नागरिकता क़ानून और शाहीन बाग आंदोलन: एक साल

आसिफ़

2014 में 31% एवं 2019 में 37.36% वोट हासिल करने वाली बीजेपी सरकार भारत के  नागरिकता क़ानून को बदलकर 10 दिसंबर 2019  को, नया नागरिकता (सांसोधन) अधिनियम  लागू किया। 11 दिसंबर 2019 को भारत के राष्ट्रपति ने अधिनियम को हरी झंडी दिखा दी। इस अधिनियम में, 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफ़ग़ानिस्तान से आए हिंदू, बुद्ध, जैन, पारसी, ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। धर्म के आधार पर नागरिकता को जोड़ने के इस अधिनियम को सत्तारुढ़ बीजेपी समर्थकों ने मानवता के हित में बताया।

नागरिकता अधिनियम और इसके मंसूबों का विरोध असम में पहले से ही चल रहा था। धर्म और नागरिकता को साथ मे जोड़ना, भारतीय संविधान के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय पर हमले के रूप मे देखना कोई ग़लत नही था और ना है! क्योंकि अस्सी के दशक मे श्रीलंका से अपनी जान बचाकर आने वाले तमिल मूल के लोगों को नागरिकता नहीं दी गई, म्यानमांर में धर्म के नाम पर मारे जा रहे मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए मानवता नही जागी, पाकिस्तान में शिया, अहमदी, अन्य अल्पसंख्यक जो धार्मिक कट्टरपंथी का शिकार हुए, को भी अनदेखा कर दिया गया।

बीजेपी, आरएसएस, उनके समर्थकों के राजनीतिक मंसूबों जैसे धार्मिक ध्रुवीकरण, हिंदू राष्ट्र का सपना जब लोगों ने नकार दिया। अधिनियम बनते ही लोगों ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिये अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग किया। लोग सड़कों पर आए, अधिनियम के ख़िलाफ़ बोले और नारे बुलंद किए। सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार संविधान को नहीं मानती उन्होंने ऐसा साफ कर दिया, जब जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रदर्शन कर रहे छात्रों को क्रूरता के साथ मारा गया, लाइब्रेरी तोड़ी गई और सांस्थानिक भेदभाव किया गया। मगर संविधान को बचाने, अमन को कायम रखने, धर्मनिपेक्षता सेकुलरिज्म को ज़िंदा रखने के लिए लोग सड़कों पर आने लगे। हालांकि प्रदर्शनकारियों के संख्या में बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय था, जिसके संवैधानिक अधिकार एवं अस्तित्व पर ये अधिनियम सीधा हमला कर रहा था। 

शाहीन बाग़ में शुरू हुए आंदोलन ने पूरे समाज, सोच, राजनीति को हिला कर रख दिया। आंदोलन की अगुवाई वहीं महिलाएं कर रही थी जिनको जंज़ीरों में बंधा, कमजोर और बेसहारा दिखाने की कोशिश मुस्लिम वीमेन एक्ट 2019 के द्वारा सरकार ने की थी।शाहीन बाग़ जो देश के अलग अलग हिस्सों तक फैल चुका था, प्रोटेस्ट के नए तरीकें इज़ाद करने लगा। जैसे इतिहास की समझ पैदा करना, अहिंसा को अपनाना, अम्बेडकर के सपने को बचाना, प्रदर्शन और किताब को जोड़ देना, महिलाओं का नेतृत्व में होना।

ऐसे में लगातार मज़बूती से बढ़ते आंदोलन को रोकने के अलग अलग प्रयास किए गए।  कभी सरकार के प्रतिनिधि जनता को भड़काने और भ्रमित करने वाले स्टेटमेंट देते, तो कभी मीडिया की सहायता से प्रोपेगंडा चलाया जाता। उदहारण के तौर पर केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का नारादेश के गद्दारों कोगोली मारों सालों कोजो उन्होंने रिठाला में चुनाव रैली के दौरान लगाया था। इसी नारे और इसारे के बाद नौजवान राम भगत ने मुकदर्शी दिल्ली पुलिस के सामने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर गोली चलाई।

आंदोलन के दौरान 40 के लगभग लोग पुलिस हिंसा में मारे गए। और सरकार उसके नुमाइंदे कभी आंदोलन के पाकिस्तान से लिंक जोड़ते तो कभीआतंकवादी बोलते। कहीं अर्बन नक्सल कहते तो कभी विपक्ष का ड्रामा। आंदोलन को ठेश पहुंचने सवाल पूछने वाले लोगों खासकर अधिनियम का विरोध कर रहे मुस्लिम समुदाय को सबक सिखाने के लिए नार्थ ईस्ट दिल्ली में हिंसा को भड़कने दिया गया, जिसमे ऑफिसियल डाटा के हिसाब से 53 लोगों की जान गई। हिंसा भड़काने वालों जैसे कपिल मिश्रा को पुलिस संरक्षण मिला और अल्पसंख्यक, गरीब, मज़दूर को गोली, लाठी, और जेल।कोरोना के बहाने प्रदर्शन हटाया गया मगर नौजवान प्रदर्शनकारियों को जेल के भीतर डाला जाने लगा। 

अभी भी अखिल गोगोई से लेकर खालिफ सैफी तक जाने कितने लोगों को UAPA के अंतर्गत जेल में कैद कर रखा है। आज हमारे पास सबक लेने के लिए नागरिकता अधिनियम से जन्मे नागरिक आंदोलन है। सरकार कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर हमें तोड़ने की कोशिश करेगी। जिस तरह किसान आंदोलन को खलिस्तानी कहा गया उसी तरह शाहीन बाग़ आंदोलन को पाकिस्तानी कहा गया। कभी गुमराह तो कभी अराजक तत्व बताया जाता है। मगर पते की बात ये है की जब जब इस सरकार से सवाल पूछे जाते हैं तो ये धर्म का सहारा लेती है, सवाल पूछने वालों को जेल में डालती है, संगीन आरोप लगाती है। इसलिए आज ज़रूरी है कि आज का किसान, मज़दूर, अल्पसंख्यक, आदिवासी, महिलाएं, विद्यार्थी, शिक्षक, बच्चाजवानऔर बूढा, अर्थव्यवस्था, महंगाई, शिक्षा, रोजगार,ग़ैरबराबरी, सामाजिक सांस्थानिक न्याय जैसे मुद्दों पर गोलबंद हो और सरकार में मौजूद आरएसएस के नुमाइंदों के समाज को बांटने और राज करने के मंसूबो को धराशायी करे।