ऑक्सीजन की कमी से तड़प कर लोग मरते रहे, नेताजी और महान होते रहे

यह सब आप याद रख कर करेंगे भी क्या? कितना याद रखेंगे और किस-किस का? चारों तरफ से ख़बरें आने लगी कि ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं मिल रहे हैं। न घर में इलाज के लिए मरीज़ों को और न अस्पताल वालों को। उसके बाद ख़बरें आने लगीं कि अस्पतालों में ऑक्सीजन वाले बेड नहीं मिल रहे हैं। अस्पतालों के बाहर लोग तड़प कर मर जा रहे हैं। फिर ख़बरें आने लगी कि फलां अस्पताल के पास एक घंटे का ऑक्सीजन बचा है। मरीजों की जान ख़तरे में है। फिर खबर आई कि ऑक्सीजन की कमी से दिल्ली में बीस लोग मर गए।

23 अप्रैल को सबसे पहले खबर तो गंगाराम अस्पताल से आई कि 24 घंटे के भीतर 25 लोगों की मौत हो गई है। इस सूचना के साथ अस्पताल ने यह भी जानकारी दी थी कि दो घंटे के लिए ऑक्सीजन बचा है। इतने बड़े अस्पताल में दो घंटे के लिए ऑक्सीजन बचा हो इसे सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएं। लेकिन खबरों की दुनिया तेजी से घूमती है और खबर बदल जाती है। अस्पताल कहता है कि 25 लोग ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरे। वेंटिलेटर सही से काम नहीं कर रहे थे। मैनुअल वेंटिलेटर पर मरीज को डाला जा रहा है। अस्पताल के प्रबंधन ने सही बोला या नहीं बोला यह जांच का विषय है और इस देश में जांच का क्या होता है बताने का विषय नहीं है। खबरों के मैनेज होने से उन 25 लोगों के परिवारों पर जो दुख का पहाड़ गिरा होगा वह कम नहीं हो सकता जो ऑक्सीजन की कमी से मर गए।

इस बीच रेल मंत्रालय से प्रोपेगैंडा वीडियो बांटा जाने लगता है। ऑक्सीजन ट्रक की ढुलाई करने वाली रेल का वीडियो बनने लगता है। वीडियो बने इसके लिए किसी स्टेशन के बोर्ड के पास ट्रेन धीमी नज़र आती है जबकि उस वक्त वहां धीमी होने की ज़रूरत नहीं लगती। किसी किसी वीडियो में कोई पोस्टर लेकर खड़ा है। चलती ट्रेन का दृश्य आपके भीतर रोमांच पैदा कर रहा है कि हां कुछ हो रहा है। सरकार जाग गई है। अब सब संभलने लगा है। यह सब भी साथ-साथ चल रहा है।

24 अप्रैल को फिर ख़बर आती है। दिल्ली के जयपुर गोल्डन अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 20 मरीज मर गए। कहीं कहीं यह संख्या 25 भी लिखी है। जयपुर गोल्डन अस्पताल भी दिल्ली का एक प्रमुख अस्पताल है। अस्पताल के निदेशक डॉ डी.के बलूजा ने कहा कि सरकार की ओर से शाम पांच बजे तक सप्लाई आनी थी मगर आई आधी रात के बाद। तब तक ऑक्सीजन की कमी से 25 मरीज़ मर गए। जयपुर गोल्डन अस्पताल के डॉ बलूजा दिल्ली हाईकोर्ट के सामने गुहार लगा रहे थे कि ज़िंदगियां बचा लीजिए। 215 मरीज ऑक्सीजन पर हैं और उनकी हालत ख़राब है।

डॉ बलूजा ने गंगाराम के डी.एस राणा की तरह आधी-अधूरी बात नहीं की। साफ-साफ बता दिया कि ऑक्सीजन की कमी से ही 25 लोग मर गए। यह कितना भयानक है। अस्पताल के भीतर दिन रात काम कर रहे डॉक्टरों के लिए भी यह हताशा सुई की तरह चुभती होगी कि उनका मरीज़ मर गया। वो भी ऑक्सीजन की कमी के कारण।

इस बीच हाईकोर्ट से ऑक्सीजन की कमी को लेकर आवाजें आती रहीं। फांसी पर टांग देंगे। किसी को नहीं छोड़ेंगे। कौन जिम्मेदार है? उसे यहां सामने लाओ। ठीक उसी तरह से जैसे प्रधानमंत्री ऑक्सीजन की कमी को लेकर बैठकें करते रहे। पीयूष गोयल वीडियो ट्वीट करते रहे। दिल्ली में कई लोग ऑक्सीजन की कमी से मर गए। किसी को फांसी नहीं हुई और न होगी। जिस वक्त कोर्ट में सुनवाई चल रही थी उस वक्त प्रधानमंत्री पंचायती राज पुरस्कार बाँट रहे थे। राष्ट्रीय विपदा के वक़्त भी पुरस्कार बाँटने के राष्ट्रीय कर्तव्य पर डटे हुए थे। उनकी महानता अमर है। अतुलनीय है। कोई दूसरा कमजोर प्रधानमंत्री होता तो अस्पताल के बाहर चला गया होता।

दिल्ली के कई छोटे-बड़े अस्पतालों को ऑक्सीजन की कमी का सामना करना पड़ा। पीएसआरआई ने भी ट्वीट किया कि कुछ ही घंटों के लिए ऑक्सीजन बचा है। दक्षिण दिल्ली के मूलचंद अस्पताल को ट्वीट करना पड़ा कि दो घंटे की ऑक्सीजन की सप्लाई बची है। कुछ कीजिए। 135 लोग लाइफ सपोर्ट पर हैं। अस्पताल की मेडिकल डायरेक्टर मधु हांडा रो पड़ी। दिल्ली से दूर अमृतसर के नीलकंठ अस्पताल में भी ऑक्सीजन की कमी से 5 लोगों की मौत हो गई है। बत्रा अस्पताल की भी यही हालत हो गई। कई छोटे छोटे अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी हुई होगी हम जानते भी नहीं और कभी जान भी नहीं पाएंगे।

ऑक्सीजन की कमी की खबर को मीडिया ने कैसे कवर किया यह इतिहास में जाने दीजिए। आपके बस की बात नहीं है। वैसे भी आप तक ऐसी ख़बरें कम पहुंच रही होंगी। प्रधानमंत्री ने कैसे मैनेज किया इस तरह की खबरों से आपके सोचने समझने की ख़ाली जगहें भर दी गई होंगी। सुना है टीवी के एंकर पॉजिटिव खबरें दिखाना चाहते हैं। इस खबर को दिखाने में लाज आती है कि दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से तड़प कर 25 लोग मर गए या हुक्मरान के गुस्सा हो जाने के डर से कोई और खबर खोज रहे हैं? अभी तो आप ऑक्सीजन की कमी से मरने वालों की पूरी गिनती भी नहीं जानते। जान भी नहीं पाएंगे।

पहले सूचनाओं का ऑक्सीजन कम किया गया। अब ऑक्सीजन ही कम हो गया। मीडिया ने जो नहीं किया उस पर बहुत लिख बोल चुका हूं। कितनी बार एक ही बात लिखता रहूंगा। गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा ही नहीं लोगों का भी हत्यारा है। मैं बस यही चाहूंगा कि आपको कुछ दिखाई दे। कुछ सुनाई दे कि हो क्या हो रहा है। जो हुआ क्यों हुआ? आपमें इतनी शक्ति आए कि आप टीवी के झूठे पर्दे के पार जाकर अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर सकें और समझ सकें कि आपके अपनों के साथ ऐसा क्यों हुआ।