मैक्सिको के आंदोलनरत किसान

इतिहास के कई पेचीदे पड़ावों से गुजरते हुए मेक्सिको के किसानों ने औपनिवेशिक ताक़तों से ले कर साम्राज्यवादी मगरमच्छों तक का डट कर सामना किया है।  इस लम्बे और संघर्षशील इतिहास की एक झलक हमें तब देखने मिलती जब 1990 के बाद हुए  कृषि सुधारों का जिक्र आता है, जिसका खामियाजा मेक्सिको के किसान अभी तक भुगत रहे हैं। मैक्सिको संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के नवउदारवादी नीतियों का शिकार होता आया है। अमेरिका की नज़र मेक्सिको समेत अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों के बाजारों पर हमेशा से रही है। बाजार पर कब्जा जमा कर और चुनावों में खूब सारा पैसा झोंक कर वो, दक्षिण अमेरिकी देशों की संप्रभुता का गला घोटता रहा है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, मेक्सिको के माथे पर अपनी नाकामयाबी का ठीकरा फोड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते थे। ट्रंप ने मेक्सिको की सरहद पर एक लम्बी दीवार खड़ी की और अमेरिका के काम कर रहे मेक्सिकन नागरिकों के खिलाफ खुल कर दुष्प्रचार किया। मेक्सिकन नागरिकों पर हो रहे न्यूज़ चैनल के डिबेट  “बर्बरता या सभ्यतावाले पुराने  विमर्श की याद दिलाते रहेजिसका  उपयोग अमेरिकी शासक वर्ग अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए करता रहता है।

नवउदारवादी सुधारों का दौर और किसान आंदोलन।

80 और 90 के दशक में हुए नव उदारवादी सुधारों ने  दक्षिण अमेरिकी किसानों की कमर तोड़ दी।  मेक्सिको ने 1999  में घरेलू मक्का और फलियों पर मूल्य की गारंटी समाप्त कर दी जिसके सीधा असर अनाज उपजाने वाले किसानों की आय पर पड़ा। मैक्सिकन फार्मिंग एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, व्यापार मंत्रालय ने 1994 के बाद से लगातार एनएएफ़टीए (NAFTA) द्वारा निर्धारित कोटा को पार करने की अनुमति दी है। घरेलू मूल्य नियंत्रण समाप्त करना  एक  किसान विरोधी कदम था जिसके  समाप्त होते ही उत्पादों की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय अनाज बाजारों द्वारा निर्धारित किया जाने लगा। अंतरराष्ट्रीय बाजारों द्वारा निर्धारित क़ीमतों का मैक्सिको में उत्पादन की लागत से कोई संबंध नहीं होता है और इसलिए मैक्सिकन किसान चाहते थे की आयात पर अधिक नियंत्रण के अलावा, सरकार किसानों को सब्सिडी दे ताकि वे अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। एनएएफ़टीए द्वारा किए गए सुधारों का भी फ़ायदा ज़्यादातर बड़े किसानों को हुआ और छोटे किसान बाज़ार की इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए। परिणामस्वरूप छोटे किसानों के एक बड़े तबके का संपत्तिहरण हुआ और उन्हें मजदूर बन कर अपना श्रम शक्ति बेचने पर मजबूर होना पड़ा।

2006 में मेक्सिको के प्रेसिडेंट रहे, कालदेरों ने (जो की  कन्सर्वटिव ख़ेमे के नेशनल एक्शन पार्टी के हैं) भी नवउदारवादी नीतियों को खूब बढ़ावा दिया। इसके फलस्वरूप, अमेरिका से आयात किए जाने वाले अमेरिकी मकई, सेम, चीनी और पाउडर दूध पर सभी आयात शुल्क समाप्त कर दिए गए। एक लाख से अधिक ग्रामीण मैक्सिकन किसानों  की आजीविका इस कदम से खतरे में गई। सरकार की पूंजी परस्त नीतियों के खिलाफ  देशभर के किसानों ने  अपना  विरोध प्रकट किया और आंदोलन को बढ़ाने के लिए राजधानी का रुख किया यहाँ किसानों ने एक विशाल ट्रैक्टर परेड का नेतृत्व किया। कम दूध की कीमतों से नाराज डेयरी किसान ने भी, गायों के झुंड के साथ ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े हो कर इस विरोध में अपना स्वर बुलंद किया। मेक्सिको की सरकार द्वारा अमेरिका पूंजीपतियों को दी गयी  खुली छूट के कारण मेक्सिकन बाज़ार  अमेरिका से उत्पादित पाउडर  दूध और अनाज से लदा रहता है। अमेरिका से आयातित  पाउडर दूध और अनाज, स्थानीय उत्पादन पर ख़ासा बुरा प्रभाव डालते हैं। 2008 में प्रकाशित एक रिपोर्ट की मानें तो प्रतिवर्ष लगभग 150,000 टन पाउडर दूध मैक्सिको में प्रवेश करते हैं। इसके अलावा अवैध तरीक़े से 50,000 पाउडर दूध भी मार्केट पहुँचते रहते हैं। इन  प्रदर्शनों के दौरान किसानों ने  एक स्वर में कहा, “मकई के बिना, देश का अस्तित्व नहीं है!” किसान  चाहते थे कि सरकार मेक्सिको के  “खाद्य संप्रभुताके साथ कोई खिलवाड़ ना करे।

मकई विशेष रूप से मेक्सिकन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण  आहार  रहा है और मेक्सिकन संस्कृति में इसका एक प्रतीकात्मक मूल्य है।इसके खेती  का प्रचलन बहुत पुराना है। प्रागैतिहासिक मेक्सिको के मूल निवासी इसे अपनी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानते थे और  तब से लेकर आज तक मक्का उनके  धार्मिक विश्वास प्रणालियों के साथ जुड़ा हुआ है। इसके अलावा मेक्सिकन इतिहास में मक्काभूमि सुधारों के लिए की गयी लड़ाइयों  का एक केंद्र बिंदु रहा है। 

निजीकरण के खिलाफ एकजुट होता किसान आंदोलन।

अगर हम एक नज़र बीते कुछ सालों के प्रदर्शनों पर डालें तो हम पाएँगे की नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ मेक्सिको के किसानों का संघर्ष अनवरत चलता रहा है। 8 अगस्त, 2019 को, एमिलीयनो सापातो के 140 वें वर्षगांठ पर  किसानों ने स्वतंत्रता, न्याय और विकास के लिए राष्ट्रीय किसान मार्च शुरू करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन किया था। 2020 के सितंबर महीने में  चिहुआहुआ (मेक्सिको का एक प्रांत) के किसानों ने भी पानी के निजीकरण के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया। इस प्रदर्शन को कुचलने के लिए सरकार ने किसानों पर गोली तक चलवा दी थी। नवउदारवादीविकासने पूरे विश्व के जलवायु पर बुरा असर डाला है और जिसके परिणाम स्वरूप चिहुआहुआ प्रांत में बारिश का अनियमित होना अब एक सामान्य घटना बन गई है। किसान जहाँ एक तरफ़ इस बदले हालत के कारण सूखे से लड़ रहे हैं वहीं दूसरे तरफ़ मेक्सिकन सरकार एक  पुराने करार का हवाला देते हुए पानी को अमेरिकी सरहद के पार जाने देने के लिए व्याकुल है।

आज दुनिया भर के किसान आंदोलनरत हैं। कृषि संकट अब  एक वैश्विक स्वरूप ले चुका है।भारत में भी किसान आंदोलन दिनों दिन पूरे देश में विस्तार पा रहा है अब किसानों के साथसाथ मजदूरों , कर्मचारी , नौजवानों तथा महिलाओं की जत्थेबंदियां शामिल हो रही है भारत के किसान अब 21वीं सदी के सबसे बड़े जन आंदोलन के सक्रिय हिस्सेदार हैं। किसान आंदोलन से ऊर्जा प्राप्त करके नौजवान मजदूर तथा दूसरे उत्पीड़ित वर्ग अब भगत सिंह की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। यह आंदोलन अब तक विचारधारा , संस्कृति तथा राजनीतिक  बहसों की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर चुकी है। पंजाब के नौजवान निराशा के गर्त से निकलकर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं निराश किसान आत्महत्या की जगह आंदोलन की रक्त धारा बन रहे हैं पूरी दुनिया में किसान आंदोलन की चर्चा है और पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद तथा वित्त पूंजी के खिलाफ एकजुट होने की एक नई तरह की हलचल है। हम सबों को इस हलचल का हिस्सा बनना होगा, और ऊर्जा तथा उत्साह के साथ आगे की लड़ाई का संचालन करना होगा।