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जूम करके देखिए आंदोलन

क्या आप जानते हैं 1952 में देश की अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी कितनी थी और समय के साथ यह कैसे घटती गई है? यह एक सवाल है जिससे बात शुरू की जा सकती है इक्कीसवीं सदी के दो दशकों में सबसे बड़े आंदोलन की। यह आंदोलन है किसानों का आंदोलन।

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कृषि के निजीकरण के ख़िलाफ़ दक्षिणी अमेरिकी किसान आंदोलनों की एक झलक

एक जमाने में दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप प्राकृतिक संपदाओं का भंडार हुआ करता था। वहाँ के मेहनतकश किसान अपने ज्ञान और मेहनत से  ज़मीन की उर्वरता का बड़ा ही कुशल प्रबंधन करते थे। पहले उपनिवेशवाद ने और अब नव-उदारवादी नीतियों ने दक्षिणी अमेरिकी किसानों

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धार

कौन बचा है जिसके आगे

इन हाथों को नहीं पसारा

यह अनाज जो बदल रक्त में

टहल रहा है तन के कोने-कोने

यह कमीज़ जो ढाल बनी है

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तेलंगाना किसान आंदोलन

तेलंगाना विद्रोह को औपचारिक रूप से वेट्टी चकिरी उदयम / तेलंगाना बंधुआ मजदूर आंदोलन के रूप में जाना जाता था। इसे तेलंगाना रायतांगा सयुध पोराटम (तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष) भी कहा जाता था। यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में तेलंगाना क्षेत्र के दमनकारी सामंती प्रभुओं / जमींदारों के खिलाफ

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शिव कुमार के साथ मेरा सफ़र: एक प्यारी मुस्कान के पीछे गंभीर कार्यकर्ता और पुलिस की ज्यादती

आज से साढ़े पांच साल पहले मैं शिव कुमार के साथ जेल में रहा था। लगभग 16 दिन हम दोनों ने सोनीपत जेल में एक ही बैरक में बिताए। मैंने पहली बार देखा कि कैसे जाति की वजह से उसे सफाई के काम के लिए बार बार कहा जाता और हमने इस मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया। उस समय भी हमें झूठे केस में ही फंसाया गया था।

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सांस्कृतिक जन जागरण का केंद्र बनता शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर

शाहजहांपुर खेड़ा बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन ने सांस्कृतिक रूप से जन जागरण का स्वरूप अख्तियार कर लिया है। इस आंदोलन में हरियाणवी, राजस्थानी और केरल सहित देश के विभिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक मंडलियों ने अपनी जन जागृति की प्रस्तुति दी। एक पूरा दिन तो सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का ही रखा गया था।

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वन्दे मातरम्

गेहूँ की कुशाग्र मूँछों पर गिरी वृष्टि की गाज

काली-काली भुङुली वाली बाली हुई अ-नाज़

हुए अन्नदाता ही दाने-दाने को मोहताज

भिड़े कुकुरझौंझौं में राजन महा ग़रीबनवाज़

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मोर्चे पर पत्रकार

“हम चुनौतियों से लड़ने के तरीके खोज निकालेंगे लेकिन किसी से डरकर रिपोर्टिंग करना नहीं छोड़ेंगे।” ये कहना है स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया का जिन्हे कुछ दिन पहले पुलिस ने सिंघु बॉर्डर से उठाकर जेल मे बंद  कर दिया। मनदीप पुनिया शुरुआत से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को कवर कर रहे हैं।

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दो कृषि-आंदोलनों की एक दास्तान

1907 में पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन और 2020 से जारी किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएँ 

इतिहास कई अर्थों में ख़ुद को दोहराता है। बहुत बार अतीत में हुई घटनाओं के आईने में हमें वर्तमान दिखाई देता है।

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लोकतंत्र अब जनता की ज़िम्मेदारी है!

वैसे भी हम लोकतंत्र दिवस, अंतराष्ट्रीय स्तर पर ही तो मनाते आये है, खैर,, राष्ट्रीय लोकतंत्र तो वैसे खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। अब हमारे पास आखिर उत्सवधर्मीता से मनाने लायक लोकतंत्र रहा ही कहाँ है?   

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