किसान आत्महत्या से शमशान बने महाराष्ट्र से उठती संघर्ष की आवाज

गिरीश फोंडे

पिछले 45 दिनों से, उत्तर भारत सहित देश भर के किसान राजधानी दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर चक्का जाम आंदोलन कर रहे हैं। 20 सितंबर 2020 को केंद्र सरकार द्वारा कोरोना लॉकडाउन अवधि का फ़ायदा उठाते हुए अन्यायपूर्ण तीन कृषि कानूनों को संसद में पारित किया गया था। किसानों को केंद्र सरकार की साजिश का एहसास हुआ और तब से देश भर के हर जिले में किसान आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन का सबसे बड़ा चरण किसानों ने दिल्ली की सीमाओं को अवरुद्ध करके शुरू किया है। 

किसानों की भूमिका उनके इस लड़ाई में सकारात्मक दिशा में बढ़ रहा है क्योंकि पहले किसानों ने अन्याय के सामने समर्पण किया था और हजारों किसानों ने आत्महत्या की। आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आत्महत्या करने वाले किसानों के पीछे, परिवार को ऋण चुकाना है। सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है। इसलिए हम सोचते हैं कि किसानों को उनके अधिकारों के लिए संघर्ष लोकतंत्र को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की एक प्रक्रिया है। 

यदि हम राजा शिवाजी महाराज द्वारा शासित महाराष्ट्र के इतिहास में देखें तो राजा शाहू जी हमें किसानों के हित में नीतियाँ बनाते दीखते हैं। इसकी वजह से महाराष्ट्र में खेती फलफूल रही थी। सुधारक महात्मा ज्योतिबा ने किसानों की स्थिति का विश्लेषण किया और साबित किया कि शेठजी और भटजी (अमीर कर्जदाता और पंडित) किसानों के असली दुश्मन हैं। किसान आंदोलन के लिए ऐतिहासिक अवसर है कि अब इन समाज सुधारकों के दिखाए रास्तें पर चलें। किसानों के राष्ट्रीय आंदोलन ने भी महाराष्ट्र के किसानों को ताकत दी है और उन्हें लड़ने का भरोसा दिया है। नतीजतन, महाराष्ट्र में किसानों ने विभिन्न वाहनों में दो या तीन राज्यों की सीमाओं को पार किया और दिल्ली में शाहजहाँपुर सीमा पर पहुंच गए। इसमें किसानों के बच्चों, छात्रों और युवाओं के साथसाथ आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाएँ भी शामिल हैं। हालांकि इस विशेष आंदोलन की मांग अन्य कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए है, लेकिन इस आंदोलन ने कृषि और किसानों की समस्याओं को वैश्विक स्तर पर ला दिया है।

2011 की जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र की लगभग 55% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इस ग्रामीण आबादी के लिए आजीविका के चार स्रोत हैंकृषि, गैरकृषि उद्योग / व्यवसाय, मजदूरी और नियमित मजदूरी रोजगार। 2012 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 44% घरों में कृषि मुख्य व्यवसाय है। हालांकि, खेती करने वालों का अनुपात जाति से भिन्न होता है। यह अनुपात उच्च जातियों में 46 प्रतिशत, अन्य पिछड़ी जातियों में 41 प्रतिशत, आदिवासियों में 31 प्रतिशत और दलितों में केवल 21 प्रतिशत है। यह दलितों पर खेती करने के लिए लगाए गए अवरोध का परिणाम है।

महाराष्ट्र में देश में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएं होती हैं और विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य और केंद्र सरकारें किसानों की उम्मीदों और लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं। पिछले 20 वर्षों में, सबसे अधिक 15,221 किसानों ने अमरावती डिवीजन में आत्महत्या की है, उसके बाद औरंगाबाद डिवीजन में 7,791 हैं। विभिन्न संकटों का सामना करते हुए भी किसान, जो दुनिया का अन्नदाता हैं, को इस वर्ष कोरोना लॉकडाउन में एक नया अनुभव मिला। 

जुताई से लेकर कटाई तक, किसान को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कम से कम उसके बाद, उसे गारंटी कीसुरक्षाकी आवश्यकता है। इसका कारण है कि बाजार की कीमतों में भारी उतारचढ़ाव। उसे बाधाओं, व्यापारियों, दलालों और बिचौलियों की एक श्रृंखला द्वारा लूट लिया जाता है। साथ ही उसे विश्व व्यापार कीस्वतंत्रताहोनी चाहिए। इसलिए हम मांग करते हैं, “राज्यों के कृषि मूल्य आयोग को उस राज्य के लिए कृषि वस्तुओं की कीमत तय करने का अधिकार होना चाहिए।

किसानों ने शोषण के ख़िलाफ़ जून 2017 में महाराष्ट्र में एक ऐतिहासिक किसान हड़ताल के माध्यम से पूर्ण ऋण राहत की मांग की। हड़ताल की तीव्रता के कारण, सरकार को किसानों के लिए पूर्ण कर्ज माफी की घोषणा करनी पड़ी। बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री ने दावा किया कि राज्य के 1करोड़ 36 लाख किसानों में से 89 लाख 87 हजार किसान बैंक खातों से लाभान्वित होंगे। हालांकि, कार्यान्वयन में, सरकार ने किसानों को धोखा दिया। कर्जमाफी के लिए बेहद जटिल शर्तें लगाई गई थीं। परिणामस्वरूप, लाखों किसानों को कर्ज माफी से बाहर रखा गया।

बिजली आपूर्ति क्षेत्र में भी किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बिजली की उच्च दर फसलों की उत्पादन लागत में इजाफ़ा कर देती है। बिजली दर घटाने में भूमिका निभाने के बजाय केंद्र सरकार को नए बिजली सुधार बिल पेश करने हैं, जिसके तहत कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली सब्सिडी को रद्द किया जाना है। महाराष्ट्र में प्याज, कपास जैसे फ़सलों के मूल्यों में बढ़ोतरी को लेकर पिछले कुछ साल में बड़े आन्दोलन हुआ हैं. पर भी समाधान निकलने में असफ़ल रही है

महाराष्ट्र हो या किसी दुसरे राज्य में सहकारी क्षेत्र नें किसानों को न्याय देने में योगदान दिया है. इसमें कुछ खामियां हैं लेकिन उन खामियों की दुहाई देकर पीछे के दरवाजे से किसानों को निजी क्षेत्र के हवाले करना बीजेपी सरकार का एक बड़ा षड्यंत्र है. 1991 के बाद उदारवादी नीतियों को अपनाने के बाद कृषि क्षेत्र में संकट लगातार गहराया है. बीजेपी सरकार उदारवादी नीतियों की गति अपने विशाल बहुमत के जोड़ पर कृषि क्षेत्र को पूरा ख़त्म करना चाहती है. विश्व व्यापार संगठन (WTO) से जुड़े अनेक क़रार के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखाने के लिए स्वघोषित विश्व गुरु मोदी सरकार किसानों से ग़द्दारीकरने से भी परहेज नहीं कर रही है

पहले से ही इस देश व्यापी ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने कॉर्पोरेट की मदद के लिए आगे अनुमानित बिल लगाने की चेतावनी देकर जीत हासिल की। इस आंदोलन का महाराष्ट्र किसान आंदोलन पर लंबे समय तक प्रभाव रहेगा। महाराष्ट्र किसानों के लिए स्वर्ग हुआ करता था दुर्भाग्य से यह किसानों के लिए शमशान में बदल गया। अब महाराष्ट्र के किसान संघर्ष के माध्यम से अपनी अपना उज्जवल भविष्य लिखने को तैयार है। 

जय जवान, जय किसान!