किसान जन-आन्दोलन में बढ़ता आक्रोश

उदय चे

मुल्क के किसान पिछले चार महीने से जनविरोधी तीन खेती कानूनों को रद्द करवाने के लिए बड़े ही व्यवस्थित व अनुशासनिक तरीके से दिल्ली की सरहदों पर बैठे है। लेकिन इसके विपरीत भारत की फासीवादी सत्ता किसानों को सुनने की बजाए पहले दिन से किसानों के खिलाफ झुठा प्रचार कर रही है। मुल्क की सत्ता के इस व्यवहार से साफ जाहिर हो गया है कि सत्ता बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के लिए काम कर रही है और उसी के प्रति ही जवाबदेह है। मुल्क के सम्राट ने साफ संदेश दे दिया है कि सम्राट जनता का चौकीदार न होकर WTO, टाटा, अम्बानी, अडानी का चौकीदार है।

ऐतिहासिक जन-आन्दोलन कड़कड़ाती सर्दी से तपती गर्मी में प्रवेश कर रहा है। आन्दोलन जितना लम्बा होता जा रहा है। वैसे-वैसे किसानों के धैर्य का बांध टूटता जा रहा है। 27 मार्च को पंजाब के भाजपा विधायक अरुण नारंग जो किसान कानूनों के पक्ष में प्रेस वार्ता करने जा रहे थे तब आंदोलनकारी किसानों ने विधायक को घेर लिया। विधायक की बुरी तरह पिटाई करते हुए उनका काला मुँह कर दिया। किसानों में इतना ज्यादा आक्रोश था कि किसानों ने विधायक को नंगा कर दिया। पुलिस विधायक को बचाने के लिये एक दुकान के अंदर ले गयी। किसान दुकान के बाहर 2 घण्टे बैठे रहे।

इससे पहले हरियाणा में भी किसान मुख्यमंत्री की रैली को उसके गृह हल्के में विफल कर चुके है। जननायक जनता पार्टी के नेताओं को दौड़ा चुके है। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला अपने गृह जिले सिरसा में सार्वजनिक कार्यक्रमों में नही जा पा रहे है। टोहाना से जेजेपी विधायक देवेंद्र बबली प्रेसवार्ता में स्वीकार कर चुके है कि सत्ता पक्ष का कोई विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री सार्वजनिक गांव में नही जा पा रहा है। गांव में जाने के लिए उनको लोहे के हेलमेट की जरूरत पड़ेगी। हरियाणा के सांपला में जहां चौधरी छोटूराम का स्मारक बना हुआ है। अपने जन्मदिन पर बीरेंद्र सिंह ने सांपला में छोटूराम के स्मारक में एक कार्यक्रम रखा हुआ था। लेकिन किसान वहां इस कार्यक्रम के खिलाफ इकठ्ठा हो गए। उसके बाद कार्यक्रम के आयोजकों को लठो से दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। घटना के वीडियो में साफ-साफ किसानों का गुस्सा व आयोजको का डर देख सकते है कैसे बाइक रैली में शामिल नौजवान बीरेंद्र की तस्वीर छपी टीशर्ट को उतार कर फेंक रहे है। बीरेंद्र समर्थको के चेहरे पर जो डर है वो साफ-साफ देखा जा सकता है।

किसान आक्रोशित क्यों हो रहे है? 

इस आक्रोश को समझने के लिए इस आन्दोलन के सफर को जानना जरूरी है। पंजाब से चला किसान आन्दोलन जो धीरे-धीरे जन-आंदोलन में तब्दील होता गया। इस जन-आंदोलन ने सरदार अजीत सिंह के किसान आन्दोलन की यादें एक बार फिर से ताजा कर दी। एक ऐसा किसान आन्दोलन जो 9 महीने तक अंग्रेज सरकार के खेती कानूनों के खिलाफ चला था। वर्तमान किसान आन्दोलन ने पूरे विश्व में अपनी छाप छोड़ी है। इस आन्दोलन ने साफ सन्देश दिया कि उनकी लड़ाई चौकीदार से लड़ने तक सीमित न होकर उसके लुटेरे साम्राज्यवादी मालिक से है।

किसान आन्दोलन 26 मार्च को 4 महीने पूरे कर चुका है। वैसे पंजाब में चले इस आन्दोलन के समय को जोड़ लिया जाए तो ये बहुत ज्यादा लम्बा समय हो जाएगा। 26 नवंबर पंजाब व पंजाब के लगते हरियाणा के किसान जत्थेबंदियों का दिल्ली की तरफ कूच करना, केंद्र सरकार के इशारे पर हरियाणा की फासीवादी सत्ता के द्वारा गैर संवैधानिक तरीके से पंजाब के लगती सभी सरहदों को अंतरराष्ट्रीय सरहदों की तरह बैरिकेडिंग करके बंद किया गया। दिल्ली को जाने वाले हरियाणा के सभी रास्तो को जगह-जगह जे.सी.बी से खुदवा दिया गया। कंटीले तार से बाड़ की गई, भारी भरकम पत्थर सड़क पर डाल दिए गए। लेकिन आंदोलनकारी किसान सरकार के इन सब इंतजामो को ताश के पत्तो की तरह आसमान में उड़ा कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते गए। हरियाणा का किसान जो इस समय तक चुप बैठा हुआ था वह पंजाब के किसानों के साथ मजबूती से आ खड़ा हुआ। सरकार ने हरियाणा की जनता को पंजाब की जनता से लड़वाने के बहुत ज्यादा प्रयास किये। लेकिन हरियाणा की जनता सत्ता के विभाजनकारी षड्यंत्र को ठुकराते हुए किसान आंदोलन का हिस्सा बन गई।

पूरे मुल्क में अलग-अलग जगहों पर किसान महापंचायत हुई। इन महापंचायतों में करोड़ो मजदूर-किसानों ने हिस्सेदारी की, महिला किसानों की संख्या इस आन्दोलन में बढ़ते क्रम में रही है। लेकिन दूसरी तरफ सत्ता का रुख किसानों के प्रति नरम पड़ने की बजाए कठोर से कठोरतम होता गया। हरियाणा के कृषि मंत्री जयप्रकाश दलाल ने किसानों की मौत का ठहाके लगाते हुए मजाक बनाया व जाहिलाना बयान दिया। ऐसे ही हरियाणा से राज्यसभा सांसद रामचन्द्र जांगड़ा ने किसानो को निकम्मा, निट्ठल्ला, फ्री की रोटी तोड़ने वाले दारूबाज कहा। भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने किसानों को आतंकवादी और दलाल कहा। सत्ता के लिए काम करने वाला गोदी मीडिया तो दिन रात ही सत्ता के इशारे पर किसानों के खिलाफ भ्रामक प्रचार करता ही रहता है। प्रधानमंत्री महोदय ने तो किसान आन्दोलनकारियों को नया नाम आन्दोलनजीवी व परजीवी ही दे दिया। पिछले दिनों हरियाणा में विपक्षी कॉग्रेस पार्टी द्वारा विधान सभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। इस अविश्वास प्रस्ताव ने उन सभी राजनेताओं को नंगा कर दिया जो जनता में तो किसान हितैसी बनने का ढोंग कर रहे थे लेकिन जब विधान सभा में किसान के हित में खड़ा होने की बात आई तो इन नेताओं ने किसानों की पीठ में छुरा घोंप दिया। सत्ता द्वारा किसानों को मुल्क का गैर राजनीतिक नागरिक मानने की बजाए सत्ता का राजनीतिक दुश्मन मान लिया। 

सत्ता ने किसानों के साथ वार्ता करने का जो ढोंग किया। सत्ता की इस दोमुंही चाल, सत्ता के जाहिल व तानाशाही रुख, सत्ता का अमानवीय व्यवहार के कारण ही किसान जो शांति से आंदोलन कर रहा था वो अब सत्ता के खिलाफ आक्रोशित हो रहा है। किसानों का धैर्य जवाब देता जा रहा है। भविष्य में अगर सत्ता इसी तरह अड़ियल व्यवहार करती रहेगी व किसानों की जायज मांग तीन खेती कानूनों को रद्द नही करती है तो मुल्क को हिंसा को तरफ धकेलने की गम्भीर साजिश कर रही है।