
‘जब तक संभव हुआ हम विरोध प्रदर्शन करते रहेंगे’
“किसी भी माता-पिता को अपने बच्चे को खोने का दुख न सहना पड़े,” सरविक्रमजीत सिंह हुंदल कहते हैं, जिनके पुत्र नवरीत सिंह की मृत्यु 26 जनवरी को दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हो गई थी।

“किसी भी माता-पिता को अपने बच्चे को खोने का दुख न सहना पड़े,” सरविक्रमजीत सिंह हुंदल कहते हैं, जिनके पुत्र नवरीत सिंह की मृत्यु 26 जनवरी को दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हो गई थी।
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
आंदोलन के संदर्भ में अधिकतर शाहजहांपुर मोर्चे का नाम भुला सा दिया जाता है, मैं इसे एक परित्यक्त बच्चे की उपमा देता है। इस लेख में अपने हेमकुंट फ़ाउंडेशन के साथ एक सेवादार होने के इस मोर्चे पर हुए अपने अनुभव लिख रहा हूँ। यह मोर्चा बाक़ी मोर्चों के बनिस्पत छोटा है
किसी भी आंदोलन को खड़ा करने के साथ साथ आन्दोलन को जीवित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। दिल्ली की सीमाओं पर भले ही इसे 112 दिन हुए है पर पंजाब में 9 महीने से ज्यादा हो गए है। इस आंदोलन की एक बड़ी ताकत यह है कि युवा पीढ़ी ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है।
अध्यक्ष ने कहा – “सदन ये जानना चाहता है कि इन बर्बाद किसानों की समस्या को शासन कैसे हल करेगा?”
मंत्री ने वक्तव्य दिया – “अध्यक्ष महोदय! ऐसी समस्याओं को हल करने का यही एकमात्र और अचूक तरीका हमारे पास है।
बिहार की राजधानी पटना में 18 मार्च 2021 को गेट पब्लिक लाइब्रेरी के मैदान में हजारों की गिनती में राज्य के कोने कोने से किसान मजदूर इक्ट्ठा हुए। उन्होंने दिल्ली की सरहदों पर चल रहे किसान आंदोलन को समर्थन देते हुए कहा कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए
100 से अधिक दिन और उनके पीछे 300 मौतें, किसान की धैर्य, दृढ़ संकल्प और संकल्प से अचंभित हैं। फसल कटाई का मौसम चल रहा है और किसान सावधानी के साथ फसल कटाई की योजना बना रहे हैं। गाजीपुर मोर्चा में प्रबंधन समिति ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और अन्य राज्यों के प्रत्येक गाँव की भागीदारी के लिए एक रोस्टर बनाया है।
छात्र कई बार इस गलतफहमी में रहते है की विचारधारा, आधार और राजनीतिक ताकत के रूप में सिर्फ छात्र राजनीति में ही बाक़ी रही है। जमीनी राजनीति से अनवरत निराशा का भाव पर तो सवाल उठता है जब जन आंदोलनों की समितियों की मीटिंग में क्रांतिकारी बदलावों पर हो रही चर्चाओं को आप सुनते है।
दोपहर के सूरज का सफेद प्रकाश उसके चश्मे के पीछे उसकी आंखों को छुपा रहा था। मैंने उससे एक फोटोग्राफर के रूप में पूछा यदि वह कैमरे के लिए चश्मा हटाना पसंद करेगी। उन्नीस वर्षीय कमल मुस्कुराती हुई अनिच्छा से कहती है “वो तो मेरी पहचान है ना”।
जिन्होनें उम्र भर तलवार का गीत गाया है
उनके शब्द लहू के होते हैं
लहू लोहे का होता है
जो मौत के किनारे जीते हैं
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VOICE OF THE FARMERS PROTEST
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