किसान आंदोलन: लोगों की अंतर-आत्मा

वर्तमान किसान आंदोलन व्यापक है। यह राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। शायद ही इतिहास में कोई ऐसा आंदोलन हो जो इतना शांतमई, हर दिल अजीज़ और जन आंदोलन बना हो। अब सवाल यह उठता है कि सरकार इन कानूनों को लाने के लिए इतनी जिद क्यों कर रही है? दरअसल, यह साम्राज्यवाद का नया युग है जिसमें ज़र्जर अर्थव्यवस्था विशाल पूंजी के माध्यम से एक नए साम्राज्य में तब्दील हो जाएगी। इस युग में मानसुई बुद्धिजीवियों के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में चौथी औद्योगिक क्रांति लाई जाएगी जिसमें मानव श्रम के स्थान पर डिजिटल अर्थव्यवस्था का विकास होगा। इस लिहाज से सरकार पहले ही अगले स्तर पर पहुंच चुकी है। हरित क्रांति के दौरान, केवल कृषि आदानों को नियंत्रित किया गया था, लेकिन अब कॉर्पोरेट जगत ने कृषि बाजार के साथ-साथ कृषि उत्पादन पर कब्जा करने के लिए हर तैयारी की है। उत्पाद भंडार के लिए साइलो और बाजार के लिए ‘अग्रिम व्यापार’ का ई-नामांकन जैसे तरीकों के विकास पर जोर दिया जा रहा है। किसान उत्पादक संघ के माध्यम से नए एजेंट बनाए जा रहे हैं। फसल बीमा योजनाओं के माध्यम से किसानों की कंपनियों को लूटा जाएगा और उन्हें अनुबंध खेती की ओर धकेला जाएगा।

नए कानूनों के माध्यम से नियमित बाजार प्रणाली को तोड़ एमएसपी पर होती सरकारी खरीद को रोककर खुले बाजार के माध्यम से कॉरपोरेट द्वारा किसानों को लूटने के लिए व्य्वस्था बनाई जाएगी। कंपनियां तब आवश्यक उत्पाद संशोधनों के माध्यम से उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों को उच्च कीमतों पर बेचेंगी। दरअसल, कृषि में जो तीन कानून लाए गए हैं, उन्हें लेकर सरकार और किसानों के बीच अनबन चल रही है। सरकार कृषि अर्थव्यवस्था को कॉरपोरेट्स को सौंपना चाहती है जबकि किसान कृषि का स्वामित्व नहीं छोड़ना चाहते। यह आंदोलन बहुत व्यापक, अद्वितीय, लोकप्रिय, सभी धर्मों, रंगों, धर्मों, जातियों, क्षेत्रों से अलग है। कॉरपोरेट्स को छोड़कर किसी भी ‘पार्टी’ के खिलाफ नहीं जाता है।

इतिहास किसान आंदोलनों की सफलताओं से भरा है। तेलंगाना आंदोलन, पेप्सू मुजाहरा घोल, पगड़ी संभाल जट्टा और कई अन्य किसान आंदोलनों ने सफलतापूर्वक अपने अधिकारों का दावा किया है। सवाल यह उठता है कि यह अनोखा आंदोलन किसी चीज की मांग नहीं कर रहा है बल्कि मांग कर रहा है कि हमें आपके नए कानूनों की जरूरत नहीं है, बस, हमें अपनी फसलों की खरीद के लिए गारंटी की जरूरत है। आंदोलन की प्रकृति, कोरोना महामारी, समय की तात्कालिकता, लोगों की अंतरात्मा, मांगों की वैधता को देखते हुए, हमारी अपनी चुनी हुई सरकार को किसानों की मांगों को पूरा करना चाहिए ताकि मेहनतकश जनता अपना जीवन जी सके, गरिमा और सम्मान से।

अनुवाद: नवकिरन नत्त