सुखप्रीत के अनुभव

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सुखप्रीत, जो पी॰एस॰यू॰ के साथ पांच सालों से काम कर रही है, मजदूरों के परिवार से आती है। उसके पिता, जो केवल पांचवीं कक्षा तक ही अपनी शिक्षा पूरी कर पाए थे, हमेशा सुखप्रीत को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करते आए हैं कि वह जितना चाहती है, उतना पढ़ सकती है। वह कहती है, “शिक्षा ऐसी चीज है जिसे मैंने हमेशा महसूस किया है कि मैं जितना अपने ख़ुद के लिए कर रही हूँ, उतना ही अपने परिवार के लिए कर रही हूँ लेकिन उसकी सक्रियता का सबसे ज्यादा विरोध उसके पिता और उसके भाई ने मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से किया। मजदूरी का ही काम करतीं उसकी माँ और तीन बड़ी बहनें, उसकी सक्रियता की समर्थक रहीं हैं।

 सुखप्रीत इन बाधाओं के सामंती और पितृसत्तात्मक स्वभाव को देखती है और अपने परिवार की स्थिति को समझती है। जब सुखप्रीत ने जत्थे की गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया, तो इस बात से उसके गाँव के ज़मींदार नाराज़ हो गए, जिन्होंने फ़िर इसके बारे में उसके पिता से आपत्ति जताई। किसानों के विरोध प्रदर्शन शुरु होने के बाद ही गाँव के ज़मींदारों ने सुखप्रीत की सक्रियता की सराहना करना शुरू किया और सार्वजनिक मंच से भाषण देने की खबर उसकी सराहना करते हुए उसके परिवार को दी।

वह समझती है कि ज़मींदार सवर्णों द्वारा वर्षों से हुए शोषण के बावजूद भी कई दलित कृषि कानूनों के विरोध में शामिल होने पर आपत्ति क्यों उठा रहे हैं? वह कुछ दलितों के बीच धार्मिक आक्रोश के बारे में भी अवगत है, जिसकी वजह से वे तीन कृषि कानूनों को जमींदारों के दंड के रूप में देख रहे हैं, लेकिन वह इसे गलत समझती हैं। सुखप्रीत दृढ़ता से कहती है कि वह इस बात को लेकर स्पष्ट है कि वह जमींदार किसानों के साथ एकजुटता में टिकरी सीमा पर क्यों बैठी है।हम सभी कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं।और यह कानून इसे पूरी तरह से नष्ट कर देंगे।इसके अलावा, वह खुद को एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में देखती है और महसूस करती है कि छात्र राजनीति ने व्यापक स्तर पर अन्याय के खिलाफ जागरूकता बढ़ाई है। उसने व्यक्तिगत रूप से 2018 में कश्मीर बंद के खिलाफ आंदोलन में और पिछले साल हुए सीएएएनआरसी विरोध प्रदर्शन में भाग लिया है।