सम्पादकीय

तो क्या अब किसान आंदोलन कमजोर पड़ रहा है?, क्या किसान घरों को वापिस लौट रहे हैं?, आपको क्या लगता है कि आप कब तक मोर्चों पर बैठे रहेंगे?, क्या आपको लगता है कि किसानों की जीत होगी? ये सवाल आज कल आप में से कईयों ने सुने होंगे। किसी को किसी पत्रकार ने पूछा होगा या किसी सज्जनदोस्त ने या शायद विदेश में बैठे किसी रिश्तेदार ने। खैर इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि पूछने वाला कौन है, पर जरूरी बात यह है कि इन सवालों के ईमानदार जवाब क्या है।

ये तो सच है कि सारे मोर्चों के ऊपर लोगों की तादाद कुछ कम हुई है। पर गिनती कम होने का मतलब आंदोलन का कमजोर पड़ना नहीं होता। हमें पता है कि हमारी लड़ाई लंबी है और लंबी लड़ाईयां हमेशा धीरज और योजना से ही जीती जाती हैं। वापिस गांवों में जा के फसल को कटाई, बिजाई करके एक और मौसम के लिए पूरी तैयारी से लौटना भी उसी का हिस्सा है। अलग अलग राज्यों में जाकर सभाएं आयोजित करना, चुनाव प्रचार में देश की जनता से बीजेपी को वोट देने का अपील करना भी उसी योजना का हिस्सा है। पिछले दिनों बंगाल में #NoVoteToBJP के बैनर तले बड़ी सभा हुई, जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने भी हिस्सा लिए। इन सभाओं में उमड़ती हजारों की भीड़ किसान आंदोलन के और तीव्र होने की निशानी ही तो है।  दूसरी तरफ मोर्चे पर डटे लोग ट्रालियों से तिरपाल उतार करके बांस के घर बनाने में लगे हैं, ताकि जिस दृढ़ता के साथ हमने सर्दी का सामना किए उसी दृढ़ता के साथ अब गर्मी का भी कर पाएं। कईयों ने तो गोदी मीडिया के झूठे प्रचार, कि किसान वापस लौट रहे हैं, के जवाब में पक्के घर भी बना दिए ताकि इस सरकार को कान हो जाएं कि अबकी बार इस किसान आंदोलन को उठाना उसके बस की बात नहीं। किसानों ने गर्मी की तैयारियां करके अपनी तरफ से फिर एक बार सबको बता दिया कि हम तब तक जाने वाले नहीं जब तक सरकार तीनों खेती कानून वापिस नहीं लेती। मीडिया को जवाब देने की बारी अब सरकार की है कि किसान आंदोलन कब तक चलेगा।

रही बात जीत की तो हम पिछले साढ़े तीन महीनों में भी बहुत सारी जीत हासिल कर चुके हैं। किसान आंदोलन ने पूरे देश की आम जनता को फिर से अपने हकों के लिए लड़ना सिखा दिया है। सरकार के नफरत और सांप्रदायिकता के एजेंडे के ऊपर किसानों ने प्यार और भाईचारे की जीत हासिल की है। मगर हमें ये भी याद रखना होगा की जीत के साथ साथ हमारे सामने भविष्य की लड़ाईयां भी कर खड़ी होने लगी हैं। रेलेवे, हवाई जहाज, बीमा, कृषि के साथसाथ सरकार अब सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण का खेल भी खेल रही है। निजीकरण की प्रक्रिया हमारे रोजगार के अवसरों सामाजिक सुरक्षा पर एक बड़ा हमला है। देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण से किसानों, छात्रनौजवानों, गरीबों को मिलने वाले सारे कर्जे बंद हो जाएंगे और वे निजी मालिकों के अधीन हो जाएंगे। निजीकरण की प्रक्रिया पर रोक लगाने तथा सार्वजनिक संस्थाओं के तंत्र को और भी चुस्तदुरुस्त करने की मांग को लेकर भी हमें लड़ाई लड़नी होगी।