आखिर आप हमारी जमीनें छीनने की प्लानिंग क्यों कर रहे हैं?

अतुल आजाद

आजादी के बाद एक लंबे समय तक, देश के अलग अलग हिस्सों में चले किसान आंदोलनों का नारा हुआ करता थाज़मीन किसकी, जो जोते उसकी भूमिहीन मजदूरों को, जिनमें बड़ी संख्या में दलित शामिल थे, जमीन का मालिक बनाने की लंबी और ऐतिहासिक लडाइयाँ लड़ी गयी। तेलंगाना संघर्ष इनमें सिरमौर था। इसी वजह से हम जम्मूकश्मीर, बंगाल और केरल में हुए भूमि सुधारों को जानते हैं। पंजाब और बिहार के कुछ इलाको में भी इस तरह की लड़ाइयाँ हुई। 

ऐसी ही एक लड़ाई राजस्थान में भी लड़ी गयी थी जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। हालांकि इस लडा़ई का स्वरूप थोड़ा अलग था, राजस्थान के बहुत सीमित इलाके में इसका प्रभाव दिखा लेकिन फिर भी इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बड़ी संख्या में दलितों को जमीन का मालिकाना हक दिलवाना है।

1966-67 में पंजाब की सतलुज और व्यास नदियों का पानी इंदिरा गांधी नहर परियोजना के जरिये श्री गंगानगर और बीकानेर पहुँचा। साथ ही पहुँच गया इन जमीनो को नीलाम करने का सरकारी फरमान। हुआ यूँ कि इस समय राजस्थान मोहनलाल सुखाड़िया की सरकार थी। जिस इलाके से नहर गुजर रही थी उस इलाके की ज़मीनों की मालिक राजस्थान सरकार थी जिसे राज रकबा कहा जाता था। तत्कालीन राजस्थान सरकार ने सरकारी खजाना भरने के लिए पंजाब के बड़े बड़े जागीरदारों को ज़मीन खरीदने के लिए बुलावा भेजा और 3 अक्टूबर 1969 को अनूपगढ़ में नीलामी कार्यक्रम रखा। धरती माँ की इस नीलामी की खबर जंगल में आग की तरह फ़ैली और नीलामी के खिलाफ एक शानदार आन्दोलन इलाके में उठ खड़ा हुआ। इस आन्दोलन का नेतृत्व कॉमरेड योगेंद्र नाथ हाँडा, श्योपत सिंहप्रोफेसर केदार, गुरदयाल सिंह संधू, हेतराम बेनिवाल जैसे किसान नेताओ ने किया। सरकार के द्वारा भयंकर दमनचक्र चलाने के फलस्वरूप कई किसानो को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी लेकिन फिर भी आन्दोलन की आंच कम नहीं हुई। किसानों की बेमिसाल कुर्बानियों के बाद आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और जमीन की नीलामी रोकनी पड़ी। जमीन को भूमिहीन किसानो में बाँटा गया। नतीजन लगभग 1 लाख परिवारों को जमीन का मालिक बनाया गया जिनमें बड़ी संख्या में दलित भी शामिल थे। गौरतलब है कि ये लड़ाई सरकार के खिलाफ लड़ी गयी क्योंकि जमीन की मालिक सरकार थी जबकि देश के दूसरे हिस्सों में लड़ी गयी लडा़ईयाँ जागीरदारों और रजवाड़ो के खिलाफ लड़ी गयी थी। इस लड़ाई के परिणामस्वरूप आज इंदिरा गांधी नहर परियोजना के इलाके में हमें जातीगत नफरत और शोषण बहुत कम देखने को मिलता है। इन गाँवो की फ़िज़ा ही अलग है क्योंकि यहाँ दलित जमीनों के मालिक हैं। 

आज सरकार इन तीन कृषि कानूनों के जरिये हमारी ज़मीन छीनकर कार्पोरेट को देने की प्लानिंग कर रही है। भला जिस जमीन को प्राप्त करने के लिए हमारे पुरखों ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की, उसे इतनी आसानी से आप कैसे हड़प लेंगे मोदी जी।