लम्बी है ग़म की रात मगर……..

नाइट शिफ्ट शुरू होने वाली थी। तंबूओं में रहने वाले, एक व्यस्त दिन के बाद आराम करने की तैयारी कर रहे थे। व्यस्त राजमार्ग पर पास के गैस फिलिंग स्टेशन की चमकदार रोशनी में सड़क के उस पार से तंबूओं में रहने वाले लोगों की दिनचर्या दिखाई दे रही थी। स्ट्रीट लाइट में धातु से बने रसोई के बर्तन चमक रहे थे। उन्हें धोया गया था और अगले दिन के लिए एक साफ जगह पर पंक्ति में सजा कर रखा गया था। तंबू के सामने दो खाटें रखी हुई थीं, जिनमें से एक पहले से ही भरी हुई लग रही थी। कोई आराम कर रहा था शायद। चेहरा पूरी तरह से कंबल से ढका हुआ था, जिससे पास से गुजरने वाले वाहनों से निकलने वाले घने धुएं के साथ-साथ बारिश के पानी में तेजी से पनप रहे मच्छरों से भी बचा जा सके। हाईवे के ट्रैफिक के भारी शोर के बीच वह चैन की नींद सो रहा था, यहां तक कि दूसरे तंबुओं में हो रही हलचल से भी बेखबर। दूसरे बिस्तर वाले बुजुर्ग व्यक्ति को अपना कंबल नहीं मिल रहा था, शायद कहीं खो गया था। वह कंबल के बिना आराम नहीं कर सकता, उसने जोर से कहा। रात में ठंड बढ़ गई। यह बात पास के तंबू में पहुँचते ही एक छोटा समूह तेजी से इकट्ठा हो गया। कोई चादर लाया, तो कोई शॉल लेकर आया, जिन्हें साथ में समेट कर ओढ़ने के लिए एक कंबल की शकल दी गई। ऐसा लग रहा था कि कम से कम उस रात के लिए एक समाधान मिल गया है।

हाईवे से जुड़ी यह छोटी सी याद अब सार्वजनिक स्मृति में किसान आंदोलन के रूप में पंजीकृत है। यह एक साल से अधिक समय तक चलने वाले आंदोलन के रोज़मर्रा के साधारण पहलुओं को दिखाती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आंदोलन की मुख्य ताकत को सतह पर लाती है: दिल्ली की सीमाओं पर लोगों की भौतिक उपस्थिति, निर्बाध और लगातार।

आंदोलनों की लोकप्रिय कल्पना कभी भी इस तरह से नहीं की जाती। जन आंदोलनों के बारे में सोचना आमतौर पर करिश्माई नेताओं की भीड़ और उनके कारण जुटीं भीड़ के बारे में सोचना है। यां शहर के चौराहों पर हो रही गतिविधिओं, इंटरव्यूज लेने के लिए उतावले न्यूज़ कर्मचारी और ध्यान आकर्षित करने वाली शानदार घटनाओं के बारे में सोचना है। लेकिन क्या होता है जब शिकायतें यां मुद्दे लंबे समय तक अनसुलझे रहते हैं और आंदोलन दिनों, महीनों और यहां तक कि वर्षों तक चलता रहता है? क्या होता है जब भीड़ दैनिक जीवन के कामों में भाग लेने के लिए तितर-बितर होने लगती है? सीधे शब्दों में कहें तो वह क्या है जो बदलते मौसमों के बीच, ठंड सर्द रातों और ग्रीष्मकाल के दौरान, अच्छे-बुरे समय में भी एक आंदोलन को लंबे समय तक जारी रखता है?

ऐसा होना तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब यह दिनचर्या बन जाता है। उपस्थिति की राजनीति का यह रूप शायद ही कभी ध्यान आकर्षित करता हो क्योंकि इसमें विशेष रूप से असाधारण कुछ भी नहीं होता। आखिरकार, इसमें कोई उत्साहजनक भाषण, रैलियां या संगीत कार्यक्रम नहीं हैं, जिस तरह की घटनाएँ राजनीति को समाचार के योग्य बनाती हैं। खाना पकाने, सफाई करने, बातें करने या बस समय गुजारने के रोज़मर्रा के काम बहुत साधारण सी बातें हैं, यहाँ तक कि नीरस भी। फिर भी यह नियमित संरचना ही प्रतिस्पर्धा को टिका हुआ बनाती है: स्थानिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से टिकाऊ।

इन जगहों पर रहने वाले बहुत से लोगों ने जब पहली बार अपने तंबू स्थापित किए, तब से घर नहीं लौटे। यह श्रम का एक प्रकार का अंतर-पीढ़ीगत विभाजन है – जिसमें बूढ़े लोग आंदोलन स्थल पर हैं; युवा खेतों में और घर पर अपने बच्चों की देखभाल करते रहे हैं। जो आंदोलन में हैं वे पारिवारिक आयोजनों, जीवन और मृत्यु से जुड़े सुख या दुख के समाचारों से चूक गए हैं – कुछ इस बीच दादा-दादी बन गए और अभी तक अपने नए जन्मे पोते-पोतियों को नहीं देख पाए हैं। कई लोगों ने परिवार के सदस्यों को खो दिया है और इस नुकसान का शोक तक नहीं मना पाए हैं। यदि आप अपने आस-पास पूछें, तो इन जगहों पर रुके रहने की क्रिया को सरलता से एक प्रकार की सेवा के रूप में समझाया गया है, स्वैच्छिक श्रम अपने बच्चों और पोते-पोतियों के भविष्य की रक्षा के लिए। अक्सर कहा जाता है कि जो पहले से ही एक पूरा जीवन जी चुके हैं उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। इसलिए वे अडिग रहते हैं, तब तक मोर्चा सँभालते हैं जब तक कि दूसरे इसे संभाल नहीं लेते।

आंदोलन स्थल पर तंबू धीरज का एक प्रतीक बन गए हैं। उनकी बनावट का विकास जारी है – शुरुआती सर्दियों में प्लास्टिक की तरपालों से बने घरों से लेकर भीषण गर्मी में बांस के आश्रयों तक। फिर भी इन आवासों का प्रतीकात्मक कार्य वही रहता है: राजनीति के क्षेत्र में दिखाई देना। पिछले एक साल में सामने आए ये विरोध के शहर कई किलोमीटर तक फैले हुए हैं, जो विभिन्न आकारों में व्यस्त राजमार्गों के किनारे खड़े हैं। तंबुओं को अक्सर रंगीन पोस्टरों, झंडों और बैनरों से सजाया जाता है जो आंदोलन को बनाये रखने वाले ग्रामीण समुदायों, किसानों और श्रमिक संगठनों की पहचान करवाते हैं। आंदोलन में आने वाले लोग तंबुओं पर लिखे प्रेरणादायक नारे, चित्र, यहां तक कि इनमें रहने वालों के मोबाइल फोन नंबर भी देख सकते हैं। इस सब से जो दृश्य उभरता है वह गांवों और छोटे शहरों के नामों से युक्त एक चलता फिरता परिदृश्य है, जो ग्रामीण भारत और उसमें हो रही उथल-पुथल का प्रतिनिधित्व करता है, यह सभ एक व्यस्त राजमार्ग पर मंचित होता है।

इस बीच, तंबुओं में अशांति का क्षण बीत चुका था। पड़ोसी अपने तंबू में लौट आए थे। दूसरा पलंग भरा हुआ लग रहा था, जुगाड़ से बना कंबल उसके ऊपर लिपटा हुआ था। एक लंबा रतजगा शुरू हो चुका था।