भारत में खेती और गाँव-देहात का हाल – एक परिचय

  • नेटवर्क ऑफ रूरल एंड अग्रेरियन स्टडीज की 2020 वार्षिक रिपोर्ट से साभार; अनुवादक – सिद्धार्थ जोशी

 

ग्रामीण भारत की बिगड़ती स्थिति देश की नीतियों और राजनीतिक रणनीतियों के लिए एक जटिल चुनौती के रूप में उभर कर आयी है। कोविड-19 से पहले भी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से जूझ रही थी। कोविड-19 के फैलने और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के बाद, प्रवासी मज़दूरों के पैदल घर लौटने के दयनीय दृश्यों ने इस विशाल मानवीय संकट की तरफ देश का ध्यान आकर्षित किया है। ग्रामीण भारत के बारे में गहराई से विचार करने की तत्काल आवश्यकता है। इसके बावजूद, विविध विचारों और विचारधाराओं के बीच भविष्य की कोई स्पष्ट दिशा दिखाई नहीं देती। भारतीय खेती और गाँव-देहात के साथ पिछले दस वर्षों के जुड़ाव के अनुभव के आधार पर एनआरएएस यह रिपोर्ट प्रकाशित कर रहा है, जिसके दो भाग हैं।

पहले भाग में, हम वर्तमान की प्रमुख और प्रभावशाली नीतियों और दृष्टिकोणों, और इनके ग्रामीण निवासियों, क्षेत्रों, आजीविका और पारिस्थितिकी के लिए निहितार्थ को रेखांकित करते हैं। दूसरे भाग में, हम ग्रामीण भारत के लिए सामाजिक रूप से समतापरक, आर्थिक रूप से स्थिर, पारिस्थितिक रूप से स्थायी और राजनीतिक रूप से लोकतांत्रिक नीतियों के कार्यान्वयन के लिए वैकल्पिक विचार, पद्धति और दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।

1960 के दशक में भारत की कृषि रणनीति में एक महत्पूर्ण बदलाव हुआ जिसके तहत ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादकता के मंत्र को सर्वोपरि मानकर, देश के सिंचित इलाकों में कुछ ख़ास फसलों पर ही ध्यान केंद्रित किया गया। हालांकि इससे कृषि विकास दर और खाद्य उत्पादन में तेजी आई है, लेकिन एक खेत में एक ही फसल (मोनोकल्चर) की पद्धति के चलते कृषि-पारिस्थितिकी विविधता और अलग अलग कृषि क्षेत्रों से जुड़ी पद्धतियों की विविधता का भारी नुकसान भी हुआ है। मोटे अनाज और दालों जैसी फसलों को सबसे कम महत्व दिया गया है, और बारिश पर निर्भर कृषि क्षेत्रों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। ज़्यादा लागत वाला औद्योगिक कृषि का यह मॉडल भारत में खेती करने का स्थापित तरीका बन गया। स्वाभाविक रूप से अस्थायी और जोखिम भरे इस मॉडल ने ग्रामीण भारत के प्राकृतिक संसाधनों (भूमि, जल और जंगल) पर अत्याधिक दबाव डाला है। भारतीय कृषि दीर्घकालिक विकास के जिस रस्ते पर है, वह पारिस्थितिक रूप से अस्थिर और सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण साबित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इन रुझानों को और बलवती बना रहा है।

कृषि में हुए इन बदलावों को और प्रखर बनाने का काम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के गैर-कृषि क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों ने किया है जिसने पिछले कुछ वर्षों में गांव-देहात में अभूतपूर्व संकट को जन्म दिया है। इस बात में अब कोई दो राय नहीं है कि कृषि में रोजगार के स्थिर रहने या घटने की स्थिति में, पारिवारिक अर्थव्यवस्था में गैर-कृषि क्षेत्र का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। भारत में हाल के वर्षों में गैर-कृषि रोजगार की वृद्धि धीमी रही है।

ग्रामीण संकट के कई लक्षण सामने हैं जैसे आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या, महिलाओं और बच्चों में व्यापक कुपोषण, बीमारियों का बढ़ता बोझ और स्वास्थ्य देखभाल पर आसमान छूता खर्च। पूंजी, लोगों, संसाधनों, प्रौद्योगिकियों और मैले की आवाजाही गाँव और शहर के बीच के संबंधों को नया आकार दे रही है जिसका सीधा और गंभीर असर पारिस्थितिकी, स्वास्थ्य और समाज पर हो रहा है।

ग्रामीण भारत को अपनी स्थिरता और अपने अधिकांश लोगों की समृद्धि के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण की सख्त ज़रुरत है। यह समझना भी ज़रूरी है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था बृहत्तर पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग है। इसका अर्थ है कि सह-अस्तित्व या परस्पर-निर्भरता के सिद्धांतों के आधार पर हमें अपने उत्पादन और उपभोग के पैटर्न को नया रूप देना होगा।

कृषि और ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों (खाद्य, फाइबर, खनिज, वन संपदा) के दोहन पर आधारित रही है और आधुनिक औद्योगिक कृषि में मान्यता रखने वाले नीति निर्माता, वैज्ञानिक और उद्योगपति इन संसाधनों के सही मूल्य को पहचानने में असफल रहे हैं। पर्यावरण को भी एक नाले में बदल दिया गया है, जिसमें हर तरह के कचरे को फेंक दिया जाता है। हमें इस मुद्दे को संरचनात्मक रूप से संबोधित करना चाहिए और इन संबंधों को दोहन से सह-अस्तित्व में बदलना चाहिए जो कृषि-पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण पर केंद्रित हो, और हमें स्थानीय समुदायों की पद्धतियों और उनके ज्ञान प्रणालियों से निकलने वाली समझ और विज्ञान की समझ, दोनों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

इसके लिए हमें शहरी और ग्रामीण के बीच, उद्योग और कृषि के बीच और कृषि और गैर-कृषि के बीच पारंपरिक वैचारिक विभाजन को भी चुनौती देनी होगी। श्रम को पारिस्थितिक रूप से उपयुक्त, सार्थक और संतोषजनक बनाना होगा। वर्तमान में हमारे सामने मौजूद आजीविका के संकट को देखते हुए, ग्रामीण की समस्या को स्वयं गांव को ही निरर्थक बनाकर हल नहीं किया जा सकता है। ऐसी प्रौद्योगिकियों और बाजार संबंधों को विकसित करने की ज़रुरत है जो विविध ग्रामीण रोज़गारों को पूरी तरह से विस्थापित करने के बजाय उनके विकास में सहयोगी हों।

अन्त में, इस वैकल्पिक दृष्टिकोण को व्यवहार में लाने के लिए पारंपरिक मानकों और संकेतकों को छोड़कर, नए पैमानों का निर्माण करने की आवश्यकता होगी। हमें सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) में विकास की दर के पीछे भागना छोड़ना होगा। मूल्यांकन के नए पैमानों में पारिस्थितिक स्थिरता को “हरित” विकास के प्रमुख संकेतक के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। क्या हम कृषि से मिलने वाली पारिस्थितिक सेवाओं, किसानों द्वारा संरक्षित की जाने वाली कृषि-जैव विविधता, और किसान द्वारा पैदा किया जा सकने वाले स्वस्थ भोजन को मान्यता प्रदान करके, उसका मूल्य किसान को दे सकते हैं? ये वैकल्पिक संकेतक हमें अपनी गतिविधियों के पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभावों का आकलन करने, सकारात्मक और नकारात्मक प्रक्रियाओं के गोलाकार सम्बन्ध को समझने और सूचित निर्णय लेने में हमारी मदद करेंगे।

वेब लिंक – http://www.ruralagrarianstudies.org

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