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माँ

अभिप्सा चौहान

नवंबर का महीना था और बलजिन्दर कौर के घर पर बड़ी बेटी की शादी की तैयारियाँ चल रही थी। उत्तराखंड के शहीद ऊधम सिंह नगर जिले के मल्ली देवरिया गाँव में रहने वाली बलजिन्दर का जीवन एक आम औरत की तरह ढर्रे पर चल रहा था। खेत और गृहस्थी की देखभाल में ज़िंदगी कट रही थी। और फिर किसान आंदोलन पंजाब, हरियाणा की सीमाएँ लांघता हुआ दिल्ली के द्वार पहुँचा जिसने बलजिन्दर की ज़िन्दगी बदल कर रख दी। तक़रीबन एक महीने तक किसान आंदोलन को देखनेसमझने के बाद उन्होंने इसमें शामिल होने का फैसला किया और उस किसान जत्थे में शामिल हो गईं जो उत्तराखंड से सबसे पहले बाजपुर बैरियर तोड़ कर दिल्ली जाने के लिए बढ़ा था।

अब तक उनकी पहचान एक औरत,एक माँ और एक किसान के रूप में होती थी पर अब वह एक आन्दोलनकारी हैं। ग़ाज़ीपुर मोर्चा उनका दूसरा घर बन गया है। 55 साल की बलजिन्दर, पंजाब के गुरदासपुर के विर्क गाँव में पैदा हुईं। वहीं पढ़ाई हुई शादी, दलजीत सिंह विर्क के साथ हुई जो नैनीताल जिले के एक किसान परिवार से थे। उनके परिवार ने आज़ादी के बाद के देश को कई करवटें लेते देखा है। पति के दादा आज़ादी के बाद पाकिस्तान के शेखोपुरा से आकर पूर्वी पंजाब में बस गये। 1966 में पंजाबी सूबा बनने के बाद वह उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में गये। उस समय वहाँ जंगल हुआ करते थे। उन्होंने जंगल साफ किए और उसे खेती लायक बनाया और अपना घर संसार बसाया। सन् 2000 में  उत्तर प्रदेश के बँटवारे के बाद उत्तराखंड बना और विर्क परिवार उत्तराखंड राज्य के शहीद ऊधम सिंह नगर का निवासी हो गया। 

बलजिन्दर ने बड़ी बेटी की शादी कुछ समय के लिए टाल दी है। इस समय उनका पूरा परिवार जिसमें उनके पति, दो बेटियाँ, एक बेटा किसान आंदोलन को समर्पित हैं। बलजिन्दर कौर के परिवार का सफ़र शेखोपुरा और गुरदासपुर से शुरू हुआ और संयुक्त पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड होते हुए आज ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पंहुचा है। उनका कहना है कि ज़मीन हमारी माँ है और उसकी हिफाजत से जरूरी दुनिया का कोई काम नहीं। इसलिए बिल वापसी बिना घर वापसी नहीं।

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