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कृषि क्षेत्र की पहली जरूरत सुदृढ़ ‘कोल्ड चेन’

एमएस श्रीराम प्रोफेसर, सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी, आईआईएम बेंगलुरु

काल्पनिक कैद से किसानों की रिहाई से क्या हासिल?

सरदार पटेल के कहने पर ही गुजरात में किसानों ने को-ऑपरेटिव संगठन बनाकर दुग्ध विपणन का कार्य अपने हाथ में ले लिया था। कुछ साक्षात्कारों में प्रोफेसर अशोक गुलाटी (कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष) ने फसल की विविधता और कम होते जल स्तर पर काफी गंभीर विचार व्यक्त किए हैं। कृषि बिलों का समर्थन करते हुए उन्होंने कई बार डेयरी किसानों की सफलता का जिक्र किया। अगर यह कहा जाए कि निजी क्षेत्र इस समस्या का समाधान सुझाएगा और कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा तो डेयरी का उदाहरण दिए जाने पर सवाल खड़े होते हैं। यह बाजारों के अच्छा या बुरा होने पर द्विपक्षीय बहस का मुद्दा नहीं है। यहां बात संदर्भ की है। 

डेयरी के उदाहरण दिए जाते हैं तो हमें ‘सुधार’ के लिए आवश्यक परिस्थितियों के बारे में समझना होगा। 1940 में जब डेयरी क्षेत्र में थोड़ी-बहुत हलचल दिखाई दे रही थी, तब किसान बाजार में अपना दूध बेचने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र था। तब पोल्सन नामक एक कंपनी ने खेड़ा जिले का दूध खरीदा। किसानों की शिकायत थी कि उन्हें बाजारों में दूध के उचित दाम नहीं मिल रहे हैं। जब वे सरदार पटेल के पास समस्या लेकर पहुंचे, तो उनका कहना था – ‘पोल्सन से छुटकारा पाओ।’ इस पर किसानों ने दुग्ध हड़ताल कर दी, पोल्सन को दूध की आपूर्ति रोक दी, सारे किसान त्रिभुवन दास पटेल के नेतृत्व में एकजुट हो गए और को-ऑपरेटिव संगठन बनाकर दूध के विपणन का कार्य अपने हाथ में ले लिया। क्या ‘पोल्सन से छुटकारा पाओ’ का आह्वान आज कुछ उद्योगपतियों के बहिष्कार में तब्दील हो गया है? उस आह्वान का परिणाम इतिहास बन गया। अमूल को-ऑपरेटिव संघ विकसित हुआ, जहां किसान खुद मालिक बना। अमूल की कहानी शुरू होती है 1946 से। शुरुआत दूध खरीदने से हुई। फिर प्रसंस्करण शुरू हुआ। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल सराहती रिसर्च इंस्टीट्यूट (मैसूर) की तकनीक से भैंस के दूध से मिल्क पाउडर और पनीर बनाया गया। नेस्ले के पास भी यह तकनीक नहीं थी! 27 साल बाद इन को-ऑपरेटिव समूहों ने मिलकर गुजरात फेडरेशन की स्थापना की। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अमूल के प्रदर्शन से प्रभावित हुए और उसी मॉडल का अनुकरण करते हुए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का गठन हुआ। 1970 में शुरू हुआ भारत का डेयरी अभियान ‘श्वेत क्रांति’ 1996 में संपूर्ण हुआ। यह सब लाइसेंस परमिट राज के दौरान हुआ। 

बाजार के प्रभाव से अलग! आज अगर डेयरी मजबूत स्तम्भ की तरह खड़ा है तो उसका आधार है-पांच दशक से अधिक का जन निवेश। वेल्यू चेन, लॉजिस्टिक्स, स्टोरेज, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की बात की जाए तो क्या संपूर्ण कृषि क्षेत्र डेयरी क्षेत्र के समतुल्य है? अगर नहीं, तो सवाल उठता है कि इसे कैसे समतुल्य बनाया जाए? इसके लिए एक रणनीति की आवश्यकता है। अपनी सफलताओं को सराहने में कोई बुराई नहीं होती। कृषि क्षेत्र के लिए जरूरी है मंडी, वेयरहाउसिंग, प्रोसेसिंग, एकत्रीकरण, कीमत निर्धारण और लॉजिस्टिक्स में निवेश की। अगर हम किसान उत्पादक संगठनों का रास्ता अपनाते हैं तो यह बेहतर होगा और विस्तारीकरण के इस काम में दशकों लग जाएंगे। नीतियों के केंद्र में इन मुद्दों पर फोकस करना जरूरी है न कि किसानों को किसी ‘काल्पनिक कैद’ से मुक्ति दिलाने पर। कृषि क्षेत्र के लिए एक मजबूत कोल्ड चेन विकसित किए जाने तक हम इन कृषि कानूनों को ठंडे बस्ते में डाल सकते थे। याद रखिए सरदार पटेल ने ही कहा था – ‘पोल्सन न काडिनाको’। उम्मीद है सरकार उन महात्माओं से तो प्रेरणा लेगी ही, जिनको वह सराहती हैं उनके शब्दों को मूर्त रूप देने में चूक की गुंजाइश कहां है!

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