आख़िर अपनी जमीन छोड़, विस्थापित होने के लिए क्यों मजबूर हो रहे हैं चीली (Chile) के किसान?

धरती के पश्चिमी गोलार्ध में स्थित, एक छोटा-सा देश चीली, आज उन देशों की गिनती में आता है, जो सूखे की समस्या से बुरी तरह से ग्रसित है। 2010 से चीली में बारिश की कमी से उत्पन्न सूखे ने, वहाँ के किसानों की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं। मौसम विज्ञान के जानकारों की मानें तो इस बदले हालात ने “मेगा-ड्राउट” (बारिश न होने के कारण अत्यंत सूखा पड़ना) जैसी स्थिति पैदा कर दी है। आज चीली का लगभग 76% हिस्सा सूखे की चपेट में है।

सूखे ने किसानों की आजीविका को किस तरह से प्रभावित किया है, यह हम मर्ता मोरालेस (एक किसान) के जीवन में आए परिवर्तनों को देखकर बखूबी समझ सकते हैं। मोरालेस, 35 वर्षीय एक छोटी ज़ोत वाली किसान हैं। उन्हें ग्रामीण मध्य चील स्थित अपना गृहनगर, जिसका नाम कोएगुआय है, छोड़ने को विवश होना पड़ा। वहाँ वे एक एकड़ के प्लॉट पर सब्ज़ियाँ उगाया करती थी। पर बीते पिछले दशक से अप्रत्याशित बारिश और मौसम ने, इस इलाके की खेती को खासा प्रभावित किया है। सब्ज़ियों के पैदावार पर भी इस बदलाव का सीधा असर पड़ा और खेती में बने रहना मोरालेस के लिए मुश्किल होता चला गया।

अख़बार को दिए गए साक्षात्कार में मोरालेस बताती हैं कि पहले पहाड़ों से निकलती धाराओं का उपयोग वे खेतों में पानी पटाने के लिए किया करती थी, पर अब पहले की तरह बारिश नहीं होती है और पर्वत से आने वाली सारी धाराएँ सूख गई हैं। लगातार पानी की समस्या से जूझते हुए, वहाँ के किसानों ने महसूस किया कि अब वहाँ और रुकना मुमकिन नहीं है। फलत: धीरे-धीरे किसान शहर की ओर पलायन करने लग गए। इसके फलस्वरूप वहाँ के तीन स्कूल हमेशा के लिए बंद हो गए। अपने गाँव को छोड़ना, मोरालेस की लिए एक अत्यंत ही कठिन फ़ैसला था। अपनी मिट्टी और प्रकृति से अलग होना हृदयविदारक होता है और यही हुआ मोरालेस के साथ।

चीली में आए इस विपदा के विभिन्न कारण हैं। इसे हम “ला निन्या” से उत्पन्न प्रभावों  के संदर्भ में भी समझ सकते हैं, पर मैं यहाँ आपका ध्यान मानव जनित जलवायु परिवर्तन की ओर ले जाना चाहूँगा। मध्य और दक्षिणी चीली के लैंड्स्केप में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला बदलाव हमें साफ़-साफ़ देखने को मिलता है। इसके प्रमुख कारणों में से एक है – यहाँ मौजूद पेड़ों की निरंतर कटाई। चीली के उत्तर में स्थित मोण्टे पात्रिया, एक ऐसा प्रांत है, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण आंतरिक विस्थापन का पहला मामला देखा गया। इस प्रांत में रहने वाले लगभग 15% किसान अपने गाँव को छोड़ रोज़गार की तलाश में शहर जा चुके हैं। यही हाल बाकी जगहों का भी है।

अंगूर की खेती करने वाले, अर्तुरो एर्रेरा रोमान बताते हैं कि पहले बारिश नियमित थी और  साल में सिर्फ़ एक या दो बार खेतों में पानी की व्यवस्था उन्हें करनी पड़ती थी। पर अब हालात बदल गए हैं और पिछले पाँच सालों से सिंचाई के लिए पानी का प्रबंध ठीक तरह से नहीं हो पा रहा है। नतीजतन, अब खेती में बने रह पाना नामुमकिन-सा हो चला है। इस इलाके में अर्तुरो की तरह पहले अनेक किसान अंगूर की खेती किया करते थे। आज सिर्फ़  कुछ मुट्ठी भर किसान बच गए हैं। अर्तुरो बताते हैं कि आने वाले सालों में खेती करना और भी कठिन व असहनीय हो जाएगा।

छोटे जोत वाले किसानों के लिए खेती, इसलिए भी मुश्किल हो रही है, क्योंकि नव-उदारवादी नीतियों के तहत, चीली में मौजूद पानी का सम्पूर्ण निजीकरण हो चुका है। हालांकि वहाँ का संविधान सभी के लिए  “access to water”  सुनिश्चित तो करता है, पर हक़ीक़त में यह सिर्फ़ काग़ज़ी दावा मालूम पड़ता है। पानी के उपयोग पर पूरी तरह से निजी कंपनियों का वर्चस्व है। धनी किसान, अधिक पैसे चुका कर सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था आसानी से कर लेते हैं मगर छोटी जोत वाले किसानों के लिए यह विकल्प मौजूद ही नहीं है। उदाहरण के लिए, एवोकाडो की खेती करने वाले बड़े एग्रीबिजनेस कंपनियों को, जिनका औसत मुनाफा अधिक है और वे पैसे के दम पर सिंचाई के पानी की व्यवस्था करने में छोटी जोत वाले किसानों से बेहतर स्थिति में हैं, पानी के निजीकरण का फायदा मिलता है। चीली में पैदा किए गए एवोकाडो से ब्रिटेन के मार्केट पटे रहते हैं। सालाना  लगभग 17,000 टन एवोकाडो चीली से ब्रिटेन आता है। ब्रिटेन समेत अन्य यूरोपीय देशों में एवोकाडो की माँग को पूरा करने के लिए पानी की पूरी सप्लाई इस तरफ़ मोड़ दिया जाता है। नतीजतन, बाकी इलाक़ों में सूखे की स्थिति के कारण लोग, पीने वाले पानी तक को तरस जाते हैं। 1 किलो एवोकाडो के उत्पादन में लगभग 2000 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। पेट्रोरका, जहां की एवोकाडो की सबसे अधिक खेती होती है, वह सूखाग्रस्त इलाक़ों की गिनती में आता है। यहाँ  एवोकाडो की खेती के लिए औसतन 1,00,000 लीटर पानी की हर रोज़ ज़रूरत है। सारी व्यवस्था निजी हाथों में होने के कारण पानी के उपयोग पर नियंत्रण बड़े ऐग्रिबिज़्निस अपने अनुसार करते हैं और छोटे किसान और आम जन के लिए यहाँ पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध नहीं हो पाता है। 2011 में चीली के सरकारी विभाग के एक प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार लगभग 65 अवैध भूमिगत चैनल के माध्यम से प्राइवेट ऐग्रिबिज़्निस पानी का चोरी से इस्तेमाल कर रहे थे।

अगर हम एक नज़र इतिहास पर डालें, तो पाएँगे की इस समस्या के जड़ में वाटर कोड है। वाटर कोड तानाशाह पिनोचे के समय लागू किया गया था। इसमें मौजूद संहिता के तहत पानी के उपयोग का अधिकार सबसे अधिक बोली लगाने वाले व्यक्ति के पास जाता है। इस कोड के अस्तित्व में आने के बाद से नदियों, ग्लेशियरों और भूमिगत जल के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय फर्मों को बेचा जाता रहा। मुख्य रूप से खनन और बड़े पैमाने पर होने वाले  कृषि को इसका सीधा फायदा मिला।

चीली में पानी के निजीकरण और अवैध निष्कासन के खिलाफ लड़ने वाले एक्टिविस्ट पर हमला अब आम बात हो चली है। छोटे किसानों के लिए अब यहाँ खेती करना मुश्किल है और इसलिए युवा रोज़गार की तलाश में उत्तर में स्थित खानों की तरफ पलायन कर रहे हैं। बिग एग्रीबिजनेस पर्यावरण और लोकल इकोसिस्टम के साथ-साथ पेट्रोका जैसे इलाक़ों का सामाजिक ताना-बाना और सांस्कृतिक पहचान भी नष्ट कर रहा है। ट्रक के माध्यम से लोगों को पीने का पानी मुहैया कराया जा रहा है, जिसका रंग हल्का पीला होता है और उसमें से क्लोरीन की गंध आती है। पिछले साल चीली ने नए संविधान के पक्ष में वोट किया था। वाटर ऐक्टिविस्ट्स को लगता है कि नए संविधान के बाद पानी के बेलगाम निजीकरण पर रोक लगेगी। मगर जब तक, पानी का पूर्ण रूप से राष्ट्रीयकरण नहीं होता है तब तक चीली के किसान और आम जनता पानी के संकट से जूझते रहेंगे।