पेरू में भूमि सुधारों का दौर और किसान आंदोलन

पेरू के किसानों के जीवन में 1969 के भूमि सुधार के  बाद आए परिवर्तनों को समझने के लिए पेरू के पारम्परिक ग्रामीण संरचना को समझना अनिवार्य है। ग्रामीण पेरू में खेती; तटीय और पहाड़ी भागों में विभाजित है। अगर हम उत्पादन संबंध की बात करें तो, 1969 के पूर्व इन इलाकों में भूस्वामियों का वर्चस्व था। तटीय छेत्र में खेती आधुनिक और पूंजी प्रधान थी और मुख्यतः यहाँ गन्ना और कपास उगाया जाता था। यहाँ के भूस्वामियों का पेरू की राजनीति में ख़ासा प्रभाव भी रहता था। खेतों में काम करने के लिए मज़दूरों को स्थायी तौर पर रखा जाता था और उन्हें  एक निर्धारित वेतन मिलता था। कटाई के वक्त अतिरिक्त श्रमिकों की ज़रूरत को पूरा करने के लिए अस्थायी तौर श्रमिकों को भी रखा जाता था। खेतों में काम करने वाले श्रमिक, आपरा (APRA एक सुधारवादी पार्टी) के यूनियन के साथ जुड़े हुए थे। एक सुधारवादी यूनियन से जुड़े रहने के कारण श्रमिकों के माँग भी बहुत सीमित थे; जैसे की  बेहतर काम करने की स्थिति और अधिक वेतन। पहाड़ी क्षेत्र में पारंपरिक  खेती के अलावा खनन की भी प्रमुखता थी। इसके अलावा  पशुपालन भी यहाँ के लोगों का पेशा रहा है। यहाँ किसान यूनियन मौजूद नहीं था।मगर ऐतिहासिक रूप से यह कई सारे किसान विद्रोहों का केंद्र रहा था। ठीक तरह से संगठित नहीं होने के  कारण, इनको हुक़ूमतों ने आसानी से कुचल दिया। इन दोनों ही जगह (तटीय और पहाड़ी) एक समानता  थी। भूमि का अधिकांश हिस्सा कुछ लोगों के हाथों में सिमटा हुआ था। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में हर तरफ़ सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ काफ़ी तेजी से बदल रही थी। पेरू भी इन बदलावों से अछूता नहीं रह सका। बदलती परिस्थितियों में, साम्राज्यवाद ने पेरू पर  अपनी पकड़ मजबूत करनी चाही और नतीजतन किसानों पर इन बदलावों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। पासको और खुनीन जैसे प्रांतों में खनन गतिविधियों के विस्तार के फलस्वरूप किसानों की एक बड़ी आबादी गांवों से पलायन करके इन इलाकों में बसने लगी और इस तरह उनका रूपांतरण आधुनिक श्रमिकों में हो गया। इन बदलावों का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि उन्हें श्रमिक यूनियन से जुड़ने का मौक़ा मिला और उनके राजनीतिक चेतना का भी विकास हुआ। जब सीएरा में भूस्वामियों ने सामुदायिक चारागाह को अपने क़ब्ज़े में लेना शुरू किया तब इसके विरोध में 1959-64 के बीच लगातार कई किसान विद्रोह हुए। कुछ विद्रोहों के उपरांत सामुदायिक चारागाह को भूस्वामियों के क़ब्ज़े से छुड़वा लिया गया और कुछ विद्रोहों को सरकार ने निर्ममता से कुचल दिया। इन्हीं में से एक विद्रोह ने,  हूगो बलाँको के नेतृत्व में ना सिर्फ़ भूस्वामियों को मनमानी लगान देने से इनकार किया बल्कि सफलतापूर्वक  आसीएंदा के ज़मीन को अपने नियंत्रण में भी कर लिया। जब फ़र्नांडो बेलाउंडे टेरी, पेरू के राष्ट्रपति बने तो भूस्वामियों के दवाव में उन्होंने पेज़ंट फ़ेडरेशन को निर्ममता से कुचला। कुछ सालों बाद, पेरू के किसानों के बढ़ते असंतोष को देखते हुए जेनरल वेलास्को को, कुछ कदम  भूमि सुधार के तरफ़ बढ़ाने पड़े। पेरू के अमीर लोगों ने इस कदम का खुल कर विरोध किया और इस कदम को उन्होंने वामपंथी भटकाव तक  करार दिया। जेनरल वेलास्को ने खुले तौर पर कुलिनतंत्र (ऑलिगार्की) को पेरू के आर्थिक विकास के लिए रुकावट माना और इसलिए ज़मीन को किसानों के बीच बांटने की बात कही। जेनरल वेलास्को के किए गए भूमि सुधार को समाजवादी भूमि सुधार नहीं समझा जा सकता है क्यूँकि इसमें भूस्वामियों को बहुत सी रियायत दी गयी थी। पर फिर भी सुविधा भोगी भूस्वामियों को  तकलीफ़ तो हुई ही और भूमि सुधारों को निष्क्रिय करने के लिए उन्होंने भी अपना संगठन बनाया। वहीं सरकार के ढूल-मूल रवैये से निराश और भूस्वामियों के बढ़ते आक्रमण के ख़िलाफ़ किसानों ने भी मोर्चा सम्भाला।

परूवीयन पेज़ंट कन्फ़ेडरेशन (सी॰पी॰पी॰), पेरू का एक किसान संगठन था  जो छोटे किसानों के मुद्दों को ज़ोर-शोर  से उठाता था। 1960 के शुरुआत में सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी। 1974 में कुछ अन्य संगठनों की मदद से परूवीयन पेज़ंट कन्फ़ेडरेशन ने फिर से अपनी सक्रियता बढ़ाई जिसके बाद से, भूमिहीन किसानों के बीच लगातार इस संगठन का विस्तार हुआ। परूवीयन पेज़ंट कन्फ़ेडरेशन (सी॰एन॰ए॰), पेरू के दो बड़े किसान संगठनों में गिना जाता था । नैशनल ऐग्रिकल्चरल कन्फ़ेडरेशन भी एक किसान संगठन था जो कि किसानों के बीच काफी सक्रिय रहा। इसकी स्थापना 1973-74 के बीच हुई थी। 1981 में  सी॰पी॰पी॰ ने राष्ट्रीय स्तर पर मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में कूसको और पुनो ( पेरू के गाँव)  के किसानों ने भूमि सुधार जैसे मुद्दों को उठाया था और संगठन को भूमि सुधार हेतु रोड मैप बनाने को कहा।

70 और 80 का दशक किसानों के विद्रोहों का दशक  रहा। इन विद्रोहों को अगर हम गौर से अध्ययन करेगें तो पाएँगे की जेनरल वेलास्को द्वारा किए गए भूमि सुधारों से किसान असंतुष्ट थे। भूमि सुधारों को लागू करने का तरीक़ा किसानों को बिल्कुल पसंद नहीं था। अधिकारी, जो कि अपने आप को नस्लीय तौर पर बेहतर समझते थे, अक्सर किसानों के साथ बुरा व्यवहार किया करते थे। भूमि सुधारों का लाभ व्यापक किसान आबादी को नहीं मिल पाया था और कुछ क्षेत्र में यह बिल्कुल असफल रहा था। हालाँकि इन सुधारों से किसानों की कुछ ज़रूरतों की भरपाई की गयी थी पर इससे कोई दूरगामी समाधान नहीं निकला। किसान आंदोलन का यह दौर, पेरू के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दौर था और पेरू के किसानों  और किसान संगठनों के जुझारू संघर्ष से हम आज भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।