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भारतीय नवजागरण का संदर्भ और मौजूदा किसान आंदोलन

हमारे देश की सबसे बड़ी आबादी खेती पर आश्रित है और हमारे इतिहास में किसान आंदोलनों की लंबी विरासत रही है। देश के भीतर किसानों की हालत चाहे जितनी दयनीय हो, कृषि क्षेत्र लूटेरी ताकतों के लिए हमेशा से एक दुधारू पशु की तरह रहा है। जब-जब इन लूटेरी शक्तियों का सत्ता और शासन-व्यवस्था पर पकड़ मजबूत हुई है

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नागरिकता क़ानून और शाहीन बाग आंदोलन: एक साल

2014 में 31% एवं 2019 में 37.36% वोट हासिल करने वाली बीजेपी सरकार भारत के  नागरिकता क़ानून को बदलकर 10 दिसंबर 2019  को, नया नागरिकता (सांसोधन) अधिनियम  लागू किया। 11 दिसंबर 2019 को भारत के राष्ट्रपति ने अधिनियम को हरी झंडी दिखा दी। इस अधिनियम में, 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफ़ग़ानिस्तान से आए

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उड़ीसा से दिल्ली: एक दुस्साहसिक-दुर्गम यात्रा!

दिल्ली की सीमाओं पर करीब दो महीने से जारी और केंद्र की आँख की किरकिरी बने अभूतपूर्व किसान आन्दोलन की ओर देश की नजरें टिकी हुई हैं। आन्दोलन को बदनाम करने के प्रयासों के बीच सत्ता पक्ष के लोग और सरकार समर्थक यह भी पूछ रहे हैं कि सम्बद्ध कृषि कानूनों से सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसानों को कष्ट क्यों है?

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घड़साना आंदोलन: एक भूला हुआ किसान संघर्ष

राजधानी दिल्ली के चारों और जारी किसान आंदोलन भारत में लोकतंत्र के समसामयिक इतिहास के सबसे प्रमुख घटनाओं में से एक है। ये प्रदर्शन न केवल देश में किसान, गॉंव और कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े सवाल हैं अपितु देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण और उसे जीवित रखने में देश की ग्रामीण-कृषि आधारित जनसंख्या की प्रमुख भूमिका को भी दिखाते हैं।

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राजनैतिक होना छात्र की ज़िम्मेदारी है

“इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान (विद्यार्थी) राजनीतिक या पॉलिटिकल कामों में हिस्सा न लें….” “हम यह मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?

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राष्ट्रगीत

राष्ट्रगीत में भला कौन वह

भारत-भाग्य-विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन हरचरना गाता है.

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किसान आंदोलन : कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कृषि कानूनों का वाजिब हल सुझाया।

इस साक्षात्कार में हमने आन्दोलन के पीछे की कहानी और इस किसान आन्दोलन से जुड़े पांच बेहद आम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की है।

किसान केंद्र सरकार से इतना नाराज क्यों है ? 

बहुत सारे लोगों का ये मानना  है कि तीन नए कृषि कानूनों के कारण किसान समुदाय गुस्से में है और इसलिए वे दिल्ली के  दरवाजे पर दस्तक दे रहे है।

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किसान मज़दूर संघर्ष के महानायक – तेजा सिंह सुतन्तर

आज के किसान संघर्ष में जहाँ 1907 के ‘पगड़ी सँभाल जट्टा’ आंदोलन हमारे जीत के जज़्बे को बल दे रहा है वहीँ हमारे वो उन स्वत्रंत्रता सेनानी, जिन्हें हम आज के समय में बदल रहे इतिहास के चलते हौले हौले भुलाते जा रहे हैं, का जीवन आज भी हमारा पथ प्रदर्शन कर रहा है।

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ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ।

अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के ।

कह रही है झोपडी औ’ पूछते हैं खेत भी,

कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के ।

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कृषि क्षेत्र की पहली जरूरत सुदृढ़ ‘कोल्ड चेन’

सरदार पटेल के कहने पर ही गुजरात में किसानों ने को-ऑपरेटिव संगठन बनाकर दुग्ध विपणन का कार्य अपने हाथ में ले लिया था। कुछ साक्षात्कारों में प्रोफेसर अशोक गुलाटी (कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष) ने फसल की विविधता और कम होते जल स्तर पर काफी गंभीर विचार व्यक्त किए हैं।

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