कृषि सुधार क़ानून कैसे हों?

निखित कुमार अग्रवाल, ऋचा कुमार

प्रधान मंत्री मोदी ने 25 दिसंबर को अपने भाषण में कहा था कि तीनों विवादास्पद खेती कानून, जो देश में कृषि बाज़ारों की दक्षता (efficiency) को बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, पिछली सरकारों द्वारा नज़रअंदाज़ किए गए लाखों छोटे किसानों को न्याय दिलाएंगे। हमारा मानना है कि देश में कृषि विपणन प्रणाली में बदलाव लाने की सख़्त ज़रूरत है, लेकिन ऐसा उपाय, जो 85 प्रतिशत से अधिक संख्या वाले छोटे और सीमांत किसानों को सामाजिक और आर्थिक न्याय दिला सके, वो देश में  पारिस्थितिकी, पोषणता, समानता, संस्कृति, अर्थशास्त्र, और राजनीति के साथसाथ दक्षता (एफिशिएंसी) से जुड़े कारकों को ध्यान में रखकर ही बनाया जा सकता है। तीनों कृषि कानून इन सब पहलुओं को एक साथ देखने में असफल रहे हैं, इसलिए इनसे जुड़े कई सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं।

सबसे पहले, जबकि किसानों को बेचने के लिए बाज़ार में प्रतिस्पर्धी लाना आवश्यक है, केंद्र सरकार ने यह क्यों मान लिया कि विनियमित मंडियों को दरकिनार करना ही सबसे बेहतर समाधान है? यदि समस्या मंडियों के लाइसेंस राज और कुछ मंडियों में व्यापारियों की साँठगाँठ या प्रभावी कंट्रोल की है, तो लाइसेंस की आवश्यकताओं को क्यों नहीं बदलना उचित समझा गया और अधिक ख़रीदारों (छोटे और बड़े व्यापारी, कंपनियां, स्टार्टअप, सहकारी समितियां, एफसीआई, आदि) को मंडियों में आमंत्रित करने की कोशिश क्यों नहीं की गईमंडी प्रणाली को स्थापित करने का मूल उद्देश्य एक विनियमित और प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रणाली को बढ़ावा देना था, जिसके तहत कई बोली लगाने वाले व्यापारी सार्वजनिक रूप से किसानों की उपज के लिए बोलियां लगाते। व्यापारियों के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा में कॉरपोरेट्स के प्रवेश से इस प्रतिस्पर्धी खरीदी वातावरण को मज़बूत किया जा सकता है जिससे दक्षता और बढ़ेगी। बुनियादी ढांचे में सुधार और 23,000 से अधिक ग्रामीण हाटों के साथसाथ छोटी मंडियों को विकसित करके इस संस्थागत बाज़ार को छोटे और सीमांत किसानों के करीब भी लाया जा सकता था

नए अधिनियमों के तहत, कुछ निजी खिलाड़ी बाजार में प्रभावी  होकर निजी बाज़ारों में अपने बनाये हुए नियमों के अनुसार किसानों से माल खरीद सकते हैं।  किसानों को इन निजी बाज़ारों में  बेचने के लिए उन नियमों को स्वीकार करना होगा। मंडी एक विनियमित सार्वजनिक स्थान है जहां किसान निजी व्यापारियों / कॉर्पोरेट खरीदारों को बाज़ार में उनके कृत्यों के लिए ज़िम्मेदार ठहरा सकता है लेकिन निजी बाजारों की जवाबदेही उनके संबंधित शेयरधारकों के प्रति है कि किसानों के प्रति। हालांकि नए कानूनों के प्रस्तावकों का कहना है कि विनियमित मंडियां पहले की तरह काम करेंगी, लेकिन जैसा की किसान आन्दोलन ने बीएसएनएल बनाम जियो का उदाहरण देते हुए प्रभावी ढंग से तर्क दिया है कि मध्यम अवधि में, इनमें से अधिकांश मंडियों के बंद होने की गंभीर संभावना है।

दूसरा, मंडी प्रणाली में सभी गुणवत्ता की फ़सल बिक जाती है, लेकिन निजी खरीदारों के मानक उच्च गुणवत्ता के होते हैं जो कम गुणवत्ता वाले उत्पादकों को बाहर करते हैं। बाहरी पर्यावरण के कारण, उत्पादनसंबंधी जोखिम और आर्थिक कारणों से कृषि उपज की गुणवत्ता में प्राकृतिक भिन्नता आती है सभी किसान निजी खरीदारों के मानक के अनुसार परिभाषितअच्छीगुणवत्ता वाली फसल हर मौसम में प्राप्त नहीं कर पाएंगे और ना ही बाज़ार में ला सकेंगे। आमतौर पर, छोटे व्यापारी कम गुणवत्ता वाली उपज को खरीदकर उसे साफ या छँटाई करवा कर मंडी प्रणाली में अन्य व्यापारियों को बेच देते हैं। इससे हर प्रकार की गुणवत्ता की उपज विपणन प्रणाली में पाती है, और उन किसानों को बाज़ार तक की पहुंच मिलती है। बड़े कॉर्पोरेट ख़रीदार विपणन प्रणाली में गुणवत्ता के मानकों में अपने निजी फ़ायदे के अनुसार बदलाव ला सकते हैं, पर कम गुणवत्ता वाली फ़सल लाने वाले किसानों और उनकी उपज का क्या होगा?

तीसरा तर्क दूसरे से संबंधित है। प्रकृति में कभी भी समान आकृति या आकार की चीज़ नहीं उगती है। बनावट, रंग, यहाँ तक की स्वाद भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। और यह विभिन्नता हमारे भोजन में भी दिखती है जैसे रसम, चटनी और सलाद में अलग किस्म के टमाटर इस्तेमाल होते हैं, या पुलाव, खीर और दोसे के अलग किस्म के चावल को ही देख लें। दुनिया भर में, और विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में, एग्रीबिज़नेसों  ने उत्पादन को एक समान गुणवत्ता के मानक की तरफ़ परिवर्तित किया है जिसका प्रभाव पूरी कृषि व्यवस्था और लोगों के खान पान पर भी पड़ा है इस प्रक्रिया ने किसानों को कुछ ही फसलों और किस्मों को उगाने पर मजबूर कर दिया है   गुणवत्ता के मानकों को प्राप्त करने के लिए किसानों ने एकल फ़सल प्रणाली यानि मोनोकल्चर पद्धति अपनाई है जिसमे जोखिम तो है ही, साथ ही वातावरण और सेहत के लिए भी यह हानिकारक है। और तो और अमरीका में लोगों का खान पान अल्ट्रा प्रोसेस्ड पदार्थों से बनी हुई कुछ ही चीज़ों पर भारी रूप से निर्भर हो गया है। जैसे मैदा, मक्की से बनी मीठी चाशनी (हाई फ्रुक्टोस कॉर्न सिरप) और सोयाबीन का तेल हर बाज़ारी खाने की नीव बन चुके हैं 2015-16 के सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल (सी.डी.सी) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में 20 साल की उम्र से ऊपर 70 प्रतिशत लोग मोटापे का शिकार हो गए  हैं क्या हम भारत में ऐसी कृषि विपणन प्रणाली लाना चाहेंगे जो की कृषिविविधता के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक साबित हुई है?

चौथा, बाज़ार की दक्षता इस बात से भी मापी जाती है कि कृषि उपज कितनी आसानी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकती है। लेकिन कृषि उपज के लंबे सफ़र से जो प्रदूषण फैलेगा, ख़ास तौर पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), क्या उस से जलवायु परिवर्तन और ज़्यादा तेज नहीं हो जाएगा, जिसका नुक़सान अंततः किसानों को ही भुगतना होगा? पांचवां और अंतिम तर्क कृषि बाज़ारों की स्वतंत्रता से संबंधित है। वैश्विक स्तर पर 1990 की दशक से हुए कृषि व्यापार के उदारीकरण के कारण भारतीय किसानों को अपनी उपज को विश्व बाजार में बेचने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों को दरकिनार करते हुए अपने किसानों को बहुत बड़ी मात्रा में सब्सिडी देते हैं (2020 में अमेरिका में संघीय कृषि सब्सिडी में 4600 करोड़ डॉलर दिया गया) यह भारत के लिए कर पाना लगभग असंभव है और इसलिए भारतीय किसानों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर पाना मुश्किल है ऐसे विकृत बाज़ार में, क्या भारतीय कृषि का उदारीकरण समझदारी की बात है?

इसके साथ साथ, यह भी ज़रूरी नहीं की बाज़ार में मांग और उसकी आपूर्ति करने वाले लोग एक आम, स्वीकार्य मूल्य बनाने के लिए अपने दम पर मिलेंगे। इस प्रणाली में अधिक शक्तिशाली लोग, कीमत और सौदे की अन्य शर्तों को निर्धारित करने की क्षमता रखते हैं। मंडियों के बाहर बिना किसी नियंत्रण के अनुसार, सीमांत और छोटे भारतीय किसानों को बड़े व्यापारी और कॉर्पोरेट खरीदारों से निपटना होगा। इन किसानों के लिए निजी खिलाड़ियों की पकड़ से खुद को बचा पाना और मुश्किल हो जाएगा भारत में कृषि की भूमिका ना सिर्फ़ देश की आजीविका और खाद्य सुरक्षा के मुद्दों से जुड़ी है बल्कि सामाजिकआर्थिक विकास के साथसाथ सामाजिक सद्भाव और समानता के लिए भी यह महत्वपूर्ण है। इसके साथ साथ कृषि क्षेत्र की विशिष्टता और भारतीय किसानों की हालत भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है इसलिए यह ज़रूरी  है कि कृषि नीतियों को तैयार करते समय दक्षता के साथ साथ पारिस्थितिकी, समानता, संस्कृति, अर्थशास्त्र और राजनीति से संबंधित कारकों को भी जोड़ा जाए।