हर मोर्चे के हालात, ज़रूरतें और व्यवस्था अलग-अलग है!

हरतीरथ सिंह, शाहजहांपुर मोर्चा 

आंदोलन के संदर्भ में अधिकतर शाहजहांपुर मोर्चे का नाम भुला सा दिया जाता है, मैं इसे एक परित्यक्त बच्चे की उपमा देता है। इस लेख में अपने हेमकुंट फ़ाउंडेशन के साथ एक सेवादार होने के इस मोर्चे पर हुए अपने अनुभव लिख रहा हूँ। यह मोर्चा बाक़ी मोर्चों के बनिस्पत छोटा है और इसे किसी तरह का मीडिया कवरेज या रोज़मर्रा का राहतसहयोग नहीं मिलता। हेमकुंट फ़ाउंडेशन एकमात्र संस्था है जो यहाँ शुरू से काम कर रही है। 

शाहजहांपुर मोर्चे पर संख्या लगातार बढ़ रही है फिर भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय मीडिया की नज़र इस पर नहीं पड़ी है। यहाँ खाना मिलना ख़ुशनसीबी की बात है क्योंकि पूरे मोर्चे पर सिर्फ़ दो लंगर चलते है। शाहजहांपुर में दिसम्बर में फ़ाउंडेशन के आने से पहले पानी, बिजली और रहने जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी थी। पूरे मोर्चे पर सिर्फ़ एक आर॰ओ॰ और ठंडे पानी की मशीन है। हमने यहाँ पर एक हाट लगाई है जहां किसान अपनी ज़रूरतों का सामान निशुल्क ले सकते है। 

हमारे पास पिज़्ज़ा, पकौड़े और खीर जैसे पकवान नहीं है जो की सिंघु मोर्चे पर मिलते है। यहाँ सिर्फ़ डाल और दो रोटी मिल जाए उसी में सब खुश है। दुर्भाग्य से शाहजहांपुर इस आंदोलन का ऐसा मोर्चा है जिस पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता। हाल ही की बारिश के बाद मैं सिंघु से शाहजहांपुर गया।  हमें अनुभव से पता था कि तिरपाल से बने टेंट इस आँधीतूफ़ान में नहीं टिक पाएँगे। हम भोर में तीन बजे शाहजहांपुर पहुँचे। 

वहाँ सिर्फ़ हेमकुंट फ़ाउंडेशन द्वारा बनाए गए टेंट खड़े थे। बाक़ी सब टेंट उखाड़ चुके थे जैसा हमें अंदेशा था। हमारे एक टेंट में 12 लोगों के सोने की जगह थी लेकिन उस दिन हर टेंट में 20 लोग सो रहे थे। जब हम पहुँचे तो अधिकतर किसान ठंड से कांपते हुए सो रहे थे। हमने चुपचाप काम शुरू किया। 

इस दौरान वहाँ लाइन में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई, जिससे सारे पंखे जुड़े थे। संयोगवश इसे जल्द ही क़ाबू में कर लिया गया। हमारी लजिस्टिक टीम ने बहुत सारे और टेंट लगाए और हेमकुंट फ़ाउंडेशन की हाट में नया सप्लाई का स्टॉक भरा। इसके बाद सुबह के 5 बजे हम वहाँ से निकले। हमने चढ़ती कला में पूरा दिन बिताया, और अगले दिन सब लोग आंदोलन के लिए नयी ऊर्जा से जुट गए, हमेशा की तरह।