रात के तूफान से पहले की एक दोपहर

रात के तूफान से पहले की एक दोपहर

26 जनवरी 2020 को दिल्ली में निकला किसान ट्रैक्टर मार्च भारी विवाद में समाप्त हुआ, कुछ लोगों के द्वारा किसानों को देश विरोधी बताया जा रहा था। मुख्यधारा की मीडिया ने किसानों को पहले ही खालिस्तानी और देशद्रोही घोषित कर दिया था। तब ऐसा लगने लगा कि किसानों का यह आंदोलन मुरझाने वाला है।

किसानों के आंदोलन पर बयानबाजी और जवाबी बयानबाजी का इतना कोलाहल था कि इसने मुझे, एक मध्यमवर्गीय दिल्ली की महिला को, चीजों को खुद से जांचने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने अपने घरेलू उबाऊ काम निपटाए और 28 जनवरी की दोपहर को मैं गाजीपुर किसान मोर्चा में पहुँच गई। तब तक गाजीपुर गोदी मीडिया द्वारा फैलाई खबरों कारण बदनामी झेल रहा था, इस हद तक कि ऑटो चालक मुझे मोर्चा स्थल तक ले जाने से हिचक रहे थे। मोर्चा स्थल ख़ाकी पहने दिल्ली पुलिस से घिरा हुआ था, रैपिड एक्शन फोर्स के ट्रक अंदर घुस रहे थे। अधिकांश मार्गों को कंडेदार तार और नुकीले बैरिकेड्स द्वारा रोका गया था, जैसे इंडिया पाकिस्तान के बॉर्डर पर होता हैं, और ऐसा किया जा रहा था अपने ही देश के किसानों को उनकी अपनी ही राजधानी से दूर रखने के लिए।

हम जैसी कुछ निडर आत्माएं मोर्चे के मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए कूड़े के ढेर और झाड़ियों पर चढ़ गईं। एक गली, जो किसान क्रांति गेट और दिल्ली-मेरठ राजमार्ग पर खोड़ा गांव की ओर जाने वाले मोर्चे के मुख्य मंच के बीच है, अस्थायी झोंपड़ियों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से भरी हुई थी, उस सुनसान गली में उदासी का अहसास हो रहा था। कुछ किसान इधर-उधर बिखरे हुए छोटे-छोटे समूहों में बातें कर रहे थे। हवा में तनाव भारी था।

सड़क पर आधा किलोमीटर चलते हुए मैंने देखा कि एक अधेड़ उम्र का सिख एक लंगर के बाहर काले वस्त्र में खड़ा है। वह गुरु का टल गुरुद्वारा आगरा से बाबा गुरताज सिंह थे। उन्होंने मुझे देखा और मुझे चाय पीने के लिए आमंत्रित किया। उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन ज्यादा लोग नहीं आये थे, बस कट्टर किसान ही अपनी बातों को लेकर बैठे थे और वहाँ डटे रह गए थे। हम एक दूसरे को देख कर मुस्कुराए और एक ही सवाल एक दूसरे से किया। “आप यहाँ कैसे?” मैंने उन्हें जवाब दिया कि मैं किसानों के इस आंदोलन को खुद देखना और उनकी बात को समझना चाहती हूँ। बाबा गुरताज सिंह ने मुझे बताया कि जब से मोर्चा शुरू हुआ तब से वह गाजीपुर में डेरा डाले हुए हैं और विरोध कर रहे किसानों के लिए लंगर चला रहे हैं। मैंने पूछा कि वह वापस क्यों नहीं गए जब लगभग सभी किसान अपना सामान बांध चुके हैं या ऐसा करने की प्रक्रिया में हैं। उन्होंने कहा, “जब तक आखिरी किसान मोर्चे पर रहेगा, तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा।” बाबा जी से मेरी लंबी बातचीत हुई और उन्हें विश्वास था कि सरकार के घटिया प्रचार के बावजूद किसान पूरी ताकत के साथ लौटेंगे क्योंकि वे अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ रहे हैं। मैं यहाँ एक भ्रमित व्यक्ति के रूप में आयी थी और जब तक मैंने बाबा जी को अलविदा कहा, मैं किसानों के दृढ़ संकल्प से प्रभावित थी।

फिर 28 जनवरी 2021 की रात आई, जब किसान नेता राकेश टिकैत के भावुक होना किसानों के इस ऐतिहासिक आंदोलन को असफलता की कगार से वापस ले आया। जैसा कि बाबा गुरतेज सिंह जी ने अनुमान लगाया था, किसान अपने नेता के साथ खड़े होने के लिए बड़ी संख्या में वापस आने लगे। तब से मैं रोज गाजीपुर मोर्चे का दौरा करने लगी। मैं दर्शकों के बीच बैठा करती और किसानों और उनके नेताओं के भाषण सुनती थी ताकि चीजों को समझ सकूँ। 26 जनवरी की घटना के बाद न तो अख़बार बाँटे जा रहे थे और न ही कोई इंटरनेट सेवाएँ जारी थीं। प्रदर्शनकारी किसानों के लिए बाहर की कोई भी जानकारी पता करना अब एक बड़ी समस्या थी। मैंने खुद किसानों के लिए अख़बार बाँटने का फैसला किया और युवा प्रदर्शनकारियों का एक छोटा समूह बनाया जो मोर्चे के हर हुक्का चौपाल पर जाएं और वहां डेरा डाले हुए बुजुर्ग किसानों को किसान आंदोलन से संबंधित खबरें पढ़ के सुनाएं।

मैं एक दिन अचानक से ही गाजीपुर में हिमांशु से मिली, वह दिल्ली का एक सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर है और मेरी तरह सच की तलाश में गाजीपुर आया था। फिर हमें मिले हरशरण, रुद्रपुर का एक युवा ए.आई. प्रोफेशनल। हमने तुरंत किसानों के इस आंदोलन में योगदान देने का फैसला किया। हम लेखकों का एक छोटा ग्रुप बनाने में सफल रहे जिन्होंने ट्रॉली टाइम्स और अन्य प्रकाशनों के लिए डिस्पैच लिखा और अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में रोज़ाना मीम्स और किसान नेताओं के महत्वपूर्ण भाषणों का इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया पर किसानों आंदोलन के खिलाफ न्यूज कवरेज और दुष्प्रचार दिन प्रति दिन तेज होता जा रहा था। इसलिए हमने आंदोलनकारी युवाओं के एक समूह के साथ मिलकर किसानों को अपना संदेश फैलाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना सिखाया और ऐसा करने के लिए एक टीम बनाई। इस टीम ने हफ्तों तक किसानों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट खोलने का अभियान चलाया, उनके व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम अकाउंट खोले गए और उन्हें इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित किया गया। गाजीपुर मोर्चा में गांव के ताऊ (चाचा) को फेसबुक लाइव करते देखना आम बात हो गई थी। जैसा कि मुख्यधारा के मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता खो दी थी, किसानों ने अपने संदेश को साथी ग्रामीणों के बीच फैलाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भरोसा करना शुरू कर दिया, जो मोर्चे से प्रामाणिक प्रत्यक्ष जानकारी की सख्त मांग कर रहे थे। पिछले एक साल में सोशल-मीडिया ने किसानों के सैकड़ों अनौपचारिक प्रवक्ताओं को फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर ग्रिलिंग मीडिया और पेड ट्रोल्स का सामना करते देखा है।

मेजर बाबा का हुक्का चौपल गाजीपुर मोर्चा के सुदूर छोर पर स्थित है। मेरठ के 95 वर्षीय पूर्व फौजी सुरेंद्र सिंह सबके लिए मेजर बाबा हैं। उन्होंने तीन युद्ध लड़े, 1962 में भारत-चीन, 1965 में भारत-पाक और 1971 में बांग्लादेश युद्ध। और अब दिल्ली के कठोर मौसम में खुली सड़क पर सरकार से लड़ रहे हैं। मेजर बाबा गाजीपुर मोर्चा के प्रतीक और मेरे जैसे लोगों के लिए प्रेरणा बन गए जो पहली बार जन आंदोलन देख रहे हैं। जब भी मैं उनकी चौपाल पर जाती हूं तो वह मुझसे यूट्यूब पर अपने में लाइक की संख्या के बारे में पूछना नहीं भूलते। मुझे “किसान ट्रोल” बनाने के लिए धन्यवाद मेजर बाबा।

अनुवाद : निर्वैर मल्ली

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