मोर्चे पर पत्रकार

शिवांगी सक्सेना 

हम चुनौतियों से लड़ने के तरीके खोज निकालेंगे लेकिन किसी से डरकर रिपोर्टिंग करना नहीं छोड़ेंगे।ये कहना है स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया का जिन्हे कुछ दिन पहले पुलिस ने सिंघु बॉर्डर से उठाकर जेल मे बंद  कर दिया। मनदीप पुनिया शुरुआत से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को कवर कर रहे हैं। मनदीप ने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमे  उन्होंने  29 जनवरी को एक समूह द्वारा सिंघु बॉर्डर पर हमले की आंखोंदेखी बताई। उन्होंने बताया था कि कैसे प्रदर्शन स्थल के पास पचाससाठ लोग आए और उधम मचाने लगते हैं। इस वीडियो में मनदीप ने बताया कि समूह ने प्रदर्शनकारियों पर पथराव किया, पेट्रोल बम फेंके और हजारों पुलिसकर्मियों के सामने किसानों के सामान में आग लगाने की कोशिश की। साथ ही उन्होंने वीडियो में बताया था कि हमलावरों में से दो भाजपा से जुड़े थे। इस वीडियो के वायरल होते ही शाम को पुलिस मनदीप को घसीटते हुए थाने ले गई।

किसान आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा रिपोर्टरों के साथ हो रहा शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न अब सामने से देखा जा सकता है। किसान आंदोलन को कवर करने वाले स्वतंत्र और ऑनलाइन पत्रकारों के खिलाफ पुलिस की आक्रामकता बढ़ती जा रही है। बॉर्डर पर पत्रकारों का आईडी अब इसलिए नहीं माँगा जा रहा कि उनके मीडिया से होने का प्रमाण मिल सके बल्कि पुलिस आईडी देखकर उनसे  मुख्यधारा और ऑनलाइन के अनुसार व्यवहार कर रही है। स्वतंत्र पत्रकार विश्वजीत सिंह लगातार शाहजहाँपुर और गाज़ीपुर  बॉर्डर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं।  29 जनवरी को वो गाज़ीपुर बॉर्डर से रिपोर्टिंग कर रहे थे। ये वहीँ समय है जब पुलिस ने भारी बैरिकेड लगाने  शुरू कर दिए थे। विश्वजीत बताते हैं कि उस  दिन उन्होंने पुलिस का सबसे क्रूर रवैया देखा। वो कहते हैं, “मै जब रिपोर्टिंग करने गाज़ीपुर बॉर्डर पहुँचा तभी मुझे वहाँ पुलिस ने आगे जाने से रोक दिया। एक वरिष्ठ IPS अफसर कह रहे थे केवल मुख्यधारा यानी मैनस्ट्रीम मीडिया को ही आगे जाने की  इजाज़त है।विश्वजीत का कहना है कि ये वहीँ लोग होते हैं जो नैतिकता और अखंडता पर प्रश्न पत्र लिखते हैं, ताकि उस जगह पहुँच सकें जहाँ पर बैठकर वो संविधान का उल्लंघन कर सकते हैं।

26 जनवरी के बाद  सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई है। अब यहां सात लेयर की बैरिकेडिंग की गई है। सड़कें खोदकर उसमें लंबीलंबी कीलें नुकीले सरिये भी लगा दिए गए हैं। पुलिस की तरफ रोड रोलर, जेसीबी और क्रेन खड़ी हैं जिसके ज़रिए लगातार बैरिकेडिंग का विस्तार किया जा रहा है। पहले बैरिकेडिंग किसानों के मेन स्टेज से टिकरी बॉर्डर मेट्रो स्टेशन तक ही की गई थी जिसे अब बढ़ा दिया गया है। पुलिस ने बॉर्डर पर ही सड़क खोदकर उस पर सीमेंट की लेयर लगाई है और नुकीली कीलें लगवा दी हैं ताकि ट्रैक्टर दिल्ली की तरफ पाएं। टिकरी बॉर्डर इस समय किसी जंग के मैदान से कम नहीं लग रहा। स्थिति आर या पार की लग रही है। यहीं नहीं सिंघु बॉर्डर और गाज़ीपुर बॉर्डर पर भी बैरिकेड के कारण रिपोर्टरों को काफी घूमकर एक किलोमीटर चलना पड़ता है। रविंदर MN TV  नाम से ऑनलाइन मीडिया पोर्टल मे बतौर पत्रकार काम कर रहे हैं और पिछले तीन महीने से किसानों के बीच रहकर  अलगअलग बॉर्डर से निरंतर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उनका मानना है कि वो 26 जनवरी के बाद कई बदलाव देख रहे हैं। पुलिस बैरिकेडिंग के ज़रिए डर का वातावरण बनाने की कोशिश कर रही है। रविंदर कहते हैं,”पुलिस हर किसीकी  चेकिंग कर रही है लेकिन मेनस्ट्रीम चैनलों जैसे रिपब्लिक, ज़ी, इंडिया टीवी इनकी कोई चेकिंग नहीं की जाती और सीधा बैरिकेड के आगे जाकर रिपोर्टिंग करने दी जाती है। पुलिस ऑनलाइन चैनलों के पत्रकारों को आगे तो छोडो, बैरिकेड के आसपास भी रिपोर्टिंग नहीं करने देती। यूट्यूब चैनलों ने इस आंदोलन का सच दिखाने की हिम्मत की है और इसलिए उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है।

स्वतंत्र और ऑनलाइन पत्रकारों के साथ पुलिस तानाशाही रवैया अपना रही है। सिंघु बॉर्डर पर रिपोर्टिंग करने के दौरान  रविंदर  को पुलिस द्वारा बदसलूकी का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन्हें पुलिस द्वारा देशद्रोही करार  कर दिया गया। रविंदर ने बताया कि बैरिकेड के पास  मेनस्ट्रीम मीडिया के पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे थे।  फिर भी रविंदर को पुलिस ने आगे जाने से रोका। अनुरोध करने पर पुलिस ने रविंदर को धमकाया कि वो रिपोर्टिंग नहीं कर रहे बल्कि देश को भड़का रहे हैं। इतना ही नहीं पुलिस ने उनका कैमरा तक तोड़ने की धमकी भी दी। स्वतंत्र पत्रकार आकाश पांडेय का 26 जनवरी के दिन भड़की हिंसा के बीच मोबाइल चोरी हो गया। आकाश बताते हैं कि 26 को ट्रेक्टर परेड़ के दौरान  वो नांगलोई चौक के पास ही थे जब हिंसा भड़की। वो अपने मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। अचानक 15 -20 नकाबपोश उपद्रवियों ने उन्हें घेर लिया और मारनेपीटने लगे। वो  उनका मोबाइल छीनकर भाग गए। आकाश कहते हैं कि पुलिस वहीं थी और सामने खड़ी थी लेकिन बजाए उपद्रवियों को पकड़ने के पुलिस मूकदर्शक बनकर चुपचाप सब कुछ देखती रही। वहाँ दिल्ली पुलिस की गुंडागर्दी नहीं चली। जबकि वो पत्रकार जो सच दिखा रहे हैं और शालीनतापूर्वक  अपना काम कर रहे हैं उन्हें घसीटते हुए जेल में बंद कर देती है।