दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसानों को एक शिक्षक की श्रद्धांजलि

मैं एक शिक्षक हूं। मैं पिछले 25 वर्षों से हाई स्कूल के छात्रों को पढ़ा रहा हूं। क्योंकि मैं युवाओं के साथ इतना काम करता हूं, शायद इसलिए कि मैं उनके भविष्य के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूं, और उस देश के बारे में गहराई से चिंतित हूं जिसमें वे बड़े हो रहे हैं। शायद इसलिए भी, मैं एक अंशकालिक पत्रकार भी हूं और लोकतंत्र, समानता और न्याय जैसे मुद्दों के बारे में लिखता हूँ क्योंकि मेरा मानना ​​है कि इन तीन चीज़ों के बिना कोई भी देश समृद्धि और प्रगति नहीं प्राप्त कर सकता।

लेकिन पिछले सात वर्षों में हमारे लोकतंत्र पर लगातार हमला किया गया है, हमारे समाज में असमानता राक्षसी रूप से बढ़ी है और हमें न्याय देने के लिए जो संस्थान स्थापित किए गए थे, उन्हें बुरी तरह से नष्ट कर दिया गया है। पिछले साढ़े सात सालों में मेरे मन में एक ही सवाल बढ़ता गया है- हमारे देश को तबाह करने पर तुली हुई फासीवादी ताकतों को कौन रोकेगा?

कई लोगों ने कोशिश की है और कोशिश करना जारी रखा है, और हालांकि उनके प्रयास सराहनीय रहे हैं, उनकी सफलता थोड़े समय की ही रही है। उदाहरण के लिए, सीएए-एनआरसी के प्रति विरोध, आशा और प्रतिरोध की एक किरण थी, किंतु कोविड -19 ने नई दिल्ली में शाहीन बाग और अन्य विरोध स्थलों को बंद कर दिया। जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया और अन्य विश्वविद्यालयों द्वारा विरोध का भी क्रूरता से दमन किया गया है। सच्चाई बताने वाले बहादुर पत्रकारों पर हमला किया गया है, उन्हें गिरफ्तार किया गया है और यहां तक ​​कि वे मारे भी गए हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी फासीवादी रथ को भारतीय लोकतंत्र को तबाह करने से कोई नहीं रोक पाया है।

लेकिन 26 नवंबर, 2020 को सब कुछ बदल गया। तीन कठोर कृषि कानूनों के विरोध में सैकड़ों हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर आ गए। उन पर आंसू गैस के गोले दागे गए, जल तोपों का इस्तेमाल किया गया, उन्हें पीटा गया और दिल्ली में प्रवेश करने से रोका गया। लेकिन हार मानने और घर जाने के बजाय, उन्होंने सिंघू, टिकरी, शाहजहांपुर और गाजीपुर सीमाओं पर डेरा डाल दिया और वहीं रुक गए। सरकार और उसकी दास मीडिया ने उन्हें तोड़ने की कोशिश करने के लिए जो कुछ भी किया, उसके बावजूद किसान मज़बूती से खड़े हैं, और उनके आगमन के लगभग एक साल बाद, नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा के साथ एक बड़ी जीत हासिल की है।

यह संभवत: उनके राजनीतिक जीवन में पहली बार है जब मोदी को लोगों की इच्छा के आगे घुटने टेकने पड़े हैं। अभी कई बाधाओं को पार करना बाकी है, लेकिन भारत ने अभी-अभी शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक विरोध की ताकत देखी है। स्कोरकार्ड में अब मोदी – 0 और किसान – 1 लिखा है।

मैं आभारी हूं कि मैं पिछले एक साल में सौ से अधिक बार दिल्ली की सीमाओं का दौरा करने और किसानों के विरोध की कहानियों को रिकॉर्ड करने में सक्षम रहा हूं। इन कहानियों को उन सैकड़ों हजारों लोगों ने देखा है जो उनके द्वारा बेहद प्रभावित हुए हैं। यह एक कठिन और हृदयविदारक वर्ष रहा है। अब तक 700 से अधिक किसानों की मृत्यु हो चुकी है; कुछ मौसम खराब होने की वजह से, कई आत्महत्या से और कुछ हत्या से! इन सब के बावजूद, वे शांतिपूर्ण और अहिंसक बने रहे हैं।

एक शिक्षक के रूप में, मैं इस बात से भली-भांति परिचित हूं कि मूल्यों को सिखाया नहीं जा सकता, उन्हें पकड़ना पड़ता है। बच्चों और युवाओं को कोई भी केवल व्याख्यान देकर उन्हें अच्छा बनने के लिए नहीं कह सकता। उन्हें अनुकरण करने के लिए वास्तविक, सजीव रोल मॉडल की आवश्यकता है। उन्हें उन लोगों को देखने की जरूरत है जो साहस, शालीनता, विनम्रता और मानवता के मूल्यों पर जी रहे हैं। एक शिक्षक के रूप में मुझे आज भारत में सकारात्मक रोल मॉडल की कमी के बारे में भी गहरी चिंता है। क्या एक अच्छा रोल मॉडल क्रिकेटर या फिल्म स्टार है जो हर साल करोड़ों रुपये कमाता है, महंगी स्पोर्ट्स कारों में घूमता है, लेकिन एक अन्यायपूर्ण सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं रखता? मुझे ऐसा नहीं लगता। लेकिन आज, मैं यह कह सकता हूं कि एक सकारात्मक रोल मॉडल की मेरी तलाश खत्म हो गई है! मैं अपना सिर ऊंचा कर कह सकता हूं कि हमारे पास केवल कुछ रोल मॉडल नहीं हैं, बल्कि हमारे पास सैकड़ों हज़ारों हैं। उन्हें हम किसान कहते हैं और वे यहां दिल्ली की सीमाओं पर हैं।

स्कूल में हम अपने बच्चों को स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ाते हैं। हम उन्हें उन लोगों के बारे में बताते हैं जो न्याय, स्वतंत्रता और समानता के लिए अपने जीवन और अपनी स्वतंत्रता का बलिदान करने से नहीं डरे। लेकिन हम उन्हें इतिहास ऐसे पढ़ाते हैं मानो वह कोई कल्पना हो। हमें यह नहीं पता कि अभी दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है। और जिस तरह पुराने समय के हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की क्रूर नीतियों और ताकत के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, आज हमारे किसान आधुनिक ‘ईस्ट इंडिया कंपनियों’ और एक ऐसी सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं जिसकी नीतियां और व्यवहार अमीरों को और अमीर बना रही हैं और गरीब को और गरीब। इतिहास खुद को दोहरा रहा है।

मैं दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के साथ अपनी पहली मुलाकात को कभी नहीं भूलूंगा। उनके पहली बार आने के 10 दिन बाद, मैंने स्वयं गाज़ीपुर सीमा पर जाकर देखने का फैसला किया कि हो क्या रहा है। जब मैं दिल्ली-मेरठ हाईवे पर चल रहा था, जहां सिखों का एक समूह हाईवे के किनारे गद्दों पर बैठा था, उनमें से एक व्यक्ति उठा और मेरी ओर चलने लगा। मैं चिंतित हुआ यह सोचकर कि वे मुझसे क्या कहेंगे?

उनका नाम बाबा मनजीत सिंह था और वह रुद्रपुर से आए थे। उन्होंने मुझसे नहीं पूछा कि मैं कौन हूं, ना ही मुझसे यह पूछा कि मैं क्या चाहता हूं। उनका पहला और एकमात्र सवाल था, “क्या तुम्हें भूख लगी है? कृपया कुछ खाने के लिए लें।”

मैं चकित रह गया! मेरे जीवन में कभी भी किसी अजनबी ने इतनी मित्रता और भोजन की पेशकश के साथ मुझसे संपर्क नहीं किया। मैं उनके साथ और बाकी लोगों के साथ वहीं बैठ गया और हमने साथ में पकोड़े और चाय पी। मैंने बाबाजी से पूछा, “यदि पुलिस आप पर फिर से हमला करे तो आप क्या करेंगे?” और उन्होंने सरलता से उत्तर दिया, ‘कुछ नहीं। हम वापिस वार नहीं करेंगे। हम हिंसा में विश्वास नहीं रखते। हम अपने अधिकारों के लिए और इन काले कानूनों के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी लड़ाई लड़ने आए हैं।” फिर वे अपनी आँखें बंद कर शांति से वहीं बैठ गए। जब तक मैं जीवित रहूंगा मैं उस बातचीत को कभी नहीं भूलूंगा। मैं पिछले एक साल में दिल्ली की सीमाओं पर ऐसे हजारों बाबाजी से मिला हूं, और अब मुझे यह पता है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद, अच्छाई, शालीनता, साहस और दया अभी जीवित और स्वस्थ है।

मुझे एक बार फिर उम्मीद है कि हमारे बच्चों का भविष्य बेहतर होगा।

अनुवाद : सुचेतना सिंह