लोकतंत्र की सड़क बहुत लम्बी है ; सरकार की कीलें कम पड़ जाएँगी !

श्रवण गर्ग

देश को डराने की पहली जरूरत यही हो सकती है कि सबसे पहले उस मीडिया को डराया जाए जो अभी भी सत्ता की वफ़ादारी निभाने से इनकार कर रहा है। सीनियर सम्पादकों के ख़िलाफ़ मुक़दमों के साथसाथ युवा फ़्रीलान्स पत्रकारों की गिरफ़्तारी आने वाले दिनों का वैसा हीमीडिया सर्वेक्षणहै जैसा कि बजट के पहलेआर्थिक सर्वेक्षणपेश किया जाता है।यहआपातकालसे भी आगे वाली ही कुछ बात नज़र आती है।विडम्बना है कि हालफ़िलहाल तक तो किसान आंदोलन को मीडिया के सहारे की ज़रूरत थी,अब मीडिया को ही उसके नैतिक समर्थन की ज़रूरत पड़ गई है।

 सरकार ने अपने मंत्रालयों के दरवाज़े पत्रकारों के लिए काफ़ी पहले इसलिएबंदकर दिए थे कि वे वहाँ से खबरें ढूँढकर जनता तक नहीं पहुँचा पाएँ। इसकी शुरुआत निर्मला सीतारमण के वित्त मंत्रालय से हुई थी।अब, जब पत्रकार सड़कों से भी खबरें ढूंढ कर लोगों तक पहुँचा रहे हैं ,उन्हें हीबंदकिया जा रहा है।जनता समझ ही नहीं पा रही है कि हक़ीक़त में कौन किससे डर रहा है !

देश में जैसे लोकतंत्र कीज़रूरत से ज़्यादाउपलब्धता को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं वैसा ही कुछकुछ मीडिया को उपलब्धज़्यादा आज़ादीके संदर्भ में भी चल रहा है।माना जा रहा है कि सरकार को अपने आर्थिक सुधारों को एकदलीय व्यवस्था वाले चीन के मुक़ाबले तेज़ी से लागू करने के लिए स्वतंत्र मीडिया की ज़रूरत ही नहीं है।गौर किया जा सकता है कि कोरोना से बचाव के सिलसिले में प्राथमिकता के आधार पर जिन्हेंफ़्रंट लाइन वारियर्समानकर टीके लगाए जा रहे हैं उनमें मीडिया के लोग शामिल नहीं हैं। शायद मान लिया गया है कि वे तो देश और सरकार के लिए वैसे ही अपनी जानें क़ुर्बान करने के लिए होड़ में लगे रहते हैं।

 नागरिक समाज में लोग जो धृतराष्ट्र की भूमिका में उपस्थित हैं वे भी बिना किसी संजय की मदद के देख पा रहे हैं  किमेन स्ट्रीमयामुख्य धाराके लगभग सम्पूर्ण  ‘हाथी मीडियापर इस समय व्यवस्था के महावत ही क़ाबिज़ हैं। परिणाम यह हो यह रहा है कि इसहाथी मीडियाकीब्रेकिंगयाएक्सक्लूसिव न्यूज़को भी दर्शक और पाठकएक और सरकारी घोषणाकी तरह ही अविश्वसनीय मानकर ख़ारिज करते जा रहे हैं। यही वह मीडिया भी है जो उच्च पदों पर आसीन बड़ेबड़े लोगों की आम जनता के बीच लोकप्रियता केओपीनियन पोल्सऔर चुनावों की स्थिति में उसके कारण मिल सकने वाली सीटों की अतिरंजित भविष्यवाणियाँ मतदाताओं में बाँटकर सत्ताओं के पक्ष में माहौल तैयार करता नहीं थकता। इस सब के बीच भी सांत्वना देने वाली बात यह है कि कुछ पत्रकार अभी भी हैं जो तमाम अवरोधों और व्यवधानों के बावजूद मीडिया की आज़ादी के लिए काम कर पा रहे हैं।चीजों का अभी साम्यवादी मुल्कों की तरह क्रूरता और दमन के शिखरों तक पहुँचना बाक़ी है।हो यह रहा है कि खेती की ज़मीन को बचाने की लड़ाई का नेतृत्व अब जिस तरह से छोटे किसान कर रहे हैं, मीडिया की ज़मीन को बचाने की लड़ाई भी छोटे और सीमित संसाधनों वाले पत्रकार ही कर रहे हैं। ये ही वे पत्रकार हैं जिन्हें छोटीछोटी जगहों पर सबसे ज़्यादा अपमान, तिरस्कार और सरकारी दमन का शिकार होना पड़ता है।हत्याएँ भी इन्हीं की होती हैं।

 किसान  ‘कांट्रेक्ट फ़ार्मिंगसे लड़ रहे हैं और पत्रकारकांट्रेक्ट जर्नलिज़्मसे।व्यवस्था ने हाथियों पर तो क़ाबू पा लिया है पर वह चींटियों से डर रही है। ये पत्रकार अपना काम उस सोशल मीडिया की मदद से कर रहे हैं जिसके माध्यम से ट्यूनिशिया और मिस्र सहित दुनिया के कई देशों में बड़े अहिंसक परिवर्तन हो चुके हैं।पर डर यह है कि सोशल मीडिया भी प्रतिबंधों की मार से कब तक बचा रहेगा। गृह मंत्रालय और क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों की माँग पर ट्विटर ने हाल ही में कोई ढाई सौ अकाउंट्स पर रोक लगा दी है।बताया गया है कि इन अकाउंट्स को बंद करने की माँग किसान आंदोलन के चलते क़ानूनव्यवस्था की स्थिति बिगड़ने देने के प्रयासों के तहत की गई थी।इसी आधार पर आगे चलकर और भी बहुत कुछ बंद करवाया जा सकता है।

 प्रधानमंत्री केएक फ़ोन कॉल की दूरीके आमंत्रण के ठीक बाद ही सिंधू ,ग़ाज़ीपुर, टिकरी बार्डर्स पर किसानों के राजधानी में प्रवेश को रोकने के लिए दीवारें खड़ी कर दी गईं हैं।सड़कों की छातियों को नुकीले कीलों से छलनी कर दिया गया है।तो क्या अब खबरें भी इन प्रतिबंधों के ताबूतों में क़ैद हो जाएँगी? शायद नहीं ! अब तो युवा पत्रकार मनदीप पूनिया भी जमानत पर बाहर गया है।सरकार दीवारें कहाँकहाँ खड़ी करेगी ? लोकतंत्र की सड़क भी बहुत लम्बी है। कीलें ही कम पड़ जाएँगी। सरकार खुद की नब्ज पर अपने ही हाथ को रखे हुए ऐसा मान रही है कि देश की धड़कनें ठीक से चल रही है और सब कुछ सामान्य है।हक़ीक़त में ऐसा नहीं है।इंदिरा गांधी ने भी बस यही गलती की थी पर उसे सिर्फ़ अट्ठारह महीने और तीन सप्ताह में दुरुस्त कर लिया था।अभी तो सात साल पूरे होने जा रहे हैं।जनजन के बीचकी जिस दीवार को बर्लिन की दीवार की तरह ढहा देने की बात प्रधानमंत्री ने सवा दो साल पहलेगुरु पर्वके अवसर पर कही थी वह तो अब और ऊँची की जा रही है।