संघर्ष के अपने रास्ते

Photo by Jaskaran Singh

देश के हजारों गरीब आदिवासियों, मेहनतकशो, और वंचितों के कुर्बानी गगनभेदी नारे और डूबती जिंदगियों के गीतों का असर अब शहरो कस्बो में दिखाई पड़ने लगा है। फासिस्ट सरकार खादी+खाकी वर्दी सरकारी हथियारों के बल प्रयोग से जन संघर्ष को कैद करने की कितनी भी साजिश कर ले, ऐसी क्रूर व्यवस्था को उखड़ना ही होगा जो जन और जन अधिकारों की रक्षक नहीं भक्षक हो। मोदी इण्डिया के नये चमकते हुये चेहरे के प्रतीक पांच प्रतिशत उद्योगपतियों और उद्यमियों की छींक से सरकार हिलने लगती है किन्तु 95 फीसदी भारत के मेहनतकशो, वंचितों, छोटे किसानों की आवाज क्यों नहीं सुनाई देती? जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, मतदान का अधिकार सब मौलिक अधिकार है, पर जब इनका हनसंसाधनों पर बाजार की ताकतवर शक्तियाँ अपना एकाधिकार जमा रही है इनके लिये तो सरकार खुद ही हिंसा करती है। यह इतना नियोजित है कि कभी यह लगता ही नहीं है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हिंसा कर रही है। इससे व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ता है  ऐसे दिग्भर्मित लोकतंत्र में जन और जन अधिकारों की रक्षा की अपेक्षा किससे की जायेगी।जिसने आज़ादी के 74 सालो तक गरीब को और गरीब बनाया और अमीरो को और अमीर। ऊपर से लेकर नीचे तक सब दागदार है। सरकार ऐसी व्यवस्था बनाती है जिससे उसके आराम में खलल पड़े और उसके शोषण करने के विशेष अधिकार सुरक्षित रहे। पर समाज मरे हुए लोगों का समूह नहीं है। वह सोचता है, समझता है और उठ खड़ा होता है। तब उठा खड़े होने के उसके अपने तरीके होते हैं। अपनेअपने तरीकों से न्याय का बिगुल बजाने वाले ये लोग एक दूसरे से जुड़ने लगेंगे। देश मरा नहीं है। देश देख रहा है और जब भी जरूरत पड़ेगी वह उठ खड़ा होता है और अपना लक्ष्य हासिल कर लेता है। वह अपने इन नवाचारी तरीकों के बता देता है कि उसे सत्ता के हर षड़यंत्र की जानकारी है। जिसका भंडाफोड़ कर उचित समय पर जबाब देने के लिए बेसब्री से जनता इंतजार कर रही है।न होता है तब हर मामले में अन्याय होता है। पर भारतीय व्यवस्था न्याय को मौलिक अधिकार नहीं मानती है। वर्तमान समय में अति गरीब और सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे परिवारों के जीवन का अधिकार भी संकट में है। ऐसे अनगिनत सवाल है जिससे समाज में शांति और सुरक्षा की संभावनाओं के मद्देनजर सरकार को विचार करना चाहिए। 

रोटी, आजीविका, संसाधन और सम्मान जीवन के वे हिस्से हैं जिनका तो दान किया जा सकता है ही बलिदान। यदि इन्हें छीना जायेगा तो प्रभावित समूह निश्चित रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। उपेक्षित जनता कैसी प्रतिक्रिया देगी, सरकार अच्छी तरह जानती है यह कतई नहीं मानना चाहिए कि लुटने वाले गरीब आदिवासी तो घनेगहरे जंगलों में रहते हैं और वे व्यवस्था को चुनौती कैसे दे सकते है? यह सोचना भ्रम है। जनता की ताकत के आगे खाकी वर्दी और सरकारी हथियारों की सीमा रेखा के बीच इस जन संघर्ष को कैद करने की साजिश में सरकार कतई सफल नहीं होगी। 

सरकारी देखरेख में विकास की मंत्रोउच्चारण कर उद्योगपति और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, जिनके लिये फोरलेन सड़कें बन रही हैं, और बिजली का निर्माण हो रहा है। ये बड़े ही सुनियोजित ढंग से जल, जंगल और जमीन के