घड़साना आंदोलन: एक भूला हुआ किसान संघर्ष

सुधीर कुमार सुथार

राजधानी दिल्ली के चारों और जारी किसान आंदोलन भारत में लोकतंत्र के समसामयिक इतिहास के सबसे प्रमुख घटनाओं में से एक है। ये प्रदर्शन केवल देश में किसान, गॉंव और कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े सवाल हैं अपितु देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण और उसे जीवित रखने में देश की ग्रामीणकृषि आधारित जनसंख्या की प्रमुख भूमिका को भी दिखाते हैं। यद्यपि इस पूरे आंदोलन को गोदी मीडिया द्वारा पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की संज्ञा देकर इसे लगातार केवल कुछ वर्गों की नए किसान कानूनों के प्रति असंतुष्टि के रूप में दिखाया जा रहा है, परन्तु इसकी पृष्ठभूमि में इन क्षेत्रों के किसानों की खूनपसीने से भरे संघर्ष की गाथाएं भी शम्मिलित हैं जो कहीं कहीं मीडिया प्रोपेगंडा में धूमिल होकर रह गयी हैं।

वर्तमान आंदोलनों के बारे में बात करते समय अक्सर पंजाब हरियाणा के उदाहरणों को देश के अन्य क्षेत्रों से अलग उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि चूँकि इन दोनों राज्यों में हमेशा से सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध थी इसी कारण इन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य, और सरकारी परियोजनाओं का लाभ मिला और आज जब इन किसानों को इन सुविधाओं के छिन जाने का ख़तरा है तो ये अपने विशेषाधिकारों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।  इस प्रकार के कुतर्क देते समय अक्सर तथाकथित विशेषज्ञ ये तथ्य नज़रअंदाज़ कर देते हैं (या फिर वो जानबूझकर इन तथ्यों को देखना नहीं चाहतेकी इन दोनों राज्यों के बहुत सारे क्षेत्र और राजस्थान के कुछ क्षेत्र हमेशा ऐसे ही खुशहाल  नहीं थे। इस खुशहाली के पीछे यहाँ के खेत मजदूरों, किसानों, मजदूरों और व्यापारियों का कड़ा जीवन संघर्ष शामिल है। राजस्थान के श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिले के कुछ क्षेत्रों कृषि विकास वास्तव में यहाँ के किसानों की कड़ी मेहनत, लगन और संघर्ष की कहानी है।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य, या फिर मंडियों को बचने की ही कवायद नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि में 1980-90 के दशक में बहुचर्चित रहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, या फिर कर्नाटक या महाराष्ट्र के किसान आंदोलनों (जिन्हें समाज विज्ञानी नए किसान आंदोलन कहकर सम्बोधित करते हैं) की ही कहानी नहीं है। उत्तरपश्चिमी भारत जो आज के आंदोलनों का केंद्र है, वास्तव में किसान आंदोलनों के इतिहासों से पटा पड़ा है। ये आंदोलन चौधरी कुम्भाराम आर्य, या फिर सर छोटू राम के नेतृत्व में किसान संघर्षों की कहानी तो है ही इसके अतिरिक्त इसमें और भी कई ऐसे किसान संघर्षों के उदहारण हैं जिन्हें भारत की नवउदारवादी अर्थव्यवस्था की यात्रा वृतांत में भुला ही दिया गया है।   

2004 से 2006 तक राजस्थान के उत्तरी जिलों श्री गंगानगर और हनुमानगढ़ तथा बीकानेर के कुछ हिस्सों में हुए किसान आंदोलनों का उदाहरण इसमें प्रमुख है। इन आंदोलनों का केंद्र घड़साना, रावला और खाजूवाला के छोटे कस्बे थे। इन किसान आंदोलनों में हज़ारों की संख्या में किसानों ने भाग लिया। इन आंदोलनों में 7 किसानों की पुलिस फायरिंग में मौत हो गयी, सैंकड़ों किसान घायल हुए। राज्य सरकार द्वारा भरपूर ताकत का उपयोग इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए किया गया परन्तु इनके बावजूद ये आंदोलन करीब दो साल तक चला और क्षेत्र के किसान लगातार अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे। इन आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी यही थी की इसमें किसान, मजदुर, व्यापारी और अन्य ग्रामीण वर्गों ने भरपूर साथ दिया और एकत्रित होकर संघर्ष किया। इस आंदोलन ने ये दिखाया की इन सभी वर्गों की एकता किसी भी किसान राजनीति की सफलता की पूर्व शर्त है। इस आंदोलन की सफलता का ही परिणाम था कि राजस्थान सरकार को कृषि सिंचाई हेतु नहरी पानी के वितरण में नए सिरे से सुधार करने को मजबूर होना पड़ा।

इस आंदोलन का महत्व जानने के लिए इसकी पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। 1950 के दशक में इंदिरा गाँधी नहर परियोजना (जिसे पहले राजस्थान नहर परियोजना के नाम से जाना जाता था) के राजस्थान में पहुँचने से नए क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर जिलों के कुछ क्षेत्र इस परियोजना से काफी लाभान्वित हुए। जहाँ एक ओर इस क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसानों को इससे लाभ हुआ वहीँ ऐसे में धीरे धीरे गंग नहर के लाभान्वित क्षेत्रों के छोटे और मंझले किसानों ने अपनी कृषि भूमि को महंगे दामों में बेचकर इंदिरा गाँधी नहर के विस्तार क्षेत्र में कृषि भूमी खरीदकर वहां बसना आरम्भ कर दिया। 1970 -80 के दशक में अनूपगढ़, सूरतगढ़, खाजूवाला, रावला, घड़साना इत्यादि नए कृषि उपज मंडी समिति क्षेत्रों का जबरदस्त विकास इंदिरा गाँधी नहर के माध्यम से सिंचाई परियोजनाओं कारण हुआ। मंडियों का किसानों के विकास में क्या योगदान है इसका बेहतरीन जीवंत उदाहरण ये क्षेत्र हैं। कभी रेगिस्तान रहे ये इलाके किसानों की मेहनत और लगन के कारण हरे भरे लहलहाते क्षेत्रों में तब्दील हो गए।  केवल वर्षा आधारित कृषि वाली अर्थव्यवस्था अब सिंचाई आधारित थी, लू के थपेड़ों और धोरों वाली धरती अब नयी आबादी से भर चुकी थी। नयी विकसित हुयी मंडियों ने किसानों के लिए ऑक्सीजन का काम किया। वहीँ नए व्यापारी वर्ग और असंगठित क्षेत्र का भी विकास इस पूरे क्षेत्र में हुआ। 1980 के दशक की कहानी इन क्षेत्रों के विकास और इस इलाके के किसानों के विकास की कहानी है।

2004 में राजस्थान सरकार ने बिजली वितरण में सुधारों को लागु किया जिससे बिजली की दरों में काफ़ी वृद्धि हुयी। इसके साथ ही राजस्थान सरकार ने सरकारी क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों को भी समेटना आरम्भ कर दिया। ऐसे में कृषि प्रधान क्षेत्रों में जहाँ एक और कृषि पर निर्भरता बढ़ी वहीँ दूसरी ओर बिजली की बढ़ती कीमतों ने कृषि की लागत को भी बढ़ाया। ऐसे में लगातार दो वर्षों से पड़ रहे अकाल ने किसानों के हालात बिगाड़ दिए थे। इसी बीच में नहर में कृषि के लिये निर्धारित जला पूर्ति में जबरदस्त कटौती कर दी गयी। ऐसे में इन नए मंडी क्षेत्रों में नए सपने लेकर आकर बसे किसानों की आर्थिक हालत बदतर हो गए। वो किसान जिन्होंने इन नए मंडी क्षेत्रों और यहाँ उपलब्ध सिंचाई संसाधनों पर भरोसा करते हुए  अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था अचानक ऐसी स्थिति में पहुँच गए थे जहाँ राज्य व्यवस्था ने अपने हाथ अचानक से वापस खींच लिए थे। नयी अर्थव्यवस्था पर आधारित जीवन शैली अब अचानक से ढ़हने लगी थी। ऐसे में यहाँ के किसानों के पास सिवाय संघर्ष के और कोई चारा ही नहीं बचा था। यही कारण था कि 25-30,000 किसान सरकारी नीतियों के खिलाफ पूरे इलाके में बग़ावत पर उतर आये। किसानों ने कुछ दिन तो आंदोलन शांतिपूर्ण रखा परन्तु सरकार के असंवेदनशील रवैये के कारण धीरे धीरे किसानों का धैर्य छूटने लगा। किसानों का ये गुस्सा स्थानीय प्रशासन पर फुट पड़ा। इसे ही आधार बनाकर राज्य सरकार ने किसान आंदोलन को कुचलने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया। उत्तर राजस्थान का ये किसान संघर्ष इतिहास के पन्नों में तो वस्तुतः वैसा स्थान नहीं बना पाया जैसा अन्य किसान संघर्ष बना पाए परन्तु घड़साना आंदोलन का ये वाक़या वास्तव में मंडियों के किसानी जीवन से रिश्ते से जुड़ा है। साथ ही ये दर्शाता है कि किस प्रकार राज्य की इस प्रकार के क्षेत्रों के विकास में अहम् भूमिका होती है।  

भारत में आज भू ऐसे क्षेत्रों की भरमार है जिन्हें राज्य सहायता की भरपूर आवश्यकता है। कोई निजी कंपनी वहां अपना निवेश नहीं करना चाहेगी।  वहीँ वहां के ग्रामीण विकास के लिए राज्य सहायता अपरिहार्य है। ऐसे में सरकार द्वारा लागू किये गए कृषि सम्बन्धी कानून उन सभी संवैधानिक, राजनैतिक और नैतिक कर्तव्यों से मुंह मोड़ लेने जैसा है जिन वायदों के आधार पर प्रत्येक भारतीय किसान भारत को एक लोकतान्त्रिक राज्य व्यवस्था के रूप में देखता है और उसमें विश्वास करता है। जब राज्य व्यवस्थाएं अपने वायदों से मुकरती हैं तो उसके केवल राजनैतिक और आर्थिक परिणाम होते हैं परन्तु साथ ही इसके दूरगामी मानसिक परिणाम भी होते हैं। ऐसे आंदोलन युवा नेतृत्व को भी जन्म देते हैं। घड़साना आंदोलन ने पवन दुग्गल जैसे युवा नेताओं को पैदा किया और वो आज भी किसानों के समर्थन में राजस्थानहरियाणा सीमा पर शाहजहांपुर सीमा पर बैठे हैं। अगर सरकार चाहती है कि किसानों के एक बड़े समुदाय का विश्वास उस पर बना रहे तो उसे  आंदोलन को संवेदनशील ढंग से समझना चाहिए की एक घाटेऔरलाभ के आर्थिक या वाणिज्यिक सौदे के रूप में। घड़साना जैसे किसान आंदोलनों से हमें सीखने की आवश्यकता है।