बिहार में किसान आंदोलन

उमेश कुमार राय

दिल्ली सीमा से लगभग 1000 किलोमीटर दूर बिहार के सीतामढ़ी जिले के डायन छपरा में रहने वाले किसान ओमप्रकाश कुशवाहा ने अब तक किसानों के प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया है, लेकिन वे किसानों के आंदोलन के समर्थन में हैं। वे कहते हैं, “दिल्ली सीमा पर किसान 100 से ज्यादा दिनों से आंदोलन कर रहे हैं। मैं इस आंदोलन के साथ हूं। मैं भी चाहता हूं कि आंदोलन में हिस्सा लूं, लेकिन खेती-बारी से मुझे इतनी कमाई नहीं हो पाती है कि एक बुआई सीजन में खेती न करूं, तो परिवार चल जाए। वरना मैं भी आज सिंघु या गाजीपुर बॉर्डर पर होता।”

“अगर मैं अभी आंदोलन करने चला जाऊंगा, तो मेरे बच्चों को खाने के लाले पड़ जायेंगे,” उन्होंने कहा। ओमप्रकाश अच्छी तरह जानते हैं कि दिल्ली सीमा पर किसान अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए लड़ाई कर रहे हैं। उन्हें मालूम है कि कृषि कानूनों से खेती किसानी को क्या नुकसान हो सकता है। वे मायूस होकर कहते हैं, “आप भरोसा नहीं करेंगे कि हम लोग खेत बेचकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं, क्योंकि जो अनाज उपजाते हैं, उसकी उचित कीमत बाजार में मिलती नहीं है।” ओमप्रकाश की तरह ही मधेपुरा के मुरलीगंज डुमरिया के मक्का किसान नंदन शाह भी किसान आंदोलन के साथ हैं, लेकिन इस आंदोलन में सशरीर मौजूद नहीं रहने की वजह रोजी-रोटी बताते हैं। उनका कहना है, “अगर यही आंदोलन पटना में चल रहा होता, तो मैं निश्चित तौर पर वहां जाता। लेकिन, दिल्ली जाकर आंदोलन में हिस्सा लेना संभव नहीं है क्योंकि मुझे परिवार को भी देखना पड़ता है।”

उल्लेखनीय है कि बिहार में साल 2006 में एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट खत्म कर दिया था और सरकारी खरीद के लिए प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटी (पैक्स) का गठन किया था। एपीएमसी एक्ट को खत्म करने वाला बिहार पहला राज्य था। एपीएमसी एक्ट खत्म होने के साथ ही अनाज खरीद में निजी व्यापारियों व बिचौलियों की सक्रियता बढ़ी और इनपर किसी तरह का सरकारी नियंत्रण नहीं रहा। दूसरी तरफ पैक्सों में अनाज की खरीद घटती गई, तो किसान निजी व्यापारियों व बिचौलियों के चंगुल में फंस गये। चूंकि इन बिचौलियों व व्यापारियों पर सरकारी नियंत्रण था नहीं, तो वे जो दाम लगाते, किसानों को मजबूरी में उस दाम पर अनाज बेचना पड़ता। कालांतर में ये एक अलिखित नियम बन गया, जो अब भी चल रहा है।

ओमप्रकाश कुशवाहा और नंदन शाह की तरह ही बिहार के हजारों किसान दिल्ली सीमा पर चल रहे आंदोलन के साथ खड़े हैं, तो इसके पीछे निजी व्यापारियों व बिचौलियों का मजबूत जाल भी एक बड़ा कारण है। लेकिन, उनके साथ आर्थिक मजबूरियां नत्थी हैं, जो सीधे तौर पर आंदोलन से जुड़ने से उन्हें रोक देती हैं। बिहार में हालांकि हरियाणा, पंजाब, यूपी व महाराष्ट्र की तरह बड़े स्तर पर तो किसान आंदोलन नहीं हो रहा है, लेकिन छोटे स्तर पर किसानों का आंदोलन अब भी सांस ले रहा है। बिहार के हर जिले में दिसंबर से ही लगातार धरना चल रहा है। ऐसा ही एक धरना मुजफ्फरपुर शहर में भी चल रहा है, जिस पर कथित तौर पर दक्षिणपंथी संगठन से जुड़े लोगों ने सरस्वती पूजा के दिन ही हमला कर दिया था। इससे पहले 29 दिसंबर को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर पटना में राजभवन मार्च कर रहे किसानों पर पुलिस ने लीठाचार्ज किया था।

मुजफ्फरपुर शहर में चल रहे धरने में नियमित तौर पर हिस्सा ले रहे सामाजिक कार्यकर्ता युनूस कहते हैं, “इस तरह का धरना जिले के कई और ब्लॉक में चल रहा है। रोजाना 100 के आसपास लोग इसमें हिस्सा लेते हैं।” एक प्रतीक के तौर पर बिहार के किसान भी दिल्ली सीमा पर चल रहे आंदोलन में शामिल हैं। दिलचस्प बात ये है कि बिहार के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे इन आंदोलनों का पैटर्न ठीक वैसा ही है, जैसा दिल्ली सीमा पर चल रहे आंदोलन का है। दरअसल, दिल्ली सीमा चल रहे आंदोलन को लेकर जो संयुक्त किसान मोर्चा बना है, उसमें किसान संगठन अखिल भारतीय किसान महासभा भी शामिल है, इसलिए संयुक्त किसान मोर्चा जो गतिविधियां आयोजित करता है, उसका पालन बिहार में भी किया जाता है।

भाकपा-माले के नेता परवेज कहते हैं, “बिहार में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) कभी भी मुद्दा नहीं था, लेकिन लगातार हो रहे आंदोलन से अब ये मुद्दा बन गया है। किसान सरकारी बाजार और एमएसपी की बात कर रहे हैं।” उत्तर प्रदेश और हरियाणा में किसानों के आंदोलन के समर्थन में आयोजित हो रही महापंचायतों में हजारों की संख्या में लोग हिस्सा ले रहे हैं। इसी तर्ज पर बिहार में ग्रामीण स्तर पर पंचायतें आयोजित हो रही हैं। हालांकि, इन पंचायतों में यूपी व हरियाणा की तरह हजारों की तादाद में लोग शामिल नहीं होते हैं, लेकिन कुछ सौ लोग हिस्सा ले रहे हैं। पंचायत आयोजित करने को लेकर माइक के जरिए व डुगडुगी बजाकर लोगों को सूचना दी जाती है। अखिल भारतीय किसान महासभा के राज्य सह-सचिव राजेंद्र पटेल ने बताया कि अब तक 250 से ज्यादा गांवों में पंचायतें आयोजित की जा चुकी हैं। “हमारी कोशिश ज्यादा से ज्यादा गांवों तक पहुंचने की है,” उन्होंने कहा।

गौरतलब हो कि भारत में जमींदारी प्रथा के खिलाफ व अन्य मांगों को लेकर किसानों का सबसे बड़ा आंदोलन बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किया गया था। इस बड़े आंदोलन से पहले सहजानंद सरस्वती प्रांतीय किसान सम्मेलन व जिला स्तरीय सम्मेलन आयोजित कर रहे थे। बिहार में बेहद छोटे स्तर पर हो रहे आंदोलन में भी ऐसी ही एक बड़ी संभावना छिपी हुई है, जरूरत है तो सिर्फ मजबूत नेतृत्व की।