ਸੰਪਾਦਕੀ
ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਵਿਚ ਖੇਤੀ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਤੇ ਬਹਿਸ ਹੋਈ ਤਾਂ ਸਾਰੀਆਂ ਹੀ ਵਿਰੋਧੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਨੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀ ਹਮਾਇਤ ਕੀਤੀ। ਕਾਂਗਰਸ ਦੇ ਗ਼ੁਲਾਮ ਨਬੀ ਅਜ਼ਾਦ ਨੇ ਪਗੜੀ ਸੰਭਾਲ ਜੱਟਾ ਲਹਿਰ ਦਾ ਹਵਾਲਾ ਦੇ ਕੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਵੀ ਖੇਤੀ ਕਾਨੂੰਨ ਵਾਪਸ ਲੈਣੇ ਪਏ ਸਨ
ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਵਿਚ ਖੇਤੀ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਤੇ ਬਹਿਸ ਹੋਈ ਤਾਂ ਸਾਰੀਆਂ ਹੀ ਵਿਰੋਧੀ ਪਾਰਟੀਆਂ ਨੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀ ਹਮਾਇਤ ਕੀਤੀ। ਕਾਂਗਰਸ ਦੇ ਗ਼ੁਲਾਮ ਨਬੀ ਅਜ਼ਾਦ ਨੇ ਪਗੜੀ ਸੰਭਾਲ ਜੱਟਾ ਲਹਿਰ ਦਾ ਹਵਾਲਾ ਦੇ ਕੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਵੀ ਖੇਤੀ ਕਾਨੂੰਨ ਵਾਪਸ ਲੈਣੇ ਪਏ ਸਨ
ਸਿੰਘੂ ਬਾਰਡਰ ਦੇ ਆਸ ਪਾਸ ਬਸਤੀਆਂ ਚ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਜਵਾਕ ਸਾਡਾ ਕਿਤਾਬਾਂ ਵਾਲਾ ਟੈਂਟ, ‘ਠੇਕਾ ਕਿਤਾਬ’ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ, ਵੇਖ ਕੇ ਭੱਜੇ ਆਏ “ਦੀਦੀ ਆਪ ਪੜ੍ਹਾਉਗੇ ਹਮੇੰ?” ਹੁੰਗਾਰਾ ਭਰਨ ‘ਤੇ ਦੂਜੇ ਹੀ ਦਿਨ ਤੋਂ ਟੋਲੀਆਂ ਬੰਨ ਕੇ ਆਉਣ ਲੱਗ ਪਏ।
ਕਿਸਾਨੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਵਿਚਲੀ ਬਹਿਸ ਦਾ ਝੁਕਾਅ, ਖਾਸਕਰ 26 ਜਨਵਰੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਖੇਤੀ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਦੇ ਨਫ਼ੇ ਨੁਕਸਾਨਾਂ ਤੋਂ ਅੱਗੇ ਵੱਧ ਕੇ ਘੋਲ ਦੇ ਢੰਗ ਤਰੀਕਿਆਂ ਵੱਲ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਬਹਿਸ ਵਿਚ ਕੁਝ ਧਾਰਨਾਵਾਂ ਉਭਰੀਆਂ ਹਨ – ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੀਆਂ ਭਾਵਨਾਵਾਂ ਅਤੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਏਕਾ।
कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा
यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने
यह कमीज़ जो ढाल बनी है
तेलंगाना विद्रोह को औपचारिक रूप से वेट्टी चकिरी उदयम / तेलंगाना बंधुआ मजदूर आंदोलन के रूप में जाना जाता था। इसे तेलंगाना रायतांगा सयुध पोराटम (तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष) भी कहा जाता था। यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में तेलंगाना क्षेत्र के दमनकारी सामंती प्रभुओं / जमींदारों के खिलाफ
आज से साढ़े पांच साल पहले मैं शिव कुमार के साथ जेल में रहा था। लगभग 16 दिन हम दोनों ने सोनीपत जेल में एक ही बैरक में बिताए। मैंने पहली बार देखा कि कैसे जाति की वजह से उसे सफाई के काम के लिए बार बार कहा जाता और हमने इस मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया। उस समय भी हमें झूठे केस में ही फंसाया गया था।
शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन ने सांस्कृतिक रूप से जन जागरण का स्वरूप अख्तियार कर लिया है। इस आंदोलन में हरियाणवी, राजस्थानी और केरल सहित देश के विभिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक मंडलियों ने अपनी जन जागृति की प्रस्तुति दी। एक पूरा दिन तो सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का ही रखा गया था।
गेहूँ की कुशाग्र मूँछों पर गिरी वृष्टि की गाज
काली-काली भुङुली वाली बाली हुई अ-नाज़
हुए अन्नदाता ही दाने-दाने को मोहताज
भिड़े कुकुरझौंझौं में राजन महा ग़रीबनवाज़
“हम चुनौतियों से लड़ने के तरीके खोज निकालेंगे लेकिन किसी से डरकर रिपोर्टिंग करना नहीं छोड़ेंगे।” ये कहना है स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया का जिन्हे कुछ दिन पहले पुलिस ने सिंघु बॉर्डर से उठाकर जेल मे बंद कर दिया। मनदीप पुनिया शुरुआत से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को कवर कर रहे हैं।
1907 में पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन और 2020 से जारी किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएँ
इतिहास कई अर्थों में ख़ुद को दोहराता है। बहुत बार अतीत में हुई घटनाओं के आईने में हमें वर्तमान दिखाई देता है।
वैसे भी हम लोकतंत्र दिवस, अंतराष्ट्रीय स्तर पर ही तो मनाते आये है, खैर,, राष्ट्रीय लोकतंत्र तो वैसे खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। अब हमारे पास आखिर उत्सवधर्मीता से मनाने लायक लोकतंत्र रहा ही कहाँ है?
चित्र और प्रतीकवाद किसी भी विमर्श के अभिन्न अंग हैं। वे एक को दूसरे से वरीयता देकर लोकप्रिय धारणा का निर्माण करते हैं। 26 जनवरी को लाल किले की प्राचीर पर निशान साहिब के ध्वजारोहण ने उस नैतिक स्तर को ठेस पहुँचाया, जिसे प्रदर्शनकारी किसानों ने हासिल किया था।
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