दो आंदोलन अलग होते हुए भी एक!

आदित्य

आज पिछले एक महीने से देश में किसान आंदोलन एक सत्ता के ख़िलाफ़ विरोध के नए पैमाने लिख रहा है। भारत के इतिहास मे आज़ादी के बाद शायद किसानों का यह सबसे बड़ा आंदोलन होगा। किसानों औऱ मजदूरों के अंदर इस प्रकार की चेतना न सिर्फ उनके लिए हितकारी हैं बल्कि समाज की भी एक जरूरत है। किसान किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए न सिर्फ एक रीढ़ की भूमिका निभाता है, बल्कि भारत जैसे एक कृषि प्रधान देश में अर्थव्यव्स्था का कोई भी पहलू ऐसा नहीं है  जिसे कृषि प्रभावित न करता हो। जहाँ लॉकडॉउन के समय में देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गई थी और जीडीपी भूतल की औऱ तेज रफ़्तार से बढ़ते जा रही थी। तब कृषि के क्षेत्र ने ही लॉकडॉन के दौर में भी विकास किया था। सरकार को कृषि की महत्ता समझाने के लिए शायद ये आँकड़े काफ़ी नहीं थे। इसलिए कोरोना काल का फायदा उठाते हुए सरकार सबसे पहले कृषि अध्यादेशों को लाती हैं औऱ उसके बाद उन्हें कानूनों मे परिवर्तित कर देती हैं।

किसानों के आंदोलन की अगर हम उपलब्धियां गिने तो यह फ़िर उनके संघर्ष की अवहेलना होगी। किसानों के इस आंदोलन ने जयप्रकाश नारायण के 1974 के सम्पूर्ण क्रांति  आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति को दोबारा से एक नई दिशा दिखाने की कोशिश करी है। इस आंदोलन ने देश मे हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाली एक पार्टी के सत्ता मे आने के बाद से लड़ रहे लाखो-हज़ारो छात्रों युवाओं औऱ गरीब-मजदूरों के अंदर एक नई उम्मीद दी है, कि आज भी  भारतीय राजनीति मे जनता की आवाज़ औऱ फ़ैसला ही सर्वोच्च है। ऐसी कोई भी पार्टी जिसके लिए उसका अपना हित जनता के हितों या जरूरत से होकर ना गुज़रे वह सत्ता मे रहने योग्य नहीं होती।

नागरिकता क़ानून विरोधी आंदोलन भी पिछले साल कुछ इसी समय शुरू हुए थे। वही कोहरे वाली राते, हड्डियों को गला देने वाला जाड़ा औऱ इसी ठंड के बीच में से निकलती इंकलाब के नारों की गूंज जो कि पूरे वातावरण मे नई उर्ज़ा का संचार भर देती थी। अब ‘थी’ कहे की ‘हैं’ क्योंकि न सत्ता बदली है, न ही उसके जुल्म और ना ही लोगों के अंदर उन जुल्मों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने का जोश बदला है। बदला है तो सिर्फ मुद्दा। मुद्दा जो पहले समाजिक रूप से कमजोरों के साथ खड़े होने का या औऱ इस बार आर्थिक रूप से कमजोरो के साथ खड़े होने को लेकर है। ये दोनों आंदोलन अलग होते हुए भी एक है।

ये दोनों ही वर्ग चाहे वो मुस्लिम समाज हो या अभी के आंदोलन मे सक्रिय किसान वर्ग जिसमें की पंजाब की सिख कौम का एक बड़ा योगदान है, ये दोनों ही वर्गों ने एक बहुत ही लंबे अंतराल के बाद ऐसे कोई आंदोलन किए है।

सरकार ने इन दोनों ही वर्गों को कम आंकने की भूल करी। CAA के खिलाफ हुए आंदोलन कानून आने के तुरंत बाद पूरे देश में छोटे-छोटे पैमाने पर शुरू हो गए जिसके बाद इन्होंने एक बहुत व्यापक रूप ले लिया। कुछ चंद लोगों से शुरू हुआ *’शाहीन बाग़’* के ऐतिहासिक आंदोलन मे हज़ारो की भीड़ कब जुटने लगी किसी को  नहीं पता लेक़िन उसने भारतीय राजनीति औऱ उसके इतिहास पर एक गहरी छाप जरूर छोड़ी। ठीक इसी प्रकार किसी को नही पता था कि किसान 26 नवम्बर को सभी मजदूर संगठनो औऱ किसान यूनियनों को द्वारा दी गई राष्ट्रव्यापी आंदोलनों की मांग कब इतना बड़ा रूप लेगी। इस आंदोलन ने देश की राजधानी की धमनियों को बंद करने का काम किया है ताकि सरकार तक उनकी बात पहुंच सके।

इन दोनों ही आंदोलनों का जितना राजनीतिक महत्व है उतना ही सामाजिक भी है। नागरिकता क़ानून विरोधी आंदोलनों ने ना सिर्फ़ मुस्लिम समाज में सिर्फ़ महिलाओं को एक नया दर्जा दिया बल्कि उनके अंदर अपनी आज़ादी और शिक्षा के प्रति भी नयी जाग्रति पैदा की। इन दोनो ही आंदोलनों में महिलाओं की एक अलग और सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है क्यूँकि महिलाओं के बिना शायद ये आंदोलन इस व्यापक स्तर पर ना पहुँच पाते। शाहीन बाग की बिलक़िस दादी हो या दिल्ली किसान आंदोलन में जसबीर कौर जी, महिलाओं की भागीदारी समाज में आगे वाली पीढ़ियों में एक क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। यह पीढ़ी अपने हुक्मरानों से सवाल पूछेगी और उन्हें मजबूर करेगी की वो सत्ता के लोभ को त्यागकर जनता की आवाज़ को सुने।

इन दोनो ही आंदोलनों के प्रति भारतीय मीडिया की क्या प्रतिक्रिया रही यह किसी से छुपा नहीं है। क्यूँकि जिन्हें भारत में अल्पसंख्यको के एक इतने बड़े आंदोलन में बिरयानी और 500 रुपय दिखने लगे उनके लिए भारत के अन्नदाता के आंदोलन में खलिस्तान दिखना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है दोनो आंदोलनों में सरकार का रवैया, भारत के ब्रिटिश शासन के दौरान भी जब जनता सड़कों पर होती थी तो अंग्रेज उनसे इसकी वजह जानने और बात करने आते थे। लेकिन ना तो CAA के समय सरकार ने किसी प्रकार की बातचीत करी और ना जब किसान ३ महीने से आंदोलन कर रहे थे तब पूछी गयी। सरकार के आला अफ़सर केवल विज्ञान भवन में मीटिंगे रखवाते है।

किसानो के इस आंदोलन का भले ही कोई निष्कर्ष निकले या ना निकले इनकी मदद से हमारे आगे आने वाली पीढ़ियों की विचारधारा और सोच में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। इन आंदोलनों ने समाज की कुरीतियाँ को जिन्हें हज़ारों सालों से तोड़ना मुश्किल हो गया था उन पर इतनी गहरी चोट करी है की अगले कुच सालों में हमें वो धूमिल होती हुई नज़र आएँगी। किसानों की इस लड़ाई से ना सिर्फ़ पंजाब के लोगों को बल्कि देश में उन तमाम तबकों की उम्मीदें जुड़ी हुई है जो अपने साथ हो रहे अन्याय के ख़िलाफ़ कहीं ना कहीं एक छोटी या बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं।