मांग पर मानसा जिला मुख्यालय पर धरने में बैठे रहे। पढ़ने लिखने का बड़ा शौक है। इनके घर में (गाँव में) इन्होंने 2000 किताबों की एक लाइब्रेरी बनाई है। कुछ लिखा भी है और कुछ लिखवाया भी है। गाँव में मजदूरों किसानों के बच्चों को वे साहित्य पढ़ने को प्रेरित करते रहते हैं। आज उनकी लाइब्रेरी की देखभाल भी ऐसे भी नई पीढी के बच्चे करने लगे हैं। 19 मार्च को, संयुक्त किसान मोर्चा ने मुजारा आंदोलन के शहीदों के परिवार को सम्मानित करने का आयोजन तय किया हैं, इसी सिलसिले में सैंकड़ो परिवार टिकरी बॉर्डर मोर्चा पर पहुँच चुके हैं।