पश्चिमी उत्तरप्रदेश में इत्तर खेती के मुद्दे पर लामबंदी

 

शिवम मोघा

राष्ट्रीय किसान मजदूर मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुलाम मोहम्मद जौला, जिन्होंने बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के साथ मिलकर लगभग 27 साल भारतीय किसान यूनियन में काम किया लेकिन फिर 2013 के मुजफ्फरनगर  दंगों के बाद उन्होंने भारतीय किसान यूनियन से अलग होकर अपना एक अलग संगठन बनाया. अभी हाल ही में हुई मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में उन्होंने चौधरी नरेश टिकैत को अपना समर्थन दिया, इसी सिलसिले में उनसे  टेलीफोन के जरिए बातचीत की शिवम मोघा ने|

 


Ghulam Mohammad Jaula, 80, at his home in Muzaffarnagar.  Photo Courtesy    Newslaundry

Ghulam Mohammad Jaula, 80, at his home in Muzaffarnagar.
Photo Courtesy
Newslaundry

प्रश्न- मेरा आपसे पहला सवाल यह है कि अभी जो किसान आंदोलन के मौजूदा हालात है और जो बीते चार-पांच दिन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से किसानो का सहभागिता बढ़ी, खासकर मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, बड़ौत, बागपत, गाजियाबाद और नोएडा उसको आप किस तरह से देखते हैं?

उत्तर – देखो जी, सरकार से हमारी लड़ाई तीन कृषि बिल वापस लेने की है और हम इस बात पर अभी भी कायम हैं हमारे बहुत डिफ्फरेंसस् होने के बावजूद भी जब तक यें कृषि विरोधी तीन बिल वापस नहीं होते हमारे किसान वापस नहीं आएंगे वहीं डटे रहेंगे।  

 

प्रश्न- आपका किसान संगठन जो राष्ट्रीय किसान मजदूर मंच है उसकी क्या भागीदारी किसान आंदोलन में है?

जौला- देखिए हम एकदम से भारतीय किसान यूनियन और उसके अलावा जितने भी किसान संगठन इस आंदोलन में है, हम उनके साथ है यह तो शुरुआत से ही तय बात थी और हमने यह चीज अभी मुजफ्फरनगर की पंचायत में भी चौधरी नरेश टिकैत को साफ कर दिया की हमने सारे गिले-शिकवे भूलकर यह जो हमारे सामने एक दुश्मन(सरकार) है, उससे लड़ने के लिए हम सब एक साथ हैं, और अब हम साथ मिलकर चलेंगे और भारतीय किसान यूनियन का साथ किसी भी तरह से नहीं छोड़ेंगे।अभी हाल ही में हुई मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में उन्होंने चौधरी और परसों(05 फरवरी) को यहां गांव भैंसवाल में एक पंचायत भी है जिसमें मुझे बुलाया गया है। जिसमें हमारा यही मानना है कि सरकार सबसे बड़ी किसानों की दुश्मन बन के आई है जबकि यह किसानों का हितैषी बनने का वादा करती थी जबकि इसके उलट कृषि कानूनों को लाकर सरकार ने दिखा दिया कि सरकार किसका साथ दे रही हैं। मुजफ्फरनगर में हमें सिर्फ 7 से 8 घंटे का टाइम मिला था, जब रात को नरेश टिकैत ने सिसौली में इस चीज की घोषणा की कि कल मुजफ्फरनगर में पंचायत है और वहाँ लाखो लोग शामिल हुए। और रही बात हम लोगों की गिले-शिकवे की तो अब कुछ ऐसा नहीं हैं, हमने अपने सारे गिले-शिकवे भूला दिये और आप समझिये मुजफ्फरनगर की पंचायत, जिसमें चौधरी नरेश टिकैत ने इस बात को माना कि  हमसे गलती हुई कि हमने चौधरी अजीत सिंह को हराया, उनकी तरफ से ऐसा कहना बहुत अच्छी पहल थी और हम सब साथ में हैं

 

प्रश्न – क्या आपको यह लगता है कि यह किसान आंदोलन भी राजनीतिक लड़ाई है और अगर यह राजनीतिक लड़ाई है तो  इसके मायने क्या है?

उत्तर – देखिए यह एक तरह से राजनीतिक लड़ाई है और किसानों का मुद्दा कभी भी गैर राजनीतिक तो रहा नहीं वह हमेशा से राजनीति से जुड़ा रहा है और यह लड़ाई राजनीतिक हैं इसमें मुझे नहीं लगता कि इस लड़ाई को गैर राजनीतिक रूप से देखा जाना चाहिए, क्योंकि अगर आपको सरकार को हराना है तो आपको उसे राजनीतिक रूप से ही हराना होगा

 

प्रश्न- आपने बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के साथ लगभग 27 साल काम किया उनकी मृत्यु होने तक आप उनके साथ रहे, क्या आपको लगता है कि अगर आज के समय में बाबा टिकैत होते तो यह जो किसान आंदोलन चल रहा है इसकी क्या दिशा और दशा होती?

उत्तर- देखें यह तो लगभग सबको साफ है कि अगर आज बाबा टिकैत हमारे बीच होते तो ना तो कृषि कानून पास होते, सरकार की इतनी हिम्मत नहीं होती कि 1 भी विधेयकों को पास कर सके और ऊपर से मैं यह भी कह सकता हूं कि जो फूट राजनीतिक पार्टियों ने बनाने की कोशिश की थी 2013 में, वह भी ना होती मतलब मुजफ्फरनगर दंगे ना होते, लोग अमन और चैन से रहते किसानों में कोई भी धार्मिक बंटवारा, जो बंटवारा 2013 में दिखा वह ना होता अगर बाबा महेंद्र सिंह टिकैत जिंदा होते तो, मैं एकदम कह रहा हूं की जब 2011 में बाबा टिकैत हमारे बीच नही रहे तो धार्मिक झगडा होना चालू हो गया और 2013 के मुज़फरनगर् दंगो के बाद हमने अलग संगठन बना लिया।

प्रश्न- पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से जो किसान आए हुए हैं उन्होंने भी दिल्ली में कई मोर्चे संभाल रखे हैं उसमें गाजीपुर, सिंघु, शाहजहांपुर और टिकरी पर जो लोग हैं उनको वहां बैठे किसानो को आप कुछ कहना चाहेंगे?

उत्तर- देखिये राजनीतिक रूप से कहा जाए तो किसान आंदोलन जो भी चल रहा है यह किसान राजनीति का एक रिवाइवल पॉइंट है जो मजबूती देगा आगे आने वाले किसान राजनीति को, पूरे देश के किसान एकजुट है और एकजुट रहेंगे इन सरकार को यह तीनों विधायक वापस लेने पड़ेंगे नहीं तो इसका बदला 2022 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में लिया जाएगा और आप देख लीजिए कि अगर यह जब तक तीनों विधेयक पास नहीं होते तो यह तो वहां बैठे किसानों ने तय कर दिया कि वह वहां बैठे रहेंगे, और लड़ाई लड़ते रहेंगे और अब किसान एकदम हटने वाला नहीं है उसकी मौत और जिंदगी का सवाल है। किसानों के मान सम्मान की लडाई हैं, उसकी जमीन की लड़ाई है और इसे हम आखिरी दम तक लड़ेंगे।

 

प्रश्न – क्या आपको लगता हैं भाजपा ने किसान राजनीति को सरकार का पिछलग्गू बना दिया?

उत्तर- देखिए यह तो दुर्भाग्य वाली बात है कि किसान के बच्चे होने के बावजूद भी यह लोग बिल का समर्थन कर रहे हैं, जिन लोगों ने वादा किया हम किसानों का साथ देंगे जब किसानों पर अत्याचार हो रहा है तो हमने देखा कि किस तरह से यह लोग किसानों को टेरेरिस्ट बताने वाले लोगों के साथ हैं। और आज का किसान एकदम जागरूक किसान है मोदी जी के 15 लाख के बहकावे में नहीं आएगा और अपनी लड़ाई खुद से लड़ना जानता हैं और खुद लड़ेगा।

 

प्रश्न – अभी सरकार ने जो गाजीपुर, सिंघु, टिकरी बॉर्डर पर जो बैरिकेडिंग लगाई, कीलें ठोंकी और साथ ही साथ इंटरनेट को बंद किया गया उसको लेकर आपका क्या कहना है?

उत्तर – बस मैं तो यही कहना चाहूंगा कि सरकार अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रही हैं, किसानों को परेशान न करके उसे यह समझना चाहिए कि अगर किसानों का इस देश में बुरा हाल होगा तो इस देश में आसानी से रह कौन सकता है?  सरकार इस बात को समझे कि उसने गलत काम किया और जो कर रही है वह गलत है और किसान भाइयों को मेरा संदेश है कि जब तक यह कानून वापस नहीं होते हम वापस नहीं जाएंगे हम वहीं डटे रहेंगे।

 

प्रश्न – आपसे बस मेरा आखिरी सवाल ये है कि जो 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जो तल्खी आई अब क्या उसका कोई जमीनी प्रभाव दिख रहा है क्या मतलब हिंदू और मुस्लिम किसान वह क्या साथ में मिलकर इस लड़ाई को लड़ने के लिए राजी हैं?

उत्तर – देखो जी अब सभी और इस 7 घंटे की जो मुजफ्फरनगर की महापंचायत हुई इसमें अगर 100000 आदमी थे तो उसमें 30000 मुसलमान था और और वहां के बाद जो पंचायत का रुख हुआ, चौधरी नरेश टिकैत ने अपनी गलती को स्वीकार किया और हमने इसी बात पर जो एक हिंदू मुसलमान की दीवार थी इसको खत्म किया और यह दीवार कभी दीवार रही नहीं इस दीवार को तो 2013 में राजनीतिक तंत्र ने बनाया और इस दीवार को हमने तोड़ने का काम किया क्योंकि हमारी किसान आईडेंटिटी पर सरकार ने हमला किया है और हम सब किसान एकजुट हैं और ये एकजुटता सरकार को दिखाएंगे।

Published in Trolley Times 9th Edition