लोकतंत्र अब जनता की ज़िम्मेदारी है!

रविंद्ररवि” 

वैसे भी हम लोकतंत्र दिवस, अंतराष्ट्रीय स्तर पर ही तो मनाते आये है, खैर,, राष्ट्रीय लोकतंत्र तो वैसे खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। अब हमारे पास आखिर उत्सवधर्मीता से मनाने लायक लोकतंत्र रहा ही कहाँ है?   

साथियों।, 1952 के आम चुनाव के बाद क्रमशः मंद गति से और 21वीं सदी के बीसवें दशक में अत्यंत तीव्रगति से और धारदार तरीके से लोकतंत्र का कत्ल हुआ है और इस लोकतंत्र की हत्या में हथियार बनाए गए हैं कॉरपोरेट घरानों की मुनाफाखोरीऔर अधिकतर सूचना तंत्र को, मीडिया को, भले वह प्रिंट मीडिया होटीवी पत्रकारिता या सोशल मीडिया। चाटुकारिता तो जैसे हिंदुस्तानी मीडिया की पहचान सी हो गयी है। भारतीय लोकतंत्र पर से उठते विश्वास को कुछ ऐसे समझे, एक दौर था जब कपड़े हाथ से बना कर सील कर पहने जाते थे जिसे मेहनत बहुत लगती थी और परिणाम आकर्षक थे। आहिस्ता आहिस्ता खादी के कपड़ों की जगह मशीनों से बुने हुए कपड़ों ने ले लिया और आखिरकार तो पूरा सूट ही रेडीमेड आने लगा, जिसमे कपड़े बुनने की मेहनत, सिलने का श्रम बस आपकी जेब का भार ठीक ठाक हो तो अपने माफिक सूट को अर्जित करना बहुत आसान। ठीक उसी प्रकार आज के इस लोकतंत्र को रेडीमेड लोकतंत्र का नाम देना अतिशयोक्ति होगी स्वाधीन भारत में वैधानिक लोकतंत्र के मायने यह थे, जिसमे जनता के एक एक वोट से उनके विश्वास के अनुरूप लाखों आशाएं लिए एक चेहरे का जनप्रतिनिधि के रूप में  सामने आना। जिनको यहां की जनता के विश्वास और जनमत को हासिल करने लिए धरातल पर जाने क्या क्या काम करने पड़ते थे , विकास का नारा ही नहीं सहारा भी लेना पड़ता था तब कहीं जाकर पारदर्शी जननायक ओर आशानुकूल प्रतिनिधि संसद की शान बन पाता था। 

 यह तथाकथित मायाजाल जब तक जनता के सामने नँगा होता इससे पहले आज का रेडीमेड दौर शुरू हो चुका है इन सालों में हमने लोकतंत्र का सबसे वीभत्स रूप देखा है रेडीमेड लोकतंत्र का दौर। जो कि बेहद चिंताजनक है जिसकी बुनियाद मृतप्राय लोकतंत्र की लाश पर टिकी है। जहां तो विकास करने की जरूरत है किसी दूसरे को नीचा दिखाने की दरकार है। बस कॉरपोरेट घरानों के समर्थन और मीडिया के एक बड़े भाग को नियंत्रित करके, चंद करोड़ों में आपको आजकल रेडीमेड जनप्रतिनिधि मिल जाएंगे। जिनका एक रूप हम मध्यप्रदेश में देख चुके है। लोकतंत्र पर जानलेवा प्रहार था। आम नागरिक के विरोध करने के  सवैंधानिक अधिकार को हर सम्भव दबाया जाने लगा, उसे देश द्रोह, अरबन नक्सल, आंतकवाद ओर खालिस्तानी कहकर, कुचलने के प्रयास, ऐसी ऐसी उपाधियों से नवाजा गया, जिनकी स्वतंत्र भारत मे धरना प्रदर्शन और आंदोलन के लिए कल्पना भी नहीं कि जा सकती जिसके लिए ईडी और  सीबीआई तक कि सरकारी तंत्र का भी दुरुपयोग किये जाने से कोई संकोच नही था। हालांकि राजस्थान में लोकतंत्र विरोधी ताकतों की हार अवश्य हुई है।

 मूल मुद्दों से आवाम का ध्यान भटकाकर समय समय पर नए नए छलावे रचे गए, कभी फ़िल्म इंडस्ट्री कभी पाकिस्तान, कभी हिन्दू राष्ट्रवाद, कभी पत्रकारिता में बोलने की आजादी पर प्रहार। मगर पर इस बीच एक चीज खो सी  गई है और वह है वोट की कीमत जो की आज शून्य हो चुकी है अब तो वोट देना एक सेल्फी इवेंट मात्र बनकर रह गया है। क्योंकि अब आपका वोट यह तो तय कर सकता है कि हमारी इच्छाओं से हम अपना प्रतिनिधि चुन रहे है। लेकिन इस बात के लिए आश्वश्त नहीं कर सकता कि उस प्रतिनिधि की इस दल में मियाद कब तक है।  इधर सविंधान के धर्मनिरपेक्ष राज्य की कमर टूटती नजर रही है। पुर्ण हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, सुसंगठित समाज मे परस्पर फूट का काम कर रही है। साथ ही, मानवता पर जिजीविषा के संकट तक गहराने लगते है।

 ऐसे समय मे मात्र जनता ही वह माध्यम है जो ध्रुवीकरण की और अग्रसर भारतीय लोकतंत्र को उत्तम स्वास्थ्य दे सकती है। आवाज बुलंद करें। जहां अन्याय झलके उसका खुलकर अहिंसक विरोध करें। जनता की आवाज कुछ समय के लिए दबाई जा सकती है मगर विचारों के सैलाब को दबाना नामुमकिन है। बिना जनाधार के आंदोलन खड़े नहीं हुआ करते।

जय हिंद!