भूमि संकट से जूझता उत्तराखंड

भाजपा की अटल सरकार ने ख़त्म की पहाड़ी राज्य की अवधारणा:

राज्य में जनता की मांग के विपरीत हरिद्वार जनपद को जोड़ कर तत्कालीन भाजपा सरकार ने पर्वतीय राज्य की अवधारणा को ख़त्म कर दिया था। उसने इस नवोदित राज्य की संरचना को ही पूरी तरह बदल दिया। हरिद्वार का क्षेत्रफल उत्तराखंड में मात्र 5 प्रतिशत है। जबकि राज्य बनते समय राज्य की कुल आबादी में हरिद्वार का हिस्सा 20 प्रतिशत था। इसी तरह राज्य की कृषि भूमि के मामले में भी जो 14 प्रतिशत कृषि भूमि थी उसमें अकेले 5 प्रतिशत हरिद्वार की है। यानी कुल कृषि भूमि का लगभग 35 प्रतिशत। इसका नतीजा यह हुआ कि आबादी के हिसाब से विकास कार्यों का 20 प्रतिशत बजट और कृषि पर मिलने वाली सुविधाओं का 35 प्रतिशत अकेले राज्य के 5 प्रतिशत क्षेत्रफल हरिद्वार में जाने लगा। राज्य बनने के बाद संशाधनों के इस असमान वितरण के कारण पहाड़ से पलायन तेजी से बढ़ने लगा। इस पलायन से राज्य के मैदानी क्षेत्रों में आबादी का घनत्व और बढ़ता गया। इसने विकास और राज्य द्वारा पूंजी निवेश में पहाड़ और मैदान के बीच की खाई को और भी चौड़ा कर दिया है। यही नहीं राज्य विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व के मामले में भी यह खाई और चौड़ी होती जा रही है। भविष्य में होने वाले चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के बाद उत्तराखंड विधान सभा में पहाड़ मैदान का अनुपात क्रमशः 35-65 तक पहुंच सकता है।

उत्तराखंड में भूमि संकट:

उत्तराखंड राज्य का गठन हुए 21 वर्ष होने जा रहे हैं। इन 21 वर्षों में अब तक हमारे पास राज्य की भूमि संबंधी सही आंकड़े मौजूद नहीं हैं। जिन अनुमानित आंकड़ों के आधार पर हमारी सरकार और विशेषज्ञ योजनाएं बना रहे हैं वे कतई विश्वसनीय नहीं हैं। ये आंकड़े सन् 1958-64 के बीच हुए अंतिम बंदोबस्त के हैं। तब से अब तक इन साठ वर्षों में मानव जनित कृत्यों और प्राकृतिक आपदाओं ने यहाँ की भोगोलिक व भूमि संरचना में काफी बदलाव कर दिया है।

राज्य निर्माण के समय बताए गए आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड राज्य लम्बाई में पूरब से पश्चिम 358 किमी, चौड़ाई में उत्तर से दक्षिण 320 किमी है। कुल क्षेत्रफल 53483 वर्गमील और कुल भूमि का रकबा 5592361 हैक्टेयर है। इसका 88 प्रतिशत भू-भाग पर्वतीय व 12 प्रतिशत भू-भाग मैदानी है। राज्य की भूमि के कुल रकबे में से 3498447 हेक्टेयर भूमि में वन थे। कृषि भूमि मात्र 831225 हेक्टेयर थी। इसके अलावा बेनाप-बंजर 1015041 हेक्टेयर, ऊसर तथा अयोग्य श्रेणी 294756 हेक्टेयर है। इस तरह अगर देखें तो नवम्बर 2000 में उत्तराखंड की कुल भूमि का 63 प्रतिशत वन, 14 प्रतिशत कृषि, 18 प्रतिशत बेनाप-बंजर और 5 प्रतिशत बेकार (अयोग्य) भूमि थी।

अगर पहाड़ में कृषि भूमि के आंकड़ों पर नजर डालें तो सन् 1823 के बंदोबस्त के समय पहाड़ में 20 प्रतिशत भूमि पर खेती होती थी। मगर सन् 1865 में अंग्रेजों द्वारा वन विभाग का गठन करने और वन कानूनों को लागू करने के बाद किसानों के हाथ से जमीनों के छिनने का सिलसिला शुरू हो गया था। सन् 1958 के अंतिम बंदोबस्त के समय उत्तराखंड में (हरिद्वार को छोड़कर) मात्र 9 प्रतिशत कृषि भूमि ही बची थी। ताजे अनुमान के अनुसार राज्य बनने के बाद इन 21 वर्षों में राज्य की कृषि भूमि में से 1 लाख हैक्टेयर से ज्यादा भूमि कृषि से बाहर निकल चुकी है। गौर करने लायक बात है कि इस दौरान गरीब व सीमांत किसानों की जमीनें ही मुख्य रूप से खेती से बाहर निकली है।

देश भर में जमीन बांटने वाली सरकारों ने हड़पी पहाड़ के किसानों की जमीन:

आजादी के बाद इन सात दशकों में सरकार विकास और योजनाओं के नाम पर पहाड़ के किसानों की जमीनें लूटने में लगी रही। पंचायत भवनों, जन मिलन केन्द्रों और सामुदायिक भवनों के नाम पर ही सरकार किसानों की 1 प्रतिशत जमीन छीन चुकी है। इसी तरह स्कूल, कालेज, उच्च व तकनीकी शिक्षा संस्थानों, स्वास्थ्य केन्द्रों–अस्पतालों, क्रीड़ा स्थलों आदि के लिए किसानों की कुल कृषि भूमि का लगभग 7 प्रतिशत से ज्यादा जमीनें सरकार के खाते में निशुल्क जा चुकी हैं। इन 73 वर्षों में हमारे शहरों-कस्बों व सड़कों का भी 2 गुना से 200 गुना तक विस्तार कृषि भूमि में ही हुआ है। ऊर्जा प्रदेश के नाम पर हमारी सबसे उपजाऊ नदी घाटी की जमीनों को 558 जल विद्युत परियोजनाओं की भेंट चढ़ाया जा रहा है। अकेले टिहरी बाँध ही पहाड़ की कुल कृषि भूमि का 1.5 प्रतिशत हिस्सा निगल गया। इसके अलावा 17 राष्ट्रीय पार्कों व वन विहारों से सरकार सैकड़ों गावों को उनकी जमीनों से बेदखल करने की तैयारी कर रही है।

यानी जिन सरकारों ने भूमिहीनों–आवासहीनों और गरीब किसानों को जमीनें बाटनी थी, वही सरकारें विकास की कीमत वसूली के रूप में गरीब किसानों की जमीनें निशुल्क लेकर उन्हें भूमिहीन बनाती गई। इससे पहाड़ का कृषि क्षेत्र लगातार घटता जा रहा है। सबसे खतरनाक बात तो यह है कि जिन सरकारी भवनों व योजनाओं के लिए पहाड़ के गरीब किसानों की खेती की जमीनें निशुल्क ली गई, उनमें से कुछ को सरकार पीपीपी मोड के नाम पर पूंजीपतियों को सौंपती जा रही है। हमारी गौचर और पनघट की जमीनों के सौदे सरकारें देहरादून में बैठ कर कर रही हैं, जिसकी जानकारी किसानों को जमीनों पर पूंजीपतियों के बलात कब्जे के बाद मिलती है। आज पहाड़ में भूमि के कुल क्षेत्रफल का 6 प्रतिशत के करीब ही कृषि भूमि बची है।

प्राकृतिक आपदा से बदला भूगोल:

इसी दौरान प्राकृतिक आपदा ने भी पहाड़ के भूगोल व भूमि संरचना को काफी बदल दिया है। सन् 2006 तक 233 गाँव पूरी तरह तबाह होकर पुनर्वास की बाट जोह रहे थे, इसके बाद पूरी तरह तबाह हुए गाँवों का इस लिस्ट में नाम जुड़ना अभी बाकी है। इसके अलावा पहाड़ के ज्यादातर गांवों की कुछ न कुछ कृषि भूमि प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ी है। ऐसी स्थिति में जमीन के पुराने आंकड़ों को दोहराते रहने का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है।

उत्तराखंड में 80 प्रतिशत किसान भूमिहीन की श्रेणी में:

सन् 2000 के आंकड़ों पर नजर डालने से पता चलता है कि राज्य की कुल 831225 हेक्टेयर कृषि भूमि 854980 परिवारों के नाम दर्ज थी। इनमें 5 एकड़ से 10 एकड़, 10 एकड़ से 25 एकड़ और 25 एकड़ से ऊपर की तीनों श्रेणियों की जोतों की संख्या 108883 थी। इन 108883 परिवारों के नाम 402422 हेक्टेयर कृषि भूमि दर्ज थी। यानी राज्य की कुल कृषि भूमि का लगभग आधा भाग। बाकी पांच एकड़ से कम जोत वाले 747117 परिवारों के नाम मात्र 428803 हेक्टेयर भूमि दर्ज थी। उक्त आंकड़े दर्शाते हैं कि किस तरह राज्य के लगभग 12 प्रतिशत किसान परिवारों के कब्जे में राज्य की आधी कृषि भूमि थी और लगभग 80 प्रतिशत कृषक आबादी भूमिहीन की श्रेणी में पंहुच चुकी थी।

उत्तराखंड में भूमि सम्बन्धी कानून और उनका इतिहास:

अंग्रेजी राज में भू कानून – सन् 1815 में कुमाऊँ गढ़वाल पर कब्जा करने के बाद अंग्रेजों ने पहाड़ की भू राजस्व व्यवस्था से कोई बड़ी छेड़छाड़ नहीं की। 1816 में उन्होंने यहाँ पुलिस, भूलेख और भू राजस्व कि व्यवस्था के लिए 16 पटवारी पदों का गठन किया। पर भू राजस्व वसूली के लिए पहले से चली आ रही मालगुजार, थोबदार और पधान की व्यवस्था को बनाए रखा। उन्हें यहाँ से ज्यादा राजस्व की उम्मीद नहीं थी। पर अपने अनुकूल की जलवायु पाकर वे इसे अपना आश्रय स्थल बनाना चाहते थे। इस लिए उन्होंने राजस्व व भू व्यवस्था को पहले की तरह ही रखा। हां यहाँ के वनों का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए उन्होंने योजना बनाई। सन् 1865 में सबसे पहले वन विभाग का गठन कर अंग्रेजों ने वनों को सरकारी वन घोषित किया। इससे यहाँ के किसानों में उपजे असंतोष के बाद अंग्रेजों ने संयुक्त प्रांत में अपने अधीन के पर्वतीय क्षेत्र के लिए सन् 1874 में “शिड्यूल डिस्ट्रिक्ट एक्ट” बनाया था। इसके तहत पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को एक विशेष श्रेणी देकर कई सहूलियतें भी दी जाती थी।

सन् 1931 में लागू “पंचायती वन नियमावली” को भी अंग्रेजों ने सन् 1927 में बन चुके वन कानून से बाहर “शिड्यूल डिस्ट्रिक्ट एक्ट” के अधीन रखा, जिसके कारण हमारी वन पंचायतें वन कानून के दायरे से बाहर रही। इसके अलावा सरकारी वनों से गांव वालों को घास व चारागाह की छूट के साथ वर्ष में एक पेड़ “हक” के रूप में दिया गया। सन् 1893 में अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण कानून के साथ पहाड़ की बेनाप–बंजर भूमि को “रक्षित वन भूमि” घोषित करने के लिए एक शासनादेश जारी किया था। मगर पहाड़ के किसानों के भारी विरोध के बाद उन्हें “गवर्नमेंट ग्रान्ड्स एक्ट 1895” लाना पड़ा जिसके तहत कमीश्नर को किसानों-भूमिहीनों के लिए जमीन के पट्टे आवंटित करने का अधिकार दिया गया। इसी तरह 1911 के वन बंदोबस्त के बाद वनों से किसानों के अधिकारों में और कटौती की गयी। इसके खिलाफ किसानों ने विरोध स्वरुप 1915-16 तक लगातार सरकारी वनों को आग के हवाले किया। पहाड़ के किसानों के इस व्यापक विरोध के बाद अंग्रेजों को पर्वतीय क्षेत्र में किसानों के लिए वन पंचायतें गठित करने पर मजबूर होना पड़ा था।

आजादी के बाद पहाड़ में भू कानून:

“शिड्यूल डिस्ट्रिक्ट एक्ट” के तहत ही सन् 1948 में इस क्षेत्र के लिए “कुमाऊँ नयावाद एंड वेस्ट लेंड एक्ट” लाया गया जिसके तहत तब तक बेनाप भूमि में विस्तारित हो चुकी आबादी व कृषि क्षेत्र को कानूनी मान्यता दी गई। यह एक्ट 1973 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने निरस्त कर दिया और इसकी जगह पर “गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट 1895” लागू कर जिलाधिकारियों को बेनाप भूमि के पट्टे देने का अधिकार दे दिया। पर पट्टे पर दी गई भूमि का स्वामित्व राज्य सरकार का ही रहा। बाद में सन् 1976 में नयी वन पंचायत नियमावली लाकर वन पंचायतों को 1927 के वन कानून के मातहत ला दिया गया। सरकार के इस कदम का किसानों ने विरोध किया।

कूजा एक्ट के जरिए पहाड़ की खेती पर बड़ा हमला:

आजादी के बाद हुए एकमात्र बंदोबस्त के बीच सन् 1960 में ही उत्तर प्रदेश सरकार ने तत्कालीन पर्वतीय आठ जिलों के लिए अलग से “कुमाऊँ उत्तराखंड जमींदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून” (कूजा एक्ट) बनाकर लागू कर दिया था। उत्तर प्रदेश जमींदारी विनास एवं भूमि व्यवस्था कानून में पंचायतों को बेनाप–बंजर, परती–चरागाह, पनघट–पोखर, तालाब–नदी आदि जमीनों के प्रबंध व वितरण का अधिकार दिया गया था। यह अधिकार देश के अन्य राज्यों में भी पंचायतों को हासिल है। ये जमीनें पंचायतों के नाम दर्ज होती हैं और ग्राम पंचायतें अपनी “भूमि प्रवंध कमेटी” के माध्यम से इस भूमि का प्रवंध व जरूरत मंदों में वितरण करती हैं। मगर कूजा एक्ट से इस प्रावधान को साजिशन हटा दिया गया और पहाड़ की ग्राम पंचायतों को इस भूमि के प्रवंध व वितरण का अधिकार नहीं दिया गया। यही कारण है कि पहाड़ की ग्राम पंचायतों में भूमि प्रवंध कमेटी की व्यवस्था नहीं है। नतीजे के तौर पर इन पचास वर्षों में जहाँ अन्य राज्यों में कृषि क्षेत्र का काफी विस्तार हुआ वहीँ “कूजा एक्ट” के माध्यम से इन पर्वतीय जिलों में कृषि क्षेत्र के विस्तार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यही नहीं पर्वतीय क्षेत्रों के लिए हर विकास कार्य में जैसे स्कूल, कालेज, अस्पताल, तकनीकी संस्थान, स्टेडियम, पंचायती भवन आदि के लिए किसानों की नाप भूमि निशुल्क सरकार को देने की शर्तें भी लगा दी गई।

उत्तराखंड राज्य जिसका अपना भू कानून नहीं:

शायद उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा जिसका अपना कोई एक भूमि सुधार कानून नहीं है। राज्य बनने के 21 वर्ष हो जाने के बाद भी हमारी सरकारें राज्य में एक नया भूमि सुधार कानून बनाने के प्रति कहीं से भी चिंतित नहीं दिख रही हैं। अभी भी हमारे राज्य में “उत्तर प्रदेश जमींदारी विनास एवं भूमि व्यवस्था कानून” ही लागू है। पर्वतीय क्षेत्र के जिलों में इसके साथ ही सन् 1960 में बना “कुमाऊँ उत्तराखंड जमींदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून” (कूजा एक्ट) भी लागू है। इस तरह प्रदेश के अन्दर पहाड़ी क्षेत्र के लिए अलग–अलग दो भूमि सुधार कानून लागू हैं जिन्हें पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाया था।

राज्य बनने के बाद भू कानूनों में बदलाव – उत्तराखंड जब बना था, तब बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीदने की आशंका को देखते हुए भाजपा सरकार ने ही 2002 में हिमाचल के भूमि कानून के अनुसार अध्यादेश पेश किया था। बाद में तिवारी सरकार द्वारा गठित एक कमेटी ने उस अध्यादेश में सम्मिलित प्रावधानों की समीक्षा कर, उसमें जुड़े कुछ कठोर नियमों को सरल कर दिया था। इसके कारण उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में बेरोकटोक भूमि व्यापार का धंधा चल निकला। इसमें तिवारी सरकार ने एक व्यवस्था की जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में जो व्यक्ति मूल अधिनियम की धारा 129 के तहत सन् 2003 से पूर्व जमीन का खातेदार न हो, वह बिना अनुमति के 500 वर्गमीटर से अधिक जमीन नहीं खरीद सकता है। खंडूरी सरकार के आने पर इसकी सीमा घटा कर 250 वर्गमीटर तय की गयी। 250 वर्ग मीटर से अधिक की खरीद न करने के आदेश को उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक में चुनौती दी गयी थी, उच्चतम न्यायालय ने 250 वर्ग मीटर तक भूमि सीमा को सही माना था। न्यायालय के इसी आदेश के खिलाफ भाजपा की त्रिवेन्द्र सरकार ने विधानसभा में भूमि खरीद की सीमा पर लगी लगाम हटायी है।

अब तो भू माफिया की सरकार:

हाल के सालों में उत्तराखंड की तब की त्रिवेन्द्र रावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने वहाँ लागू “उत्तर प्रदेश जंमीदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950” में एक बड़ा बदलाव किया। इस कानून के अंर्तगत धारा 143 जो भू उपयोग से सम्बंधित है, में बदलाव कर कृषि भूमि को गैर कृषि के लिए बिना भू उपयोग बदले इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी गयी। इस संशोधन को इस धारा के ‘क’ में सम्मिलित किया गया है। इस संशोधन से कृषकों की उपज देने वाली जमीन अन्य उद्योग धंधों को खोलने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। इसी तरह धारा 154 जो पहले प्रदेश में साढ़े बारह एकड़ से अधिक कृषि भूमि को खरीदने से रोकता है, अब इसमें संशोधन करके उप धारा-2 जोडऩे से पर्वतीय क्षेत्र में उद्योग के लिए भूमि की खरीद की सीमा हटा दी गयी है। इन्वेस्टर समिट से पहले त्रिवेन्द्र सरकार ने नई पर्यटन नीति बनाकर पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया है। अब उत्तराखंड में होटल, रिजॉर्ट, रेस्टोरेंट, मनोरंजन पार्क, एडवेंचर, योग केंद्र, आरोग्य केंद्र, कन्वेंशन सेंटर, स्पा, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और हस्तशिल्प आदि कुल 28 गतिविधियों को पर्यटन उद्योग की श्रेणी में शामिल किया गया है। इतना ही नहीं चिकित्सा, स्वास्थ्य और शिक्षा भी ‘औद्योगिक प्रायोजन’ में शामिल हैं। ऐसे में इन तमाम गतिविधियों के लिए ली जा रही जमीन औद्योगिक प्रायोजन में जोड़ी जाएगी। इस तरह वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा पहाड़ की कृषि भूमि की भारी लूट के दरवाजे खोल दिए गए हैं।