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कौन है भारतीय किसान?

लोतिका

जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि विरोध नए साल में जारी रहेगा, किसान आंदोलन के नेताओं ने एक कार्यक्रम की घोषणा की, जिसमें 18 जनवरी 2021 को ‘महिला किसान दिवस’ निर्देश किया गया। इस दिन आंदोलन में भाग लेने वाले, भारत के कृषि क्षेत्र में काम करने वाले, किसान–मज़दूरों के लगभग आधे हिस्से के योगदान को स्वीकार करेंगे – हाँ आधा कृषि कार्यबल। वह लोग जिनको हम खुद ही अक्सर देखते नहीं, पर जिनके श्रम से हम लाभान्वित होते हैं। यह देखकर अच्छा लगा कि आंदोलन के नेता इस स्थिति के प्रति कितने सजग हैं, और हमारे समाज की दूसरे समस्याओं के समाधान के लिए इस ऐतिहासिक क्षण और आंदोलन का उपयोग करने के लिए तैयार हैं।

दूसरी ओर 11 जनवरी 2021 के दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणी बेहद शर्मनायक थी। इतना ही नहीं, कुछ दिन पहले मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नई 106-पृष्ठ लम्बी पुस्तिका ‘अन्नदाता के हितों को समपिर्त’ पर नज़र डाली, जो की 12 भाषाओं में छाप्पी गई है। यह पुस्तिका सरकार के उस प्रचार प्रसार का हिस्सा हे जिस के द्वारा जनता को नए कृषि कानूनों के बारे में गलत जानकारी देकर उन्हें गुमराह किया जा रहा है। इस पुस्तिका में किसानों के बहुत से चित्र हैं मगर इनमें एक भी ‘किसान’ महिला के रूप में नहीं दिखाया गया। वास्तव में पूरी पुस्तिका में ही महिलाएं बहुत कम नज़र आएँगी। जबकि आंकड़े हमें बताते हैं कि आधे लोग जो खेतों में काम करते हैं, जैसे की बीज बोना, पौधे रोपना, फ़सल काटना आदि, वह महिलाएं हैं। महिलाएं कृषि से जुड़े कई और काम भी करतीं हैं, जैसे पानी भरना और चारा लाना, दूध निकालना, गोशाला की देखभाल करना, फसलों का प्रसंस्करण करना आदि।

तो क्या इन विद्वान लोगों को यह नहीं पता कि भारत के किसान और कृषि मजदूर आखिर हैं कौन?

इसमें गलती हमारी भी हैं। जब हम स्वयं किसान के बारे में बात करते हैं, हम भी ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जिसमें किसान पुरष ही होता है; ‘किसान देश का अन्नदाता है’। जब हम अपनी सरकार और संस्थाओं को उनकी भाषा पर ध्यान देने की आलोचना करते हैं, महिलाओं को असमान इंसान के रूप में देखने की आलोचना करते हैं, हमें यह भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हम भी उन शब्दों का उपयोग करें जिसमें कृषि का साझावित सार पूरी तरह से प्रतिबिंबित हो।

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