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इन ढलानों पर वसंत आएगा

इन ढलानों पर वसंत आएगा

हमारी स्मृति में

ठंड से मरी हुई इच्छाओं को

फिर से जीवित करता

धीमे-धीमे धुँधुवाता खाली कोटरों में

घाटी की घास फैलती रहेगी रात को

ढलानों से मुसाफ़िर की तरह

गुज़रता रहेगा अँधकार

चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख

फिर से उभरेगा झाँकेगा कभी

किसी दरार से अचानक

पिघल जाएगा जैसे बीते साल की बर्फ़

शिखरों से टूटते आएँगे फूल

अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज़

छटपटाती रहेगी

चिड़िया की तरह लहूलुहान

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