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ये आंदोलन अन्न-खाता का भी है: दलजीत सिंह

Ramkumar Radhakrishnan, Wikimedia

दलजीत सिंह, 54, विर्क फ़ार्म किच्छा, उत्तराखंड के निवासी हैं। वे एक किसान परिवार से है व पेशे से डॉक्टर हैं । दलजीत सिंह का कहना है कि इन तीन काले कानूनो के बारे में उन्हें विभिन्न समाचार पत्रों ऐवं सोशल मीडिया से ज्ञात हुआ और तराई किसान संघठन में शामिल होकर उन्होंने इनका विरोध पहले तहसील स्तर, फिर ज़िला स्तर पर किया । पंजाब से शुरू हुआ आंदोलन जब दिल्ली के बॉर्डर पर पहुँच कर संयुक्त किसान मोर्चा के रूप में उभरा तो उत्तराखंड एवं यूपी के किसानो ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर आकर धरना शुरू कर दिया। 26 नवम्बर को जब किसानो ने ग़ाज़ीपुर को कूच किया तो प्रशासन ने दलजीत सिंह एवं दूसरे किसानो को बिलासपुर, यूपी में ही रोक दिया। अतः 28 की रात को दिल्ली जाने की अनुमति दे दी | 11 दिसम्बर को दलजीत सिंह अपने भाइयों के साथ ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुँचे और 10 दिन धरने में शामिल होकर घर लौट आए।  पुनः 25 दिसम्बर को सपरिवार ग़ाज़ीपुर मोर्चे में डट गए । वो बताते हैं की उनके परिवार की महिलाएँ पहली महिलाएँ हैं जो ग़ाज़ीपुर मोर्चे में रात को भी रुकीं। ग़ाज़ीपुर कमेटी एवं नवाबगंज लंगर के सेवादारों ने महिलाओं के रहने के लिए टेंट लगाए। वे मोर्चे पर लगातार एक महीना रहे जिसमें उन्होंने बर्तन धोने की सेवा की। वे कहते हैं कि करसेवा वालों ने ग़ाज़ीपुर मोर्चे में लंगर की सेवा कर के जान डाल दी है।

दलजीत सिंह ने बताया कि पीछे घर पर अपनी बेटी की शादी की तैयारियाँ छोड़ कर वे यहाँ मोर्चे में आ गए। उनके परिवार ने उनका बहुत सहयोग किया और घर की चिंता छोड़ देने के लिए कहा। क्योंकि दलजीत सिंह पेशे से डॉक्टर भी हैं तो समय निकालकर वह मेडिकल कैम्प में भी सेवा करते हैं। उन्होंने बताया कि  26 जनवरी को उनकी ड्यूटी रेली में जाने वाले वाहनो पर राष्ट्रीय ध्वज लगाने की थी जिसमें काफ़ी सारे वाहनो पर शान से ध्वज लहराया गया। दलजीत सिंह शहीद हुए नवरीत सिंह की अंतिम पूजा में भी पहुँचे और फिर ग़ाज़ीपुर वापिस आ गये और इस बार इनकी ड्यूटी मोर्चे पर आने वाली सेवा की रसीद काटने की लगी । 

दलजीत बताते हैं, “अपने ख़ाली समय में मैं अपना भाषण तैयार करता हूँ और समय मिलने पर स्टेज पर जाकर अन्य किसानो को सम्बोधित करता हूँ। मैंने पहले कभी ऐसे स्टेज पर नहीं बोला लेकिन यहाँ मोर्चे में मुझे बोलना और लोगों से बात करना अच्छा लगता है। मैं यहाँ 24 घंटे रखे जाने वाले उपवास में भी शामिल हुआ। अपनी दिन भर की ड्यूटी ख़त्म कर मैं मोर्चे में आए किसानो के साथ बैठता हूँ और हम लोग कानूनो एवम् किसान लीडरों के बारे में चर्चा करते हैं। यहाँ आकर मुझे बहुत सारे लोग मिले और हम दोस्त बन गए हैं। अब मैं मोर्चे में लगभग सबको जानता हूँ और हम एक परिवार बन गए हैं । 

दलजीत सिंह अब ग़ाज़ीपुर आते जाते रहते हैं और इस बार बेटी की शादी के सिलसिले में अपने घर गए हुए हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि वैसाखी पर वो ज़रूर ग़ाज़ीपुर आएँगे और घर पर शादी का प्रोग्राम होने के बाद वापिस ग़ाज़ीपुर आ जाएँगे। वह बताते हैं “ ग़ाज़ीपुर अब मुझे घर लगता हैं और वापिस अपने घर जाकर मुझे ग़ाज़ीपुर आने की जल्दी रहती है। घर को पत्नी व बच्चे सम्भाल लेते हैं।”

मैं सब भाई-बहनो से अनुरोध करूँगा कि इस आंदोलन में अपनी हिस्सेदारी ज़रूर करें। मैं खुश हूँ कि इतने बड़े जन आंदोलन का मैं हिस्सा बना और जब तक सरकार हमारी माँगे नहीं मानती हम शांतिपूर्वक आंदोलन जारी रखेंगे क्योंकि ये आंदोलन सिर्फ़ अन्न-दाता का नहीं बल्कि अन्न-खाता का भी है।”

 

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