कहीं भी अन्याय, हर जगह न्याय के लिए ख़तरा है

सीमा चिश्ती

अमेरिकी सरकार द्वारा वित्त पोषित फ्रीडम हाउस ने हाल ही में स्वतंत्रता सूचकांकों में भारत के स्वतंत्रता स्तर में महत्वपूर्ण गिरावट की घोषणा करते हुए भारत को ‘मुक्त’ नहीं बल्कि केवल ‘आंशिक रूप से मुक्त’ स्थान दिया है। तथाकथित ‘टूलकिट’ मामले में, जो वैश्विक कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग के टूलकिट (एक विरोध / आंदोलन को बढ़ाने के लिए निर्देशों का एक मानक सेट) ट्वीट करने के माध्यम से उत्पन्न हुआ, बेंगलुरु में एक 22 वर्षीय जलवायु कार्यकर्ता को गिरफ्तार कर हिरासत में लिया गया। उसका दोष? देश के बाहर के लोगों के साथ सामान्य कार्य की पहचान करना और बनाना। अनिवार्य रूप से, यह मानवाधिकारों के साथ चिंता जाहिर करने की और इसके बारे में वैश्विक समझ बढ़ाने के प्रयास को अपराधीकरण करने की नवीनतम घटना थी।

यह एक जाना -पहचाना तर्क है और पूरी तरह से ग़लत है। रूढ़िवादी समाज के लोग इसे घर का मामला बोलकर ताल देते हैं। परेशानी तब होती है जब राज्यों, या लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारें, जिन्हें प्रगतिशील मानदंडों के अनुसार काम करना चाहिए, इसकी आड़ लेते है। नागरिक और मानव अधिकारों की अवधारणा स्वाभाविक रूप से यूनिवर्सल है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई इंसान ‘ग़ैर-दस्तावेज़ी प्रवासी’ है या सभी कागज़ात रखने वाला देश का नागरिक है, वह सामान्य रूप से अधिकार, सम्मान और सुरक्षा का हकदार है। चाहे अंटार्कटिका के पास कोई द्वीप हो, या कॉक्स बाज़ार या हवाई हो, इस तरह के अधिकारों का उल्लंघन होना हर किसी का मुद्दा है।

16 अप्रैल 1963 को बर्मिंघम जेल से लिखे गए डॉ मार्टिन लूथर किंग के पत्र की एक पंक्ति बहुत लोकप्रिय है; “कहीं भी हो रहा अन्याय, हर जगह न्याय के लिए खतरा है, हम सभी इंसान नियति के  ऐसे जाल में बंधे है जिसमें सभी एक-दूसरे से प्रभावित होते है।” भारत में इसका आधार हमारा संविधान है। हमारे मौलिक अधिकारों में से सबसे मूल अधिकार हैं समानता और जीवन।  यह केवल नागरिकों के लिए ही नहीं हैं बल्कि हर किसी को यह अधिकार प्रदान हैं। जब संविधान लिखा जा रहा था तब जो बहस थी, वह न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के बारे में थी। भारतीय राष्ट्रवाद ने सभी जाति, पंथ, धर्म, रंग, लिंग या राजनीतिक विचारधारा के लोगों को गले लगा एक समान और कानूनी अधिकार प्रदान किया। इसके मूल में यह था कि जब तक सभी स्वतंत्र नहीं हैं, तब तक कोई भी स्वतंत्र नहीं है। अतः सभी प्रकार के उत्पीड़न से लड़ने का प्रयास हर जगह होना चाहिए।

आज़ादी के बाद, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का दस्तावेज़ बनाने में मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह घोषणा 10 दिसंबर, 1948 को स्वीकार की गई थी और एक बुनियादी दस्तावेज़ बनाती है जो सभी मनुष्यों को बताती है कि उन्हें स्वाभाविक रूप से कहीं भी, क्या उम्मीद करनी चाहिए। चाहे वह दक्षिण अफ्रीका में भेदभावपूर्ण रंगभेद था, या इज़रायल में मानवाधिकारों का सवाल, भारत ने इसे दुनिया भर में मुद्दा बनाने में मदद की। दक्षिण अफ्रीका ने इसे संप्रभुता के बारे में बनाने का प्रयास किया लेकिन भारत ने अपने सिद्धांत के आधार पर पैरवी की। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को आंतरिक मामला मानते तो क्या वहाँ रंगभेद ख़त्म हो पाता? 

यह ताज्जुब की बात है कि जब प्रदर्शनकारियों के लिए इंटरनेट के बंद होने पर पॉप गायक रिहाना द्वारा एक छोटे से ट्वीट से विदेश मंत्रालय बौखला गया और उन्होंने ‘आंतरिक मामला’ कह कर ‘हस्तियों’ को चुप कराने के लिए एक सरकारी बयान निकलवा दिया। भारतीय सरकार का ध्यान अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता प्राप्त करने, सुरक्षा परिषद में एक जगह बनाने और तेज़ी से बदलती अंतरराष्ट्रीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन में केंद्रित है। वैश्विक स्वीकृति की यह इच्छा, चाहे वह प्रवासियों की हो या दूसरों की, लेकिन इस मौक़े पर एक ट्वीट के प्रति इस तरह की बौखलाहट काफ़ी विरोधाभासी लगती है। विवादास्पद समूह मंत्रियों की रिपोर्ट न केवल उनके ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को दबाने की नीतियों के लिए विवादास्पद है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि एक वैश्विक महामारी के बीच में लाखों प्रवासियों को अपने गांवों के लिए पैदल चलते हुए, पहले कभी न देखे दृश्यों के बीच में केंद्र का पूरा ध्यान वास्तविकता को ठीक करने के बजाए अपनी छवि को ठीक करने में है।

इसके विपरीत, वास्तविकता को ठीक करने में और ‘आंशिक रूप से मुक्त’ स्तर पर गिरावट होने या प्रेस फ्रीडम में 180 देशों में 142 पर गिरावट होने पर ध्यान देने में आधुनिक भारत की भलाई है। सरकार के खिलाफ़ बोलने के लिए 2014 के बाद से देशद्रोही माने जाने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है और यह एक जाना माना सत्य है। पिछले दशक में राजनेताओं और सरकारों की आलोचना करने वाले 405 भारतीयों के खिलाफ़ दर्ज किए गए देशद्रोह के 96% मामले, 2014 के बाद दर्ज हुए हैं। यदि भारत की छवि को ठीक करना है तो यह सब बदलना होगा।

अगर अधिकारों और शांतिपूर्ण सह-आस्तित्व की वैश्विक प्रकृति को मान्यता नहीं मिली तो विश्वगुरु या वसुधैवकुटुंबकम की कोई बात संभव नहीं होगी। भारत ‘एक आंतरिक मामलों के सिद्धांत’ के नाम पर, अन्य देश जैसे श्रीलंका में तमिलों, नेपाल में मधेसियों और पाकिस्तान में हिंदुओं के लिए मानवाधिकारों पर टिप्पणी नहीं कर सकता, कुछ ऐसा जो भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 में किया गया है।