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पढ़ा लिखा किसान देश की शान

मालूक सिंह खिंडा, 59, पुत्र स्वर्गीय मुख्तियार सिंह, ननकमत्ता, उत्तराखंड के एक किसान परिवार से हैं और न्यू लाइट स्कूल के मालिक हैं। ग़ाज़ीपुर मोर्चे के किसान आंदोलन में शामिल होकर अपना पूर्ण समर्थन दे रहे हैं। बल्कि मोर्चे में डटे रहते हुए अपने घर में साँढु के बेटे की शादी में भी शामिल नहीं हो पाए। ग़ाज़ीपुर मोर्चे में ये 1 दिसम्बर को शामिल हुए। जब 4 दिसंबर से ग़ाज़ीपुर मोर्चे का मंच शुरू हुआ तो खिंडा जी ने अपनी सेवा भावना से 6 दिसम्बर से मंच का संचालन सम्भाल लिया।

इनकी ड्यूटी सुबह 7:30 से रात 8:00 बजे तक होती है। सुबह सबसे पहले अनशन पर बैठे किसानों को खाना खिलाकर भूख हड़ताल पूरी करवाते हैं और जो किसान स्वेच्छा से अगले 24 घंटे  की भूख हड़ताल पर बैठना चाहते हैं उनकी सूची बनाते और उनको नियमों के बारे में बताते हैं। फिर मंच की शुरूवात करते हुए वक्ताओं को संबोधित करते हुए मंच पर बोलने के लिए आमंत्रित करते। यही कार्यक्रम सारा दिन चलता है और साँय 5 बजे मंच समाप्ति के बाद वक्ताओं की सूची बनाते हैं और भारतीय किसान यूनियन के मीडिया प्रभारी को सौंपते हैं। यह सिलसिला पूरे 3 महीने चला और मालूक सिंह के घर वाले ग़ाज़ीपुर मोर्चे में उनसे मिलने आए। अब वह एक दो हफ़्ते की रोटेशन से मोर्चे पर आते जाते रहते हैं। 

उन्होंने पूछने पर बताया कि आम राय है कि किसान कम पढ़ा लिखा अथवा पिछड़ा हुआ हैं और मैं यहाँ मोर्चे में अपना पूरा योगदान देकर इस गलतफहमी को दूर करना चाहता हूँ। किसान पढ़ा-लिखा भी है और मॉडर्न भी। किसी को भी उनके पेशे या बिजनेस से नहीं बल्कि उनके गुणों और समाज में उनके योगदान से मापना चाहिए । यहाँ ग़ाज़ीपुर आकर मैं बहुत लोगों से मिला और अब हम एक बड़ा परिवार बन गए हैं। आंदोलन की सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ जात-पात का भेद-भाव मिट गया और सब एक़ हो गए हैं। सरकार को मैं कहना चाहता हूँ कि हम किसानों का हक़ हमें मिलना चाहिए। अन्नदाता पर हो रहे अत्याचार को रोकें और अपनी कुनीतियो को वापिस ले। किसानो की फसलें अब पक गयीं और सिमट गयी हैं तो अब किसान हर एक मोर्चे में बढ़-चढ़ कर आएँगे और मोर्चे में बैठे अपने भाई बहनों का पूर्ण समर्थन करेंगे। 

जय जवान जय किसान

 

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