किसान मज़दूर संघर्ष के महानायक – तेजा सिंह सुतन्तर

सिमरनजीत कौर गिल

आज के किसान संघर्ष में जहाँ 1907 के ‘पगड़ी सँभाल जट्टा’ आंदोलन हमारे जीत के जज़्बे को बल दे रहा है वहीँ हमारे वो उन स्वत्रंत्रता सेनानी, जिन्हें हम आज के समय में बदल रहे इतिहास के चलते हौले हौले भुलाते जा रहे हैं, का जीवन आज भी हमारा पथ प्रदर्शन कर रहा है। इन्हीं महान नेताओँ में से एक थे सरदार तेजा सिंह सुतन्तर। आप वो महान किसान कामगार नेता थे जिन्होंने अपनी पूरी उमर संघर्ष के नाम कर दी। इन्होंने जहाँ गदर लहर के योद्धाओं के रहनुमाई में देश की सेवा की और ‘किरती किसान यूनियन’ के नेता बनकर किसान कामगार संघर्षों की अगवाई भी की। 

सुतन्तर जी का जन्म पँजाब के ज़िला गुरदासपुर के गाँव अलूणा में 16 जुलाई 1901 को भाई किरपाल सिंह जी के घर हुआ। उनका पहला नाम समुंद सिंह रखा गया था। स्कूली शिक्षा पूरी करके उन्होंने ख़ालसा कालेज अमृतसर में दाखिला लिया और 18 साल की उम्र तक सरदार अजीत सिंह के लैक्चरों से लेकर सूफ़ी अंबा प्रसाद और लाला हरदयाल के लेखों का गहन अध्ययन कर चुके थे। 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग़ के निर्मम कांड से आहत होकर वो ख़ालसा कॉलेज छोड़कर ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ विद्रोह में कूद पड़े। तब से लेकर आप देहांत तक ख़िलाफ़त आंदोलन से लेकर अकाली लहर और किरती किसान आंदोलन में आगे बढ़कर भाग लेते रहे।

तेजा सिंह सुतन्तर ने साल 1920 से 1925 तक गुरुद्वारा सुधार लहर में जी जान से काम किया। अपने पिता से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने इलाके में सिख भाईचारे का एक  स्वतंत्र (पंजाबी में सुतन्तर) जत्था तैयार किया जिसने 6 सितंबर 1921 को गुरदासपुर ज़िले के गाँव तेजा कलां,  वीला तेजा के गुरद्वारा को चरित्रहीन महंतों के कब्ज़े से स्वतंत्र करवाया। तब से इस स्वतन्त्र जत्थे के अगुआ बनकर तेजा के गुरद्वारा के नाम से समुंद सिंह का नाम तेजा सिंह सुतन्तर हो गया। 

एक धर्म प्रचारक होने से लेकर गदरी बाबाओं के साथ स्वतन्त्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाते हुए वो हमेशा एक किसान रहे और किसान मज़दूरों के हक की मशाल जलाए रखने वाले तेजा सिंह ‘लाल झंडा’ पत्र के संपादक भी रहे। स्वतन्त्रता संग्राम को जंगी अंदाज़ से लड़ना सीखने के लिए उन्होंने ‘आज़ाद बेग’ नाम से तुर्की की फौज में भर्ती होकर सैनिक सिखलाई भी ली। इसके साथ वो बर्लिन के रास्ते यूरोपी देशों की यात्रा करते हुए अमेरिका जा पहुँचे और वहाँ के भारतीयों को क्रांति के लिए एकजुट किया। फ़िर आपने दक्षिणी अमेरिका का रुख़ किया और मैक्सिको, क्यूबा, पनामा, अर्जेंटीना, उरुग्वे और ब्राज़ील गए जहाँ इन्हें किसान महानायक सरदार अजीत सिंह (शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत) के संग में और परिपक्व हुए। फ़िर आप अमेरिका में किरती किसान सभा के हैडक्वार्टर होते हुए आप भारत में सभा के दिशा निर्देशों को संघर्ष में तब्दील करने के लिए पंजाब लौट आए। जनजागृति के लिए आप शिक्षा को बहुत प्रचारित करते थे और उसके लिए उन्होंने जनसामान्य के सहयोग से पातड़ां में ‘किरती कॉलेज’ कीं नीँव रखी जो आज के पंजाब के पटियाला ज़िला में स्थित है। उनके देहांत के बाद राज्य सरकार ने यह कॉलेज अपने अधिकार में ले लिया। 

आप लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिन्द यूनियन के राष्ट्रीय कमेटी मेंबर और जनरल सेक्रेटरी भी रहे और भारतीय कम्युनिस्ट  पार्टी के संस्थापक मैंबर बने। 1937-45 तक पंजाब लेजिस्लेटिव असेंबली और 1964-69 तक पंजाब लेजिस्लेटिव काउंसिल में रहे सुतन्तर 1971 में आप पँजाब के संगरूर संसदीय क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के सांसद बनकर भारतीय संसद में किसान मज़दूर की आवाज़ बनकर दाखिल हुए। 12 अप्रैल 1973 को 72 वर्ष की उम्र में संसद में किसान हितों पर बहुत भावुकता से बोलते हुए उन्हें दिल का दौरा आया जिससे उनका देहांत हो गया। 

किसान मज़दूर संघर्षों के महानायकों में से एक तेजा सिंह सुतन्तर जी के शरीर की मृत्यु को चाहे आधी शताब्दी होने को है लेकिन किसान मज़दूर का नारा बुलंद करती उनकी आवाज़ 2020 की किसान क्रांति में भी गूँज रही है और आगे भी गूंजती रहेगी। हमारे ऐसे बेमिसाल जननायक को हमारा प्रणाम है।