किसान आंदोलन : कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कृषि कानूनों का वाजिब हल सुझाया।

रोहित कुमार , वायर

इस साक्षात्कार में हमने आन्दोलन के पीछे की कहानी और इस किसान आन्दोलन से जुड़े पांच बेहद आम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की है।

किसान केंद्र सरकार से इतना नाराज क्यों है

बहुत सारे लोगों का ये मानना  है कि तीन नए कृषि कानूनों के कारण किसान समुदाय गुस्से में है और इसलिए वे दिल्ली के  दरवाजे पर दस्तक दे रहे है। पर मैं इसे इस रूप में देखता हूँ कि यह गुस्सा कई दशकों से जमा होने के बाद आज आखिर में जोरों से सामने फुट रही है। अलगअलग तीन अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 30 या 40 सालों में  किस प्रकार खेती को बहुत सारे अन्याय और गैरबराबरी का सामना करना पड़ा है और उसके अधिकारों से वंचित रहना पड़ा है। 

किसी दिन एक बिज़नेस चैनल पर मेरा साक्षात्कार हुआ। आयोजक ने मेरे से  एक सवाल पूछा किजब मार्केट नए कृषि कानूनों को लेकर इतना उत्साहित है तो किसान नाखुश क्यों है ? “मैंने कहा – “आपने सवाल का जवाब खुद दे दिया है। ये कानून मार्केट के पक्ष में है। इसलिये वे खुश है। किसानों को लग रहा है कि ये कानून उनके पक्ष में नहीं है। इसलिए वे नाखुश है और इसलिये वे सड़क पर उतरे हुए है।

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन का एक अध्ययन यह बतलाता है कि किसानों की आमदनी सन 2000 . में भी उतनी ही है जितनी की सन 1980 .में किसानों की आमदनी थी। हालांकि अमीर देशों ने प्रत्यक्ष आय की मदद और कई सारी सुविधाएं देकर किसानों की इस समस्या का समाधान करने की कोशश की। जबकि विकासशील गरीब देश ऐसा करने में असमर्थ थे ,जिसके कारण तब से उन देशों के किसानों को इसका दुष्परिणाम चुपचाप उठाना पड़ा। 

सन 2008 में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन दिल्ली के एक थिंक टैंक संस्थान द्वारा साथ किये गए एक अध्ययन से यह बात पता चलता है कि सन 2010 से 2016-17 के दौरान किसानों की कृषि आय में 45 लाख करोड़ का भारी नुकसान हुआ है। इसका मतलब यह है कि किसानों को प्रति वर्ष 2.64 लाख करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा। 

सन 2016 आर्थिक सर्वेक्षण द्वारा किये गए एक और अध्ययन से यह पता चलता है कि देश के 17 राज्यों में अर्थात देश की  लगभग आधी आबादी के किसान परिवारों की औसत आय प्रतिवर्ष 20,000 रुपये है। इसका मतलब साफ है कि उनका हरेक महीने की आमदनी 1700 रुपये से भी कम है।

पर क्या आपको नहीं लगता है कि यह आंदोलन मूल रूप से केवल पंजाब के अमीर किसान के द्वारा किया जा रहा है

अगर पंजाब के किसान इतने अमीर थे, तो उन्हें देश भर के लिए एक मॉडल के रुप में लिया जाना चाहिए था। पर पंजाब कृषि विश्वविद्यालयलुधियाना , पंजाब यूनिवर्सिटीपटियाला और  गुरु नानक देव यूनिवर्सिटीअमृतसर तीनों सरकारी विश्वविद्यालयों द्वारा किये गए साझा अध्ययन में यह बात सामने निकल कर आयी कि सन 2000 और सन 2015 के बीच 16,600 खेतिहर किसान और मजदूरों  ने आत्महत्या की है। दुर्भाग्यवश ,पंजाब के खेतिहर परिवारों के ऊपर 1 लाख करोड़ से ज्यादा कर्ज का बोझ उनके बोझिल कंधो पर है। 

अगर किसान अमीर थे,तो वे इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या क्यों किये?आप किसी भी पंजाबी अखबार उठाकर देख लीजिये, बहुत संभावना है कि हर दिन आपको एक या दो आत्महत्या की खबर जरूर मिल जाएगी। एक बात यह और है कि पंजाब में हर तीसरा किसान गरीबी रेखा से नीचे है। हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि देश मे केवल 4 % किसानों के पास ही 10 एकड़ से ज्यादा जमीन की जोत है ! तो हम किन अमीर किसानों की बात कर रहे है, जब केवल 4 % किसानों के पास ही 10 एकड़ से ज्यादा जमीन है ! भारत में 86% किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन की जोत है। बाकी बचे हुए किसान मध्यम श्रेणी किसान है जिनके पास जमीन की जोत 6 से 8 एकड़ के बीच है। 

यह कहना बिल्कुल ही हास्यास्पद है कि प्रदर्शन को अमीर किसान नेतृत्व कर रहे है।  पंजाब में लगभग 70% किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिलता है। छोटे किसान जिनके पास 5 एकड़ से कम जमीन है , इन्ही छोटे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से लाभ का बड़ा हिस्सा मिलता है। और जो भी लोग किसानों के प्रति दुर्भावना के कारण  यह लग रहा है कि यह प्रदर्शन विपक्षी पार्टी द्वारा भड़काया गया। उनसे मैं इतना बोलना चाहता हूँ कि आप बाहर निकलिये और इस सर्द जाड़े की रात में एक रात बिताकर देखिए

क्या आपको नहीं लगता है कि बहुत सारे किसान यूनियन इन कानूनों के समर्थन में है

यदि किसान इन कानूनों के पक्ष होता तो किसान प्रदर्शन में इतनी भीड़ नहीं होती ! बल्कि यह काफी उम्दा बात है कि कई सारे किसान यूनियन एक साथ एक मंच पर है। एक ऐसे व्यक्ति के बतौर जो 20 सालों तक किसानों के साथ काम किया होमैं जानता हूँ  कि सारे किसान यूनियन को एक साथ लाकर खड़ा कर देना कितना मुश्किल काम है? बावजूद इसके अभी तक 32 किसान यूनियन के नेतागण जो पंजाब , हरियाणा , राजस्थान पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से एक साथ आये है। यह एकजुटता बतलाता है कि परिस्थिति कितनी भयावह है कि सारे लोग सारे मनमुटाव को छोड़कर एक साथ अपने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए साथ आये है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात याद रखना जरूरी है कि वास्तव में किसानों का बहुत बड़ा समूह मजबूत विरोध के खातिर एक साथ बाहर निकले है। 

कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट का आना इतना खराब क्यों माना जाए

पूरी दुनिया कॉरपोरेट खेती की ओर जा रही है, पर सच्चाई यह है कि कॉरपोरेट कंपनियों की सहभागिता ने किसानों की आय को नहीं बढ़ाया है। उदाहरण के लिए आप अमेरिका की बात करते है , जहाँ से नकल करके कृषि कानूनों को लाया गया है। पिछले 60 से 70 सालों से खुला मार्केट और मुक्त व्यापार है और वहां बावजूद इसके  कृषि आमदनी  साल दर साल घटती जा रही है। वर्ष 2020 में अमेरिकी किसानों को 425 बिलियन डॉलर से अधिक दिवालियापन से घाटा हुआ। 

साल दर साल , लघु कृषि अमेरिका से गायब हो चुकी है। अब अमेरिका की  केवल 1.5% जनसंख्या ही कृषि से जुड़े है। बावजूद इसके अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा कृषि उत्पादक है। ( वास्तव में जब हम अमेरिका में कृषि का मतलब बड़े मशीन, बड़े कॉरपोरेट, बड़े व्यवसाय  और बड़े खेत से है। वही जब हम भारत मे कृषि का बात करते है तो  असल मे इसका मतलब करोड़ो गरीब और छोटे किसान से है।

अमेरिका में किसानों को 62,000 डॉलर की सब्सिडी प्रति वर्ष दिया जाता है। अब यह सवाल उठता है कि अगर  खुला बाजार इतना अच्छा और प्रभावी है तो वहां की सरकार इतना धन का निवेश कृषि क्षेत्र में क्यों करती है।

हमें यह बात  स्पष्ट होना चाहिए की अमीर और विकसित देशों में अगर कृषि लाभकारी है तो यह  बाजार की कार्य कुशलता और  कार्यक्षमता के कारण नहीं है बल्कि सरकार के द्वारा प्रत्येक साल दिए जाने वाले सब्सिडी के कारण ऐसा संभव हुआ है। 

करीबन गेंहू किसान की आय का 38% और चावल की खेती करने वाले किसानों की आय का 32 % वास्तव में सब्सिडी से आता है। किसानों की अधिक उपज नहीं  बल्कि  सब्सिडी किसानों को ऊंची आय देता है।

किसानों को प्रत्यक्ष आय सहयोग राशि की जरूरत हैयूरोप में प्रत्यक्ष आय  सहयोग के रूप में सब्सिडी की  50 ₹ राशि  मिलती है। अमेरिका 62,000 डॉलर की सब्सिडी सहयोग औसतन हर साल सारे किसानों को देता है। मेरे अनुसार बाजार कृषि की जीविका नहीं चला रही है। यह मुख्यतः सब्सिडी ही है जो आज के समय में बची खुची कृषि का जीविका चला  रही है।

इस समस्या का समाधान आगे आप किस रूप में देखते है ? खेती को किस प्रकार बचाया जाए और इसे किस प्रकार  पुनर्जीवित किया जाए

सबसे पहले आप के जैसे मुझे भी निर्धारित आमदनी चाहिए , प्रत्येक किसानों को भी अपनी उपज का निर्धारित मूल्य चाहिए।  उसे अपने उपज की पैदावार के बाद यह निश्चिंतता हो कि जब वह मंडी में जायेगा तो उसे कम से कम एक निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा। अगर मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी हो सकती है। तो मुझे समझ नही आता है कि किसानों के लिए न्यूनतम मूल्य की व्यवस्था क्यों नही हो सकती है।  मैं यह सलाह देना चाहूंगा कि सरकार 23 फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनों रूप से बाध्य बनाये, जिसकी घोषणा सरकार हर साल करती है। पर  सरकारें चावल और गेहूं की ही ख़रीदारी सही से करती है। आज जरूरत है कि यह एमएसपी सभी फसलों पर लागू हो। 

वायर में किये गए एक विश्लेषण के अनुसार साल 2020 के अक्टूबर और नवंबर दो महीनों , किसानों को 1900 करोड़ का फायदा होता। मैं जानता हूं आप भी मानते होंगे कि यह एक बहुत ही छोटी धनराशि है। आज की परिपेक्ष्य में जहाँ में देश किसानों की 50 % आबादी की वार्षिक आय 20 हजार से भी कम है। हम कल्पना कर सकते है  किसानों को कितनी ज्यादा आर्थिक मदद मिलती , क्योंकि इन 23 फसलों के अंतर्गत देश की लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र आती है। इसका मतलब यह है कि खेतिहर किसानों की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत आते है , यदि  एमएसपी को सही से लागू किया जाय और इसे कानूनी अमलीजामा पहना जाय। यह किसानों के लिए असली आज़ादी साबित होगी। किसानों को पता होगा कि वह चाहे वह फसल पंजाब में बेचे या फिर बिहार में बेचे , उसे पता होगा की उसे एक ही न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी जगह मिलेगा। इस प्रकार की आजादी किसान उम्मीद कर रहे है।

कॉरपोरेट घरानों के कहना है कि अब वे किसानों को उनकी उपज का ज्यादा मूल्य  दे सकते है! अगर कॉरपोरेट घराने यह कह रहे है कि वे और अधिक मूल्य की भुगतान करने को तैयार है, तो  एमएसपी  रखने में क्या दिक्कत है

दूसरी बात है कि  न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की अपनी चुनातियां है। इस देश मे अभी हमारे पास 7000 कृषि उपज प्रबंधन समिति से जुड़े बिक्री मंडी है। हमारे देश मे 42,000 हजार मंडियों की जरूरत है। हर 5 किलोमीटर के अंदर एक मंडी होनी चाहिये। हमे एक ऐसी ही आधारभूत संरचना तैयार  करनी है, जहाँ किसान आसानी से अपनी फसल की उपज बेच सके। अगर आपके पास अच्छे मंडियों का एक जाल बिछा हो , तो न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने का तंत्र खुद ही बहुत आसान हो जाता है। 

इतने वर्षों के  मुक्त बाजार के बाद , बअमेरिका का कृषि डिपार्टमेंट हमे बोल रहा है कि खाने पर खर्च किये जाने वाले एक रुपये में अभी किसानों के हिस्से में मात्र 8 पैसे ही है। इसका मतलब यह है कि अगर हम कोई खाना खरीदते है और उसके लिए एक रुपये का भुगतान करते है तो किसानों को एक रुपये में केवल 8 पैसे ही मिल पाते है। यह हमें साफसाफ बतलाता है कि क्यों अमेरिका के किसान आज बेहद संकट में है। अब हम इसकी तुलना  भारत में अमूल डेयरी कोऑपरेटिव से करते है। अमूल डेयरी के प्रबंधन निर्देशक ने खुद बोला है कि अगर आप 100 रुपये का अमूल दूध खरीदते है तो 70 रुपये किसानों के हिस्से में जाता है। इसका मतलब यह कि किसानों का 70 ₹ हिस्सा अपना है। इसलिये क्यों हम अमूल दूध का मॉडल से सीख लेते हुए इसका ही मॉडल को सब्जियों , दलहनों , फलों आदि में लागू करे। 

अंतिम में एक बात कहना चाहूंगा कि हमारे देश अर्थतंत्र की संरचना इस प्रकार की है कि जिसमें कृषि को हमेशा समाज पर एक बोझ के तौर पर देखा गया है।उसके पीछे यह धारणा  होती है कि जब तक हम लोगों को खेती से निकाल कर शहरी क्षेत्र में नहीं लाते है , तब तक हमारा आर्थिक विकास नहीं हो सकता है। यह धारणा को बदलने की जरूरत है। हमने दो दिन को लॉकडाउन में देख लिया है कि किस प्रकार 8 करोड़ लोग वापसी पलायन करते हुए अपने अपने राज्य को लौटे और किस प्रकार काम की जुगाड़ फिर दूसरे राज्यों में भी  गए। यह पलायन बतलाता है कि आर्थिक विकास का यह मॉडल कितना असफल और असक्षम है। मुझे लगता है इस आर्थिक मॉडल को उलटा करने की जरूरत है। आज कृषि को  आर्थिक विकास का पावर हाउस बनाने की संभावना की सख्त जरूरत है।