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पलवल: किसान आंदोलन का पांचवा मोर्चा

रोना आपदा को अवसर बनाकर मोदी सरकार लगतार जनविरोधी नीतियों को लागू करती जा रही थी, देश के श्रमिकों के श्रम कानूनों में परिवर्तन करने के बाद मोदी सरकार का विनाशकारी अश्वमेघी घोड़ा अब खेतों और किसानी को बर्बाद करने के लिए निकल पड़ा इस बार इस विनाशकारी अश्व को रोकने का ऐतिहासिक काम किसानों ने किया। शायद मोदी सरकार को इसकी भान भी ना रहा हो कि इतना बड़ा प्रतिरोध सामने खड़ा हो जाएगा। अब मोदी और उसके मालिक करपोरेट सबके हाथ पांव फूले हुए हैं, वे घबराहट में है। दिल्ली जाने के पांच रास्तों पर लाखों की संख्या पर किसान डट गए है।

इन पांच मोर्चो में से एक है पलवल। वैसे हकीकत में बाकी अन्य चारों मोर्चों से जो खबरें सुनने में आ रही हैं उसके मुकाबले में पलवल मोर्चा काफी कमजोर है। लेकिन 02 दिसम्बर को जब ग्वालियर जिले के डबरा, चिनोर, भितरवार और भिंड जिले के गोहद तहसील के गांवों से बड़ी संख्या में किसान सैकड़ो ट्रैक्टर औऱ अन्य गाड़ियां लेकर निकले थे तब भी शायद किसी ने नहीं सोचा था कि 20 दिन तक वे यहां ऐसे जमे रह पाएंगे। जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं किसानों के हौंसले और जीतकर ही लौटने के उनके संकल्प और भी पक्के होते जा रहे हैं।दिन पर दिन किसानों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। जिस प्रकार से स्थानीय जनता का जुड़ाव बढ़ता जा रहा है वह इस बात की अश्वति देता है कि अब इस आंदोलन को दबाना या कुचलना शासक वर्ग के लिए इतना आसान नहीं।

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