भारतीय राजनीति में किसान प्रतिनिधि – अजीत सिंह

भारतीय राजनीति के अध्याय में 1985 से बाद का समय किसान राजनीति के ध्रुव तारे चौधरी अजीत सिंह की सिद्धांतवादी व गरिमापूर्ण सम्मानजनक मूल्यों पर आधारित राजनीतिक शैली के लिए जाना जाता है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी के पुत्र और भारत के पहले कंप्यूटर इंजीनियर चौधरी अजीत सिंह जी का जन्म 12 फरवरी 1939 को मेरठ जिले के भडोला ग्राम में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा (बीएससी) स्नातक, बी.टेक की उपाधि लखनऊ विश्वविद्यालय से पूरी की और फिर इंजीनियरिंग की पढाई आई.आई.टी खड़गपुर से। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के शिकागो स्थित इलिनॉइस इिंजस्टट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से मास्टर ऑफ साइंस किया।

चौधरी चरण सिंह जी के सिद्धांतों की परवरिश में पले-बढ़े चौधरी अजीत सिंह जी ने पिता के सफल राजनेता होने के बावजूद राजनीती के क्षेत्र में कदम नहीं रखा और अमेरिका की एक कंप्यूटर कंपनी में अगले 17 वर्षों तक एक सफल कर्मचारी की भाँति कार्य करते रहे। पिता चौधरी चरण सिंह जी इसी बीच उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री से देश के प्रधान मंत्री तक का सफर तय कर चुके थे। देश में तत्कालीन राजीव गााँधी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ माहौल था और चौधरी चरण सिंह जी विपक्ष के नेता थे.  संयुक्त विपक्षी दल गठबंधन के पास राजीव गाँधी के युवा प्रगतिशील चेहरे के सापेक्ष कोई युवा प्रतिभा नहीं थी।

विपक्षी राजनीतिक दलों के संयुक्त महागठबंधन ने राजीव गांधी के सशक्त युवा चेहरे के सामने चौधरी अजीत सिंह जी को विपक्ष का चेहरा बनाने के लिए एकजुट होकर उनसे आग्रह किया कि देश की समस्त जनता आपको बदलाव के नायक के रूप में देख रही है। आपको चौधरी चरण सिंह जी की तरह ही अल्पसंख्यक, किसान व मजदूर वर्ग में स्वीकार्यता प्राप्त है । अगर आप विपक्ष को नेतृत्व प्रदान करें तो देश को पहली किसान सरकार बनाने का मौका मिल सकता है। किसानों के हालात ठीक नहीं थे और चौधरी अजीत सिंह जी अपने पिता के सिद्धांतों को छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन संयुक्त विपक्षी मोर्चे के आग्रह को सज्जन व ईमानदार अराजनैतिक कम्प्यूटर इंजीनियर चौधरी अजीत सिंह टाल नहीं पाये और कई बुजुर् खाटी कथित समाजवाद के पैरोकारों के राजनीतिक जाल में उलझ गए।

किसानों की फसल एक राज्य से दूसरे राज्य मे ले जाने की पाबंदी को हटवाने वाले छोटे चौधरी ने देश के किसानों की भलाई के लिए बहुत काम किया। अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करते समय वी.पी. सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने, उन्हें केंद्रीय उद्योग मंत्री बनाया गया। इसके बाद वह 1991 में फिर बागपत से ही लोकसभा पहुंचे। इस बार नरसिम्हा राव की सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया। पी.वी. नरसिम्हा राव के काल में वर्ष 1995-1996 तक वह खाद्य व रसद मंत्री भी रहे। भूमि अधिग्रहण अधिकार 2013 संसद द्वारा पारित करा कर देश के किसानों के लिए ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने अपने राजनीतिक काल में दिल्ली से बड़ौत तक मेट्रो रेल की प्रक्रिया 2013 में शुरू करवाने से लेकर मेरठ में परतापुर हवाई पट्टी को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा घोषित करने के साथ ही उत्तर प्रदेश में 8 हवाई अड्डे घोषित किये।

किसानों के लिए खेती करना सुगम हो इसके लिए उन्होंने 750 करोड़ की लागत से चौधरी चरण सिंह गंगा लिंक नहर 57 किमी पूर्वी यमुना नहर तक निमाणर् कराकर गंगा का पानी किसानों के खेतों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम किया। जब कांग्रेस की सरकार ने किसानों को बर्बाद करने वाले एफ एंड आर पी बिल लागू करने की घोषणा की तो सरकार में रहते हुए भी उन्होंने संसद का घेराव कर एफ एंड आर पी बिल वापिस करवाए।

चौधरी अजीत सिंह जी जितने विनम्र राजनीतिज्ञ थे, उससे कहीं ज्यादा विनम्र और सरल व्यक्तित्व के इंसान थे। उनसे जुड़े एक किस्से सिंस्मरर् याद आता है। जब वे कृषि मंत्री थे तो उनके पास कुछ किसान पहुँचे। उनमें से एक किसान का बेटा आर्म्ड फाॅर्स में पूर्वोतर के किसी राज्य में तैनात था, लेकिन पानी न पचने की वजह से वह बीमार पड़ गया था। किसान चौधरी साहब से बोला कि मेरे बेटे का ट्रांसफर चाहे कश्मीर में करा दो पर वहां से निकलवा दो। चौधरी साहब बोले कि यह तो गृह मंत्रालय के अधीन है, मैं तो उस मंत्रालय में भी नहीं हूँ। तो किसान ने कहा कि आपने क्यों गृह मंत्रालय नहीं लिया? मुझे तो बस यही काम है और आपको यह कराना पड़ेगा। चौधरी साहब ने कुछ नहीं कहा, केवल हँस दिए। जब तक वह किसान घर पहुँचता, तब तक उसके बेटे का ट्रांसफर हो चुका था। किसानों के जन नायक चौधरी अजीत सिंह ने किसानों की क्षमताओं और साधनों के बीच के भारी अंतर को और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की अपिंगताओं व बाधिताओं को समझकर अपनी राजनीति का केंद्र बिंदु गांव-गरीब व अर्ध शहरी समुदाय को बनाया। अभावग्रस्तता के प्रति उनकी व्यापक सहानुभूति उनके विभिन्न मंत्रालयों के दौरान लिए गए फैसलों में दिखाई पड़ती है।

किसान परिवार की दिक्कतों से वाकिफ चौधरी साहब ने किसानों के लिए अपने राजनैतिक सम्मान को भी दांव पर लगाने से परहेज नहीं किया। 2013 के मजहबी दंगों से भाजपा के अनुकूल राजनैतिक माहौल बनने पर कुछ शुभचिंतकों ने चौधरी अजीत सिंह जी को भाजपा से गठबंधन करने की सलाह दी, लेकिन चौधरी अजीत सिंह जी ने स्पष्ट इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जाट समुदाय को केन्रीय स्तर पर आरक्षर् देने का वायदा किया है और मैं इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हूँ। इसके लिए उन्होंने कीमत भी चुकाई, वह लहर के खिलाफ लड़े और चुनाव हार गए। फिर दूसरी बार 2019 के चुनाव में जब दंगों की पाठशाला बने मुजफ्फरनगर से उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला लिया तो लोगों ने कहा कि वह सुरक्षित सीट नहीं है। लेकिन चौधरी साहब ने जवाब दिया कि मैं चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि नफरत को खत्म करने और आपसी प्यार को जीवित करने के लिए लड़ रहा हूँ। प्रणाम वही हुआ, मतों की गिनती में उन्हें हार मिली और दिलों की गिनती में जीत। जिस नफरत के बीज को भाजपा वटवृक्ष बनाना चाहती थी, चौधरी साहब की हार ने विभिन्य जातियों के किसानों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया और उस नफरत के पेड़ को उखाड़ कर फेंक दिया। उसी का असर है कि आज गाजीपुर बॉर्डर पर चल रहे किसानों के आंदोलन में उत्तर प्रदेश से ज्यादातर हिस्सेदारी मुजफ्फरनगर जिले के किसानों की है।

1989, 1991, 1996, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में वे विजयी रहे। इस दौरान उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री और वित्त समिति के सदस्य के रूप में कार्य किया। 2011 में वे केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री के पद पर भी रहे। अपने इस राजनीतिक जीवन में चौधरी अजीत सिंह ने राष्ट्रीय गौ-पशुधन आयोग का गठन किया, कृषि पर आय कर लगाने वाला प्रस्ताव निरस्त कराया, कृषि उत्पादों के निर्यात पर से प्रतिबंध हटाया, शीतगृहों  के निर्माण पर 25% अनुदान सुविधा उपलब्ध कराई, कृषि लोन की ब्याज दरें कम कराई, चीनी मिलों में उत्पादित शीरे को पेट्रोलियम मंत्रालय से 5% सिमश्रर् स्वीकृत कराया, किसानों के प्रति टन गन्ने की सप्लाई पर 750 ग्राम॰ चीनी का विशेष कोटा जारी करवाया, गुड तनयाँत्रर् कानून को रद्द करवाया और गेहूं व धान के सरकारी विक्री केंद्रों के अतिरिक्त बिक्री केन्द्र खुलवाने जैसे आमजन के अन्य बहुत कार्य भी उन्हीं के कार्यकाल में हुए।

तीनों काले कानूनों के खिलाफ जब किसानों पर अत्याचार करने के लिए भाजपा की सरकार ने सरकारी ताकतें लगा दी थी तब राकेश टिकैत को सबसे पहले फोन करके हिम्मत देने वाले चौधरी अजीत सिंह ही थे। उम्र के अंतिम पड़ाव में भी उन्होंने किसानों के सम्मान के लिए अपने इकलौते पुत्र जयंत चौधरी को भी किसानों के बीच भेज दिया। चौधरी अजीत सिंह जी ने कभी भी किसी धर्म, जाति और समुदाय की राजनीति नहीं की। उन्होंने हमेशा किसान वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए काम किया।

सन् 2021 किसानों के लिए दुखद रहा है, जहाँ सैकड़ों साथी किसान आंदोलन में शहीद हो रहे हैं, वही दूसरी ओर उनके सुख-दुख का साथी उन्हें छोड़कर चला गया।

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