अखिल भारतीय किसान सभा

मुकेश कुलरिया

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 11 अप्रैल 1936 में स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा की गई और इसके सचिव एन. जी. रंगा रहे। अपने स्थापना की पहली कांफ्रेंस में जवाहरलाल नेहरु, सुन्दरैया और .एम्.एस. नाम्बूदारिपाद किसान सभा का हिस्सा थे। उस समय यह किसानों का एक वृहद मंच था. तेलंगाना में (1946-53) ज़मींदारों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन में किसान सभा का महत्वपूर्ण रोल रहा है। साथ ही वरली के आदिवासी संघर्ष के नेतृत्व करने वाली गोदावरी पर्वेलकर किसान सभा से जुडी थी। असम की सुरमा घाटी और केरल में तीसरेंचौथे दशक में हुए आन्दोलनों, जिसमें मुख्यता: पुन्नापरा वायलार संघर्ष है, में भी किसान सभा की भूमिका अग्रणी रही है। यह देश की सबसे बड़े किसान संगठनों में से एक है। वर्तमान में इसके सदस्यों की संख्या 1.5 करोड़ है जो की देश के 23 राज्यों के साथसाथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और पुद्दुचेरी में है। आधिकारिक रूप से अखिल भारतीय किसान सभा किसी से सम्बद्ध नहीं है। सांगठनिक तौर पर सभी राज्यों में इनकी राज्य इकाई है। इसके साथसाथ इनसे सम्बद्ध गन्ना किसान संगठन और आदिवासी संगठन भी है। कॉमरेड हन्नान मोल्ला इसके राष्ट्रीय सचिव है तथा कॉमरेड अशोक धावले राष्ट्रीय अध्यक्ष है। 

स्थापना के समय किसान सभा का उद्देश्य सामंती और औपनिवेशिक ताकतों से लड़ना था और इसके सदस्यों में अधिकतर छोटे और भूमिहीन किसान शामिल थे। कुछ संख्या में बड़े किसान भी संगठन का हिस्सा है. त्रिपुरा और महाराष्ट्र में tenant किसान, भूमिहीन किसान और आदिवासियों का बड़ा हिस्सा संगठन के साथ जुडा हुआ है. इसके अलावा अलगअलग धानों के आधार पर सबकमिटी बनाई गई है जैसे गन्ना किसानों, और त्रिपुरा में आदिवासी कमेटियों का गठन किया गया है। किसान सभा की शुरुआत से मांग रही है की ज़मीन उसकी, जो खेती करे।

2017 में नाशिक से मुंबई किसानों के लॉन्ग मार्च ने देश में किसानों के प्रति हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एक बुलंद आवाज़ उठाई जिससे खेतीकिसानी का मुद्दा सिर्फ राजनैतिक हलकों में बल्कि आम जनता के सामने भी आया। इस आन्दोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय किसान सभा ने किया और इसी के चलते देश में किसान आन्दोलनों की शुरुआत हुई जो कि आगे चलकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडू और अब देशव्यापी आन्दोलन के रूप में सामने आई है।  आन्दोलन की ज़मीन तैयार करने के मामले पर किसान सभा के संयुक्त सचिव कॉमरेड विजू कृष्णन कहते है, ”हम 2014 से लगातार इस समझदारी से काम कर रहे है कि बिना आपसी समन्वय और नई तरीकों के आप ना तो बड़े मंच का निर्माण कर सकते हैं और ना की किसी बड़े आन्दोलन की नींव रख सकते है। ये आन्दोलन सिर्फ तीन कृषि कानूनों के खिलाफ ही नहीं है। एक लम्बे समय से चले रहे कृषि संकट से उकताये हुए किसानों की अंतिम उम्मीद ही है कि, “जीतेंगे या मरेंगेजैसे नारे उभर कर आये. इसलिए अब सरकार को एक नवउदारवादी नीति के बदले वैकल्पिक कृषि नीति का निर्माण करना होगा।” 

आगे के रोडमैप के बारे में कृष्णन कहते है, “सरकार को सब्सिडी देनी होगी। साथ ही खेती में लगें वाली लागत के लिए सहयोग करना होगा। खेती में लगने वाले यंत्रोसामानों की कीमतों के नियंत्रण सरकार को अपने हाथ में रखना होगा। क्योंकि निजी कम्पनियां सिर्फ अपने फायदे को केंद्र में रखती है। इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और लागत में सहयोग के बल पर ही कृषि संकट से निपटा जा सकता है।भुगतान भी उपज खरीद के समय पर तुरंत हो। इसके अलावा फसल बेचने के दौरान होने वाले सरप्लस में भी किसान का लाभांश सुनिश्चित होना चाहिए। खेती को आर्थिक रूप से लाभदायक बनाकर ही हम खेतीं और किसान दोनों को बचा सकते है।

नियंत्रण सरकार को अपने हाथ में रखना होगा. क्योंकि निजी कम्पनियां सिर्फ अपने फायदे को केंद्र में रखती है. इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और लागत में सहयोग के बल पर ही कृषि संकट से निपटा जा सकता है. लागत को नियंत्रित करना और समर्थन मूल्य में समयसमय पर के बाद ही आप किसानी को आजीविका लायक पेशा बना सकते है. भुगतान भी उपज खरीद के समय पर तुरंत हो. इसके अलावा फसल बेचने के दौरान होने वाले सरप्लस में भी किसान का लाभांश सुनिश्चित होना चाहिए. खेती को आर्थिक रूप से लाभदायक बनाकर ही हम खेतीं और किसान दोनों को बचा सकते है. और आखिर में, इस बड़े संकट में निकलने के लिए सभी संगठनो को पारस्परिक सम्मान के साथ समन्वित रूप से काम करना होगा.”