अंधेरे में

गजानन माधव मुक्तिबोध

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे

उठाने ही होंगे।

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार

तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें

जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता

अरुण कमल एक

ले जाने उसको धँसना ही होगा

झील के हिम-शीत सुनील जल में

चाँद उग गया है

गलियों की आकाशी लम्बी-सी चीर में

तिरछी है किरनों की मार

उस नीम पर

जिसके कि नीचे

मिट्टी के गोल चबूतरे पर, नीली

चाँदनी में कोई दिया सुनहला

जलता है मानो कि स्वप्न ही साक्षात्

अदृश्य साकार।