पेशेवर पहचान और मूलभूत मुद्दों की राजनीति

पेशेवर पहचान और मूलभूत मुद्दों की राजनीति

सज्जन कुमार, अनुवाद: सुचेतना सिंह 

चित्र और प्रतीकवाद किसी भी विमर्श के अभिन्न अंग हैं। वे एक को दूसरे से वरीयता देकर लोकप्रिय धारणा का निर्माण करते हैं। 26 जनवरी को लाल किले की प्राचीर पर निशान साहिब के ध्वजारोहण ने उस नैतिक स्तर को ठेस पहुँचाया, जिसे प्रदर्शनकारी किसानों ने हासिल किया था। उनके कष्टों, बलिदानों, मृत्यु, आत्महत्या और कठिनाइयों के चलते उनकी दृढ़ता ने अपनी प्रमुखता खो दी। आखिरकार, यह सरकार और कॉरपोरेट मीडिया प्रदर्शनकारी किसानों को राष्ट्रविरोधी के रूप में पेश करने में सफल हुई, वह लेबल जो आज के भारत में बहुतायत में पाया जाता है।

प्रदर्शनकारियों को इस पहुँची ठेस की सफलता से उत्साहित, उत्तर प्रदेश के लोकलुभावन मुख्यमंत्री ने 28 जनवरी मध्यरात्रि के अंधेरे में ग़ाज़ीपुर सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों पर अंतिम कार्रवाई करवा दी। राकेश टिकैत के रोते हुए आंसू और घुटी हुई आवाज़ के दृश्य वायरल हो गए। एक व्यक्ति की यह छवि, उसकी उद्विग्नता, लाचारी, पीड़ा और फ़िर भी, दृढ़ संकल्प, तुरंत ही किसानों के सामूहिक गुस्से के रूप में गई। सत्ता के अभिमान ने टिकैत द्वारा हस्ताक्षरित अपनी स्वयं की दासता बनाई।

 28 जनवरी के बाद से हमने बड़ा बदलाव देखा है। संकीर्ण राजनीति के प्रचलित युग में, सांस्कृतिक मुद्दों ने मूलभूत मुद्दों का स्थान ले लिया था। इसलिए, हर रोज़ के आर्थिक पहलू, चाहे ग्रामीण संकट, कृषि संकट, वेतन की समस्या, नियुक्त करके निकाल देने की नीति, बेरोज़गारी और नौकरी में कटौती, सामूहिक हताशा और उभरता गुस्सा अपनी आवाज़ सुनवाने के लिए एक राजनीतिक मुद्रा कभी प्राप्त नहीं कर सका। क्यों? क्योंकि हमारी भौतिक पीड़ाएँ उस सांस्कृतिक राजनीति के भँवर में डूब गईं, जो हमारी पारलौकिक जाति और सामुदायिक पहचानों को हमेशा विशेषाधिकार देती है। मुझे याद है कि मैंने जनवरी 2017 में, उत्तर प्रदेश भर के किसान उत्तरदाताओं से नोटबंदी पर उनके विचार पूछे। जहाँ सभी ने दुख और नुकसान की कहानी बताई, वहीं उनका भाजपा का समर्थन या विरोध करना उनकी पहचान से संबंधित था। गोंडा में एक मध्यम आयु वर्ग के शिक्षक सह किसान ने बोला कि एक किसान के रूप में मैं बीजेपी का विरोध करता हूँ, एक ब्राह्मण के रूप में मैं इसका समर्थन करता हूँ।

हम सभी में हमारी जाति, गोत्र, धर्म, क्षेत्र की मिली जुली पहचान है और फ़िर हमारी एक पेशेवर पहचान है। सत्ता के राजनीतिक खेल में, जुटान जाति अथवा सामुदायिक तरीक़े में हो सकता है या व्यवसायिक तरीक़े से या दोनों को एक साथ लाकर हो सकता है। इस पृष्ठभूमि में, 28 जनवरी केवल किसानों के प्रदर्शन के इतिहास में, बल्कि सामाजिक आंदोलनों के क्षेत्र के लिए भी एक आमूलचूल परिवर्तन होता है, जो जाति और सामुदायिक पहचान के ऊपर पेशेवर पहचान के मुखर होने का है।यदि हम हाल के दिनों में हुए प्रदर्शन और आंदोलन का प्रतिरूप देखें, तो जब भी सामूहिक क्रोध को जाति और समुदाय की रेखाओं पर व्यक्त किया गया, या तो भाजपा को इसका फ़ायदा हुआ है या पहले उन्हें गिराने और फ़िर उन्हें दबाने में सफ़ल रही है। किंतु जब भी, क्रोध और विरोध व्यावसायिक रेखाओं और मूलभूत मुद्दों पर आधारित रहा, भाजपा को एक झटका लगा है। उदाहरण के लिए, 2018 में, और अपेक्षाकृत लोकप्रिय मुख्यमंत्री होने के बावजूद, ग्रामीण संकट और कृषि संकट के कारण भाजपा पार्टी को संगठनात्मक रूप से कमजोर जीर्णशीर्ण कांग्रेस से छत्तीसगढ़  चुनाव हारना पड़ा। भाजपा ने पहचान के आधार पर जुटान का प्रयोग कर, विशेष रूप से ओबीसी का, विभिन्न क्षेत्रों और जातियों के लोगों के इस व्यावसायिक समन्वय को काउंटर करने की पूरी कोशिश की है। लेकिन भौतिक राजनीति और पेशेवर पहचान प्रबल रही और पार्टी हार गई। यह एक अप्रत्याशित, ज़रूरी लेकिन अल्पकालिक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।

 आज, किसानों के प्रदर्शन के चलते, छवि उलटने की एक प्रक्रिया हो रही है। वही किसान समुदाय, जिन जाटों ने सितंबर 2013 में कुख्यात महापंचायत को सांप्रदायिक बदलाव के रूप में चिह्नित किया था और मुसलमानों के साथ निर्णायक रूप से टूट रहे थे, वही अब किसानी पहचान को गले लगा रहे हैं। यह सच है कि महापंचायत में आज जाट समुदाय की भारी उपस्थिति है, लेकिन वे हिंदुत्व के आक्रामक समर्थन आधार होने के बजाय मुख्य रूप से किसान के रूप में अपनी पहचान को फ़िर से स्थापित कर रहे हैं। यह सहजीवी तरीक़े में अंतरसमुदाय संबंधों के मेलजोल के लिए ज़रूरी है। मेवात क्षेत्र मुसलमान भी किसान बिरादरी का हिस्सा है। पेशेवर पहचान की यह प्रधानता हमारे रोज़मर्रा के जीवन के सांप्रदायिकरण की प्रक्रिया को तोड़ती है।

 सत्ता में बैठे लोग अपनी सभी चालें चलने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और इसे ग़लत नाम देकर प्रदर्शन को बदनाम कर रहे हैं। पहले इस प्रदर्शन को सिर्फ़ पंजाब तक सीमित किया गया, फ़िर ख़ालिस्तानी समर्थित आंदोलन के रूप में बताया गया, फ़िर विपक्षी दलों और राष्ट्र विरोधी ताकतों के रूप में गुमराह करने वाली संस्थाएँ बताया गया जो एक वैश्विक साज़िश का हिस्सा हैं। अब, प्रधान मंत्री मोदी ने अमीर किसान बनाम गरीब किसान के वर्ग के सीमांकन का भी आह्वान कर दिया है, जो वे कभी कॉर्पोरेट्स के क्षेत्र में नहीं करते। यह याद रखना अच्छा होगा कि जब नोटबंदी और जीएसटी की नीतियों ने कई छोटे उद्यमियों को बेहद मुश्किलों में डाल दिया था, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र में, बड़े कॉरपोरेट्स ने बहुत आसानी से इसे पार कर लिया था।

 शक्ति और विरोध के इस विषैले अन्तराल में, हम धारणा और प्रतिधारणा बनाने के खेल में हैं। अंतिम परिणाम के बावजूद, किसान पहले से ही इस तथ्य से धारणा का युद्ध जीत चुके हैं, कि प्रभावित किसान अपनी कृषि पहचान का विशेषाधिकार कर रहे हैं और व्यावसायिक मुद्दों के साथ साथ मूलभूत मुद्दों पर एक व्यापक सामाजिक गठबंधन के लिए तैयार हैं। यह प्रक्रिया राजनीतिक क्षेत्र में कितनी दूर तक जाएगी, यह चिंतन का विषय हो सकता है, लेकिन इससे निश्चित रूप से संकीर्ण जातिवादी और धार्मिक पहचान पर आधारित सांस्कृतिक राजनीति में दरार पड़ गई है। इस लोकप्रिय धारणा में, भाजपा अब किसान हितैषी पार्टी नहीं रही और वह किसानों से अलग और शत्रुतापूर्ण होने की अपनी पुरानी छवि पर चली गई है।

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