Author: Virendra Bhatia

मुक्ति घर के मुर्दे

“कौन सा नंबर है तुम्हारा?” एक मुर्दे ने पास पड़े मुर्दे से पूछा।

“मालूम नहीं”, दूसरे ने बेतकल्लुफ जवाब दिया।

“कौन से नम्बर का दाह हो रहा है?”

“अरे मालूम नहीं, बोला न! तुम्हें क्या जल्दी पड़ी है दाह संस्कार की? ज़िंदा था तब राशन, टिकट, बैंक की लाइन में घँटों खड़ा रह लेता था।

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