साहिर लुधियानवी : हर वक़्त का शायर

धनंजय

एक शायर एक गीतकार जिसने अपने वक़्त के साथ साथ आने वाले सौ सालों के लिए गीतों, नज़्मों और ग़ज़लों का ज़खीरा पेश किया। साहिर के शब्द दुनयावी हक़ीक़त और उसमें मौजूद दिक्कतों को खुलेआम गीतों, ग़ज़लों और नज़्मों के ज़रिये कह रहें थें और सवाल कर रहें थें। फिल्म प्यासा के लिए लिखा गीत इसके उदाहरण हैं,

ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया

ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया

ये दौलत के भूके रिवाजों की दुनिया

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

            साहिर का जन्म 8 मार्च 1921 को लुधियाना में हुआ। शुरूआती नाम अब्दुल था और बाद में उन्होंने खुद को साहिर नाम दिया ज़मींदार परिवार में जन्मे साहिर ने भारतीय समाज के सामंती व्यवस्था को घर से हीं देखना शुरू किया। जब उनके पिता ने माँ सरदार बेग़म को बेदखल किया तब साहिर ने अपनी माँ का साथ चुना। सामाज में महिलाओं की स्थिति उनके असीमित दुःख को साहिर ने अपनी माँ के ज़रिये देखा और महिलाओं के लिए बनायी गयी इस दोयम दर्ज़े के सामाजिक ढांचें के खिलाफ लिखा। फिल्म साधना में लिखा एक गीत जो सिर्फ़ उस वक़्त की महिलाओं की स्थिति तक सिमित नहीं रही वो आज की स्तिथि पर सटीक बैठती है।

औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया।

जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया।

एक जनवादी शायर और गीतकार जहाँ जनता के अधिकारों की पैरवी करता है, वही शासक को आईना भी दिखाता है। साहिर इसी जनवाद के पैरोकार थें। साहिर प्रगितिशील लेखक संघ (PWA ) के मेंबर थें वहीँ समाज को उजाले की तरफ ले जाने के उपाय भी ज़ाहिर कर रहें थे।

संसार के सारे मेहनतकश खेतों से मिलों से निकलेंगे

बेघर बेदर बेबस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे

दुनिया अम्न और ख़ुशहाली के फूलों से सजाई जाएगी

वो सुब्ह हमीं से आएगी

शायर जो भविष्य जनता हैं, जिसने हिंदुस्तान की आने वाली नश्लों की ज़रूरत बताई। जिसमें सबसे ज़रूरी था इंसान बने रहना, जिसने इंसान होने की परिभाषा और मक़सद दोनों को बताया। आज जब  मुल्क में सेकुलर होना गुनाह हो जाए तो साहिर के लिखे इस गीत को हमें दोहराने की ज़रूरत है।

तू हिन्दू बनेगा, मुसलमान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा  

साहिर की बात हो और मुहब्बत का ज़िक्र हों ऐसा मुनासिब नहीं है | साहिर ने मुहब्बत लिखा पर आसमानी नहीं, दुनियावी और ज़मीनी लिखा जिसमें ग़रीबी भी है, भुखमरी भी है , बेबसी भी है |

एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर,

हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

साहिर ने अपनी बात हर लहजे में कही, पर गुस्सा और दुनिया को देखकर उठती परेशानी उनके शब्दों का प्रमुख हिस्सा रहें:

आज से मेरे फ़न का मकसद जंजीरे पिघलाना है

आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊंगा।

आज जब हम साहिर की सौंवीं जन्मदिवस मना रहें हैं तब हम आज के वक़्त में साहिर  और  उनकी गीतों और ग़ज़लों की ज़रूरत को महसूस कर रहें है | आज देश के हर हिस्से में अशांति का माहौल है, अधिकारों का हनन है, कला और संस्कृति पर पहरें हैं| देश का हर वर्ग चाहे वो महिला, विद्यार्थीं, नौजवान, किसान ,दलित, आदिवासी हो वह संघर्षरत है |आज के दौर में हिम्मत के लिए हमें साहिर के लिखें गीतों को सुनने और ग़ज़लों को बैठ कर पढने की बेहद ज़रूरत है | साहिर के शेर उम्मीद की वो किरण भी है जिसका हम इंतज़ार कर रहें हैं

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें

वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं