जूम करके देखिए आंदोलन

नवल किशोर कुमार

क्या आप जानते हैं 1952 में देश की अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी कितनी थी और समय के साथ यह कैसे घटती गई है? यह एक सवाल है जिससे बात शुरू की जा सकती है इक्कीसवीं सदी के दो दशकों में सबसे बड़े आंदोलन की। यह आंदोलन है किसानों का आंदोलन।

असल में इस आंदोलन को समझने के लिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि ये किसान किस कारण से जान तक देने को आतुर हैं। इसके लिए यह समझना आवश्यक है कि कैसे कृषि की हिस्सेदारी घटती गई है और अन्य क्षेत्रों की भूमिका भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ती रही है। मसलन, 1952 में देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की हिस्सेदारी करीब 44 फीसदी थी। समय के साथ इसमें गिरावट की गति किस कदर तेज हुई है, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2012 में यह करीब 17 फीसदी रह गई। वर्ष 2019-20 का आंकड़ा तो हैरान करने वाला है। अब यह 15.96 प्रतिशत रह गई है। जबकि सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 49.88 फीसदी।

सनद रहे कि विनिर्माण क्षेत्र में हुई प्रगति भी उल्लेखनीय है। कुल मिलाकर तथ्य यह है कि जैसेजैसे देश में उद्योगों की भूमिका बढ़ी, व्यापार आगे बढ़ा, कृषि पिछड़ती चली गई। इसके साथ ही अवधारणाएं भी बदलीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कृषि राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल थी क्योंकि जीडीपी में उसकी सबसे अधिक भूमिका थी। जैसेजैसे उसकी भूमिका में कमी आयी, सरकारों की प्राथमिकता का स्तर भी घटता चला गया। अभी जो स्थिति है, उसके मुताबिक सेवा क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता में है। इसकी एक वाजिब वजह भी है। देश की कुल जीडीपी में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी है।

सरकार ने इसी सेवा क्षेत्र को तवज्जो दी है। इसके लिए तीन कानून लाए गए हैं। पहले तीनों कानूनों पर चर्चा कर लें। पहला कानून है, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020 इसके बारे में सरकारी दावा है कि यह कानून किसान को अपनी उपज मंडियों से बाहर सीधे बाज़ार में बिना दूसरे राज्यों को टैक्स चुकाए बेचने का अधिकार देता है। सरकार के हिसाब से यह उसका क्रांतिकारी कदम है। लेकिन किसान कह रहे है कि यह मंडियों को ख़त्म करने का प्रयास है और किसानों को बाज़ार के हवाले करने की साजिश है। दूसरा कानून है मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध अधिनियम 2020 इसके मुताबिक किसान संविदा आधारित खेती कर सकेंगे और उसकी अपने स्तर पर मार्केटिंग भी कर सकते हैं। जबकि किसान सशंकित हैं कि छोटी जोत वाले किसान इस व्यवस्था में पिसकर रह जाएंगे। उनको कोई पूछने वाला नहीं रहेगा। किसानों का तो यहां तक कहना है कि सरकार इसके ज़रिए उन्हें अपनी ही खेत का मालिक से नौकर बनाने जा रही है। तीसरा कानून है आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम 2020 यह कानून उत्पादन, भंडारण के अलावा दलहन, तिलहन और प्याज की बिक्री को युद्ध जैसी असाधारण परिस्थितियों के अलावा नियंत्रण से मुक्त करने की बात कहता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह जमाखोरी बढ़ाने वाला कानून है। किसान भी यही मानते हैं कि यह जमाखोरी को कानूनी संरक्षण देने का सरकारी प्रयास है। 

इसके पहले कि हम कोई निष्कर्ष पर पहुंचें, हमें कुछ और बातों पर संज्ञान लेना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 2013 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक जिन किसानों के पास 0-1 एकड़ जोत रही, उनमें से 41 प्रतिशत किसानों ने साहूकारों से कर्ज लिये। 14 प्रतिशत किसानों ने अपने रिश्तेदारों और मित्रों से कर्ज लेकर खेती की। इस प्रकार कुल 55 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों ने बैंकों की ओर रूख नहीं किया। इसके विपरीत जो बड़े किसान हैं, जिनके पास दस एकड़ से अधिक जोत है, उनमें 80 फीसदी किसानों ने बैंक से कर्ज लिये। बाद के वर्षों में इन दोनों आंकड़ों में समानुपातिक वृद्धि हुई है। यह आंकड़ा मौजूदा आंदोलन के मूल में है। बड़े किसानों के उपर बैंकों का कर्ज है। उनके उपर ईएमआई चुकाने की मजबूरी है तो छोटे सीमांत किसानों के पास रेहन रखी गई यानी साहूकारों के यहां गिरवी रखी गई जमीन छुड़ाने की। ऐसे में एपीएमसी एक्ट के प्रभावकारी ढंग से लागू नहीं होने और फसल की वाजिब कीमत नहीं मिलने से वे गहरे संकट में घिर गए हैं। यही वजह है कि सरकार के बारबार आश्वासन के बावजूद वे तीनों कृषि कानूनों को खत्म करवाना चाहते हैं।

अब इस आंदोलन के स्वरूप पर बात करते हैं। असल में इस आंदोलन में जितनी संख्या बड़े किसानों की है, उससे कम छोटे और सीमांत किसानों की नहीं है। छोटे और सीमांत किसानों के कारण ही यह आंदोलन इतनी आयु पा सका है और इतनी जीवटता कि सरकार भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रही है। दरअसल, यही इस आंदोलन का सबसे मजबूत पक्ष है जिसे केंद्र सरकार समझकर भी नजरअंदाज कर रही है। वह इसे छोटे किसानों का आंदोलन मानकर बड़े आंदोलन को निमंत्रण नहीं देना चाहती है। इसकी वजह यह है कि यदि आज सरकार अपने फैसले को वापस लेती है तो कल उसे भूमि सुधार, सीलिंग से फाजिल जमीनों का वितरण, भूमिहीनता का सवाल के अलावा शिल्पकार अन्य समाज के लोगों के आंदोलन का सामना करना पड़ेगा।

बहरहाल, यह आंदोलन एक नजीर है नवउदारवादी नीतियों के विफल होने की। सरकार यह भूल रही है कि सेवा क्षेत्र की साख तभी तक है जब तक कि बहुसंख्यकों के पास क्रय क्षमता है। यदि किसानों की वित्तीय स्थिति नहीं संभली और कृषि के क्षेत्र में रोजगार की संभावना मजबूत नहीं हुई तो मुमकिन है कि सेवा क्षेत्र में हुआ विस्तार रेत के महल की तरह भरभराकर गिर जाएगा।