निजीकरण के दौर में अंतरराष्ट्रीय एकता के तरफ बढ़ते किसान

प्रकाश पर्व के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों कृषि क़ानून वापस करने का ऐलान किया। संसद सत्र में तीनों कृषि क़ानूनों को संवैधानिक प्रक्रिया से भी निरस्त कर दिया गया है। आंदोलन की दो और अहम माँगें हैं – “सभी कृषि उत्पादों के लिए और सभी किसानों के लिए लाभकारी मूल्य की क़ानूनी गारंटी और बिजली संशोधन विधेयक का वापस लिया जाना”। इन माँगों पर सरकार अभी मौन है। इसीलिए, जब देश के नेता चुनावज़िवी हो चुके हों तो देश के किसानों को ऐसे एलानों से सावधान रहना चाहिए।

किसान आंदोलन का कारवाँ कई प्रश्नों से जूझते हुए (आंदोलन के अंदर से उभरे प्रश्न समेत) निरंतर आगे बढ़ता रहा है। हुकूमत की ओर से निर्मम दमन के प्रयासों के बावजूद आंदोलन ने अपनी परिपक्वता को बनाए रखा है और बीते कुछ महीनों के अनुभवों ने उसकी प्रतिबद्धता को और भी सुदृढ़ किया है। किसान आंदोलन ने मोदी सरकार के जन विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ तब मोर्चा सँभाला है जब – एक तरफ़ बढ़ती बेरोज़गारी और महंगाई है और दूसरे तरफ़ ग्लोबल हंग़र इंडेक्स के फ़ेहरिस्त के शिखर की ओर बढ़ता भारत। हाल ही में प्रकाशित राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट भारत के ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था की बदहाली को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। खेती में निरंतर घटती आमदनी की वजह से हर रोज़ औसतन 2052 किसान खेती छोड़, शहर की ओर रुख़ कर रहे हैं और मज़दूर में तब्दील होते जा रहे हैं। कृषि क़ानून इसी प्रक्रिया में “आग में घी” जैसा है। भारत के किसानों के भविष्य को औद्योगिक पूँजी के हवाले कर देने की सरकार की मंशा अब जग ज़ाहिर है।

किसान आंदोलन की कई उपलब्धियों में एक उपलब्धि यह भी है कि वह हमें सिखाता है कि झूठ, दमन और सांप्रदायिकता को आंदोलन की ताक़त से ही हराया जा सकता है। किसान आंदोलन ने पूरे विश्व में हलचल पैदा की है। दूसरे महाद्वीपों में निजीकरण और नवउदारवाद के ख़िलाफ़ लड़ रहे किसान संगठनों ने भी इसे अपना समर्थन दिया है। इन्हीं संगठनों में से एक है ला विया कामपेसिना। ला विया कामपेसिना दुनिया भर के छोटे और मंझौले किसानों, भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, ग्रामीण महिलाओं और युवाओं, मूलनिवासियों, प्रवासियों और कृषि श्रमिकों को एक साथ लाने वाला एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन है। इन समूहों के बीच एकता, एकजुटता की एक मजबूत भावना पर निर्मित यह आंदोलन खाद्य संप्रभुता के लिए निरंतर संघर्ष करता रहा है। सामाजिक संबंधों और प्रकृति को नष्ट करने वाली कॉर्पोरेट संचालित नीतियों के ख़िलाफ़ इसने दुनिया भर के किसान संगठनों को एक साथ जोड़ने का भरसक प्रयास किया है। 1993 में मॉन्स, बेल्जियम में ला विया कामपेसिना की स्थापना हुई जिसमें चार महाद्वीपों से किसानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया (जिसमें महिलाओं और पुरुषों दोनों की भागीदारी थी)। उस समय कृषि नीतियां और कृषि व्यवसाय वैश्वीकृत हो रहे थे। किसानों ने एकजुट हो कर इसके ख़िलाफ़ संघर्ष करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को ला विया कामपेसिना के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास किया। इसके लिए एक सामान्य दृष्टि और व्यापक संघर्ष विकसित करने की आवश्यकता थी। छोटे पैमाने के किसान संगठन भी चाहते थे कि उनकी आवाज़ सुनी जाए और उनके जीवन को प्रभावित करने वाले फैसलों पर वो भी अपना पक्ष रख सकें। ला विया कामपेसिना ने उन्हें एकजुट होना का मंच दिया।

जून 2020 में भारत में देश व्यापी लाक्डाउन था और सरकार ने भरसक प्रयास किया कि किसान आंदोलन को इसी बहाने खतम कराया जाए। विया कामपेसिना ने सरकार के इस कदम का पुरज़ोर विरोध किया। अपने एक प्रकाशित लेख में उन्होंने लिखा कि “2014 के बाद से, देश में बहुसंख्यकवादी राजनीति में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। अति-राष्ट्रवादी और अति-पूंजीवादी आदर्शों का मिश्रण अब भारत में सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित कर रहा है। वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार को शहरी मध्य वर्ग के बीच भारी लोकप्रियता हासिल है और देश में सक्रिय कई निगमों का समर्थन प्राप्त है। यह राष्ट्रवाद और ज़ेनोफोबिक नरेटिव को लागू करके (जो लोगों की असुरक्षा और भय पर आधारित है) एक व्यापक ग्रामीण आधार पर अपील करने में भी कामयाब रहा है”। विया कामपेसिना का मत कृषि क़ानूनों के संदर्भ में भी स्पष्ट है और वो यह मानती है कि “यह कदम निजी कंपनियों को आपूर्ति और मांग को नियंत्रित करने की अनुमति देगा, जिससे खाद्य सुरक्षा का खतरा होगा। बड़े कॉरपोरेट समूहों के प्रवेश से और अधिक परेशानी पैदा होगी क्योंकि वे अपनी वित्तीय शक्ति का उपयोग कीमतों को कम करने के लिए करेंगे, जिससे किसानों को पहले से ही संकट का सामना करना पड़ रहा है।”

आज ज़रूरत है कि ला विया कामपेसिना के तर्ज़ पर दुनिया भर के किसान, मज़दूर, छात्र साथ आ कर नव-उदारवादी नीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष को तेज करें। साथ ही साथ इस राजनितिक विमर्श को आगे बढ़ाने में सभी प्रगतिशील जनवादी शक्तियों को लगना होगा और विचार करना होगा कि – क्या संपत्ति तथा साधनों के समाजीकरण किए बगैर छोटी पूंजी के मालिकों को, उनके परिवार व समाज को, मनुष्य के रूप में जीवन जीने की गारंटी दी जा सकती है? क्या वे बड़ी पूंजी के हमले के सामने वर्तमान व्यवस्था में अपनी रोजी-रोटी और छोटी पूंजी को सुरक्षित रख सकते हैं? बड़ी पूंजी के हमले इतने बड़ गए है कि छोटी पूंजी के मालिकों को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कुछ ना कुछ सोचने और आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। पर आज का सबसे महत्वपूर्ण सवाल और चुनौती यह है कि – क्या मजदूर वर्ग आंदोलन को अगली मंजिलों तक ले जाने के लिए तैयार है?