अंबेडकर के भूमि सुधार और खेती पर लंबे समय से नजरअंदाज विचार

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान आर्थिक विकास में और ग्रामीण भारत में भूख को दूर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चाहे देश के सामयिक आर्थिक विकास में द्वितीयक (उद्योग) क्षेत्र प्रमुख है, फ़िर भी लगभग 65 प्रतिशत लोगों का जीवन अभी भी प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) पर निर्भर है। जी.डी.पी. में कृषि की हिस्सेदारी हाल के दिनों में तेज़ी से गिरी है। कृषि क्षेत्र की भूमिका को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि यह देश में 58 प्रतिशत लोगों को रोज़गार देती है (2001 की जनगणना के अनुसार)

 भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। 79.8 प्रतिशत दलित गांवों में रहते हैं, जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत भूमिहीन हैं और बहुत कम लोगों के पास भूमि है, और वो भी ज्यादातर छोटे किसान हैं। जमीन का हक़ ग्रामीण दलितों के जीवन में बदलाव लाता है, अर्थव्यवस्था में योगदान देता है और साथ ही में उन्हें सम्मानजनक जीवन का आनंद लेने में सक्षम बनाता है। भारत में जाति और वर्ग अविभाज्य हैं, क्योंकि सामंती युग में उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखने वाले लोग आज पूंजीवादी युग में उस नियंत्रण को बरक़रार रखे हुए हैं। जाति का मुद्दा भूमि संपत्ति होने से एक गहरा संबंध रखता है। भूमि सुधार का उद्देश्य सुरक्षित और न्यायसंगत अधिकार प्रदान करना है। ग्रामीण जनता को राज्य समाजवाद के सिद्धांत के तहत उत्पादक ज़मीन पर अधिकार होना चाहिए, जैसा कि डॉ. अंबेडकर द्वारा प्रतिपादित किया गया है, जो राज्य पर दायित्व डालता है कि वह लोगों के आर्थिक जीवन की योजना इस तरह बनाए जिससे निजी उद्दम के मार्ग बंद किए बिना उत्पादकता का उच्चतम स्तर हासिल किया जा सके और धन के समान वितरण के लिए भी प्रदान करे

 राज्य की आर्थिक नीति को समाज के कमजोर वर्गों की रक्षा करनी चाहिए और उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास करना चाहिए। यह भारत को एक अर्द्धसामंती कृषि समाज से एक सामाजिक और पारिस्थितिक रूप से विकसित राज्य में बदलने में मदद करेगा। वेबस्टर की डिक्शनरी के अनुसार भूमि सुधार का अर्थ है वह उपाय जो कृषि भूमि का समान वितरण करने के लिए बनाए गए हों, विशेष रूप से सरकार द्वारा। इसमें ग्रामीण गरीबों को लाभान्वित करने के लिए उन्हें भूमि की समान और सुरक्षित पहुंच प्रदान करते हुए बड़े ज़मींदारों से भूमि के अधिकारों का पुनर्वितरण शामिल है। भूमि सुधार के पीछे डॉ. अंबेडकर की सोच उन अछूतों के उत्थान की थी जो मुख्यतः भूमिहीन या छोटे कृषक थे। खेती करने के अप्रचलित तरीक़ों को, जो धीरेधीरे दक्षता में घट रहे थे, संयुक्त या सामूहिक खेती से बदलने की ज़रूरत थी। यह उनका प्रमुख विचार था। उन्होंने अपनी पुस्तकस्मॉल होल्डिंग्स इन इंडिया एंड रेमेडीज़में प्रचलित भूमि कार्यकाल प्रणाली (कोठी) के खिलाफ़ तर्क दिया है जिसमें ग्रामीण दलित अत्यधिक आर्थिक शोषण का शिकार थे। उन्होंने राज्य विधानसभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया जिसका उद्देश्य धन उधारदाताओं द्वारा कदाचार के रूप में शोषण को रोकना था। महार वतन के खिलाफ़ उनके सफ़ल आंदोलन ने ग्रामीण गरीबों के एक बड़े हिस्से को आभासी संकट से मुक्त किया।

अंबेडकर भारत के पहले विधायक थे जिन्होंने कृषि किरायेदारों की ग़ुलामी के उन्मूलन के लिए एक बिल पेश किया था। वे सभी विधायी और संवैधानिक तरीकों से महार वतन की समस्या का हल करना चाहते थे। उन्होंने 1937 (17 सितंबर) को बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के पूना सत्र में एक बिल पेश किया जिसमें महार वतन को समाप्त कर दिया गया जिसके लिए वे 1927 से आंदोलन कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर भूमि सुधार के और आर्थिक विकास में राज्य के लिए एक प्रमुख भूमिका के लिए एक मज़बूत प्रस्तावक थे। डॉ. अंबेडकर ने भूमि सुधारों की गहनता पर ज़ोर देते हुए कहा कि कृषि की लघुता या अधिकता अकेले उसकी भौतिक सीमा से निर्धारित नहीं होती, बल्कि भूमि पर किए गए उत्पादक निवेश की मात्रा और श्रम सहत अन्य सभी मात्राओं में परिलक्षित होती है। आदर्श भूमि धारण को परिभाषित करते हुए, उनका सिद्धांत उत्पादन के बजाए उपभोग था।

 उन्होंने खेती के एक सामूहिक तरीके और उद्योग के क्षेत्र में राज्य समाजवाद के एक संशोधित रूप के साथ कृषि में राज्य मालिकी का प्रस्ताव रखा। यह कृषि के साथसाथ उद्योग के लिए पूंजी परिशिष्ट की आपूर्ति करने की ज़िम्मेदारी राज्य के कंधों पर रखता है। डॉ. अंबेडकर का कहना था कि कृषि के मुद्दों का समाधानखेतों के आकार को बढ़ाने में नहीं है, लेकिन गहन खेती में है जो कि हमारे पास मौजूद खेतों में अधिक पूंजी और अधिक श्रम को रोज़गार दे सके वे कृषि विकास में गिरावट के प्राथमिक कारण के रूप में छोटे खंडित और गैरआर्थिक संपत्ति पर ज़ोर देने के विषय से काफ़ी चिंतित थे। उन्होंने विचारपूर्वक भूमि की उत्पादकता में वृद्धि पर ध्यान दिया। उनके मुताबिक़ भूमि की आर्थिक और गैरआर्थिक प्रकृति, भूमि के आकार पर नहीं बल्कि उत्पादकता और लागत आदि पर निर्भर है।

 कृषि की मुसीबतों के उपाय मुख्य रूप से छोटी जोतों पर नहीं बल्कि पूंजी और पूंजीगत वस्तुओं पर निर्भर है। औद्योगीकरण इसका एक प्राकृतिक और शक्तिशाली उपाय है। ग्रामीण भारत की जरूरतें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं और यह केवलऔद्योगिक विकास और भूमि सुधारके साथ मिलकर काम करने के विच्छेदन के कारण है। साथ ही उन्होंने राज्य की भूमिका को भी परिभाषित किया जो समाजवादी रहेगा; इसमें लोककल्याण आधारित दृष्टिकोण होना चाहिए ताकि सामंती अर्थव्यवस्था से पूंजीवादी और बाज़ारी अर्थव्यवस्था में बदलाव के दौरान लोगों के आर्थिक शोषण को रोकना राज्य की ज़िम्मेदारी होगी। तेज़ी से बढ़ रहे औद्योगीकरण में राज्य समाजवाद बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमने निजी पूंजीवाद के आने से आर्थिक असमानताओं में वृद्धि का अनुभव किया था।

 स्वतंत्रतावादी तर्क का जवाब देते हुए कि यदि राज्य निजी मामलों में दख़ल नहीं करता, आर्थिक और सामाजिक, तो बाक़ी स्वतंत्रता रह जाती है, डॉ. अंबेडकर कहते हैं: “यह सच है कि जहाँ राज्य हस्तक्षेप से बचता है, वहाँ स्वतंत्रता रहती है। यह स्वतंत्रता किसके लिए है? ज़ाहिर है कि यह स्वतंत्रता जमींदारों को किराए बढ़ाने, पूंजीपतियों के लिए काम के घंटे बढ़ाने और वेतन कम करने के लिए स्वतंत्रता है इसके अलावा, वे कहते हैं: “श्रमिकों की सेनाओं को नियोजित करने वाली और नियमित अंतराल पर बड़े पैमाने पर माल का उत्पादन करने वाली एक आर्थिक प्रणाली में, किसी को तो नियम बनाने होंगे ताकि श्रमिक काम करें और उद्योग के पहिए चलते रहें। यदि राज्य ऐसा नहीं करता है तो निजी नियोक्ता करेगा। दूसरे शब्दों में, जिसे राज्य के नियंत्रण से स्वतंत्रता कहा जाता है, वह निजी नियोक्ता की तानाशाही का दूसरा नाम है।

 

  1. प्रमुख उद्योगों का स्वामित्व और उनके चलाने का नियंत्रण राज्य के पास होगा।

 

  1. बुनियादी लेकिन गैरप्रमुख उद्योगों का स्वामित्व राज्य के पास होगा और यह राज्य द्वारा या इसके द्वारा स्थापित निगमों द्वारा चलाया जाएगा।

3. कृषि एक राज्य उद्योग होगा, और राज्य द्वारा पूरी ज़मीन लेकर इसे गांवों के निवासियों को उपयुक्त मानक आकारों में खेती के लिए दिया जाएगा; इन पर परिवारों के समूहों द्वारा सामूहिक खेतों के रूप में खेती